'सवालों को झेलते थे हम'

एनके सिंह

एनके सिंह जाने माने नौकरशाह रहे हैं और अब वो जनता दल यू से जुड़े हैं.

बिहार विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र हम उन लोगों के अनुभव आपसे साझा कर रहे हैं जो बिहार से बाहर रह रहे हैं. उन्होंने बिहारी होने के कारण क्या देखा, सोचा और जाना. इसी शृंखला में पूर्व नौकरशाह और अब जद यू के सांसद एनके सिंह के अनुभव.

मुझे दो सवालों का बहुत सामना करना पडा है बिहारी होने के नाते.

मुझसे पूछा गया है बार बार.. बिहार एक बास्केट केस क्यों है जहां केवल अराजकता, अपराध, फिरौती की घटनाएं होती रही हैं. ऐसा राज्य जिसका कोई भविष्य नहीं है. ये कटाक्ष कई बार सुने और इनका जवाब देने की भी कोशिश की.

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दूसरी बात पूछी जाती थी कि ये कैसे संभव है कि बिहारी जब बिहार से बाहर जाता है तो अपनी प्रतिभा को पूरी तरह निखार लेता है. मीडिया में बिहार के लोग हैं. शिक्षण के क्षेत्र में हैं. लंदन में जाइए तो बिहारी डॉक्टरों की भरमार है. यूपीएससी में भी बिहार के बहुत अधिकारी हैं. बिहारी सभी क्षेत्रों में सर्वोच्च स्थान पर पहुंच जाते हैं.

यहां तक कि अमरीका की सिलिकॉन वैली में भी बिहार के लोग हैं लेकिन ये बिहार से बाहर आकर ही क्यों सफल होते हैं.

मैं लोगों को बिहार के सामाजिक गठन की ओर उनका ध्यान आकर्षित करता था कि वहां की सामाजिक संरचना ऐसी नहीं है कि वहां प्रतिभा निखरे. जाति और वर्ग की संरचना ऐसी थी कि लोग विकास पर ध्यान नहीं देते हैं. सामंती सोच थी.

एनके सिंह

क्या रहस्य है कि बिहारी बिहार से बाहर अच्छा प्रदर्शन करते हैं बिहार अविकसित रह जाता है.

इस प्रश्न का उत्तर कठिन था. मैं बिहार के सामाजिक गठन की ओर उनका ध्यान आकर्षित करता था कि वहां की सामाजिक संरचना ऐसी नहीं है कि वहां प्रतिभा निखरे. जाति और वर्ग की संरचना ऐसी थी कि लोग विकास पर ध्यान नहीं देते हैं. सामंती सोच थी. विकास की कोई बात ही नहीं होती थी.

हालांकि अब बहुत कुछ बदला है. मैं जब बिहार से बाहर निकला था तो कुछ लोग बिहारी होने में शर्म महसूस करते थे. बिहारियो को सवालों का सामना करना पड़ता था लेकिन अब समय बदल गया है.

अभी जो चुनाव हो रहे हैं वो ऐतिहासिक हैं. बिहार के लिए भी और पूरे देश के लिए भी. मैं तो राजनीतिक दल से जुड़ा हूं लेकिन इतना ज़रुर कहूंगा कि हमने बिहार में बहस की भाषा बदल दी है.

मैं ये नहीं कहता कि बिहार में पिछले पांच साल में जो विकास हुआ है वो लोगों की आकांक्षाओं पर शत प्रतिशत खरा उतरा है लेकिन लोग कम से कम जाति और वर्ग को छोड़कर विकास की बात कर रहे हैं. ये अपने आप में बड़ी बात है.

मैं जब इस बार चुनावों में बिहार गया हूं तो लोग जाति की बात नहीं कर रहे थे वो कहते हैं सड़क बनी लेकिन मरम्मत नहीं हुई. अस्पताल हैं लेकिन डॉक्टर चौबीस घंटे क्यों नहीं रहते. स्कूल है टीचर आए लेकिन टीचर पढ़ाने में सक्षम क्यों नहीं है.

ये अच्छे सवाल हैं. ये दिखाते हैं कि बिहार में लोग विकास पर बात करना चाहते हैं. ये बदलाव है.

(बीबीसी संवाददाता सुशील झा से बातचीत पर आधारित)

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