परेशान हैं बाल्को के मज़दूर

  • 30 अक्तूबर 2010
बाल्को
Image caption बाल्को में विनिवेश के बाद से मज़दूर संगठन इससे खुश नहीं हैं

अल्युमिनियम कंपनी बाल्को के विनिवेश को दस वर्ष हो गए हैं लेकिन कंपनी के मज़दूर कंपनी के कामकाज से नाखुश हैं और उन्होंने इस संबंध में प्रधानमंत्री कार्यालय को ज्ञापन दिया है.

विभिन्न मज़दूर संगठनों ने बाल्को बचाओ संयुक्त अभियान समिति के नाम से संगठन बनाया है और ज्ञापन के ज़रिए मांग की है कि बाल्को से जुड़े सभी घोटालों की सीबीआई जांच कराई जाए.

असल में 2001 में तत्कालीन भारत सरकार ने बाल्को के 51 प्रतिशत शेयर वेदांता से जुड़ी स्टरलाइट कंपनी को दिए थे जिसके बाद से ही इस पर विवाद चल रहा है.

बाल्को बचाओ संयुक्त अभियान समिति के संयोजक मांधाता प्रसाद मिश्रा कहते हैं कि कंपनी न तो मज़दूरों का ख्याल रख रही है और न ही किसी नियम क़ानून का पालन कर रही है.

वो कहते हैं, ‘‘ पिछले दिनों यहां पर दुर्घटना हुई. 40 का आकड़ा था लेकिन इससे अधिक मज़दूर मारे गए थे. हर महीने कोई न कोई दुर्घटना होती है जिसमें मजदूर मरते हैं. कंपनी ने कई एकड़ ज़मीन अवैध रुप से कब्ज़े में की है. पेड़ काट रही है लेकिन कोई देखने वाला नहीं है. किराए के गुंडो को वर्दी पहना कर कंपनी ने रखा है जो मज़दूर संघ के लोगों से मारपीट करते हैं.’’

मज़दूर संगठनों की मांग है कि स्टरलाइट को दिए गए 51 प्रतिशत शेयर भारत सरकार वापस ले क्योंकि कंपनी ने बाल्को के एल्युमिनियम प्लांट को पूरी तरह नष्ट कर दिया है और उसे कचरे के रुप में बेचना चाहती है.

बाल्को से जुड़े दो मुद्दे अभी सुप्रीम कोर्ट में भी लंबित है. इन मामलों के वकील सुदीप श्रीवास्तव कहते हैं, ‘‘ बाल्को के पास 2780 एकड़ ज़मीन है जिसमें से क़रीब आधी ज़मीन वन भूमि है जिसमें वनों की कटाई पर प्रतिबंध है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार इस ज़मीन पर बाल्को कोई भी गैर वन से जुड़ा काम नहीं कर सकती.’’

मिला जुला अनुभव

इसके अलावा इसी ज़मीन की क़ीमत को लेकर राज्य सरकार और बाल्को के बीच एक विवाद है और ये मामला भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है.

इतना ही नहीं 2001 के करार के अनुसार तीन वर्षों के बाद बाल्को के बाकी 49 शेयर भी स्टरलाइट को मिलने थे लेकिन स्टरलाइट के बार बार आग्रह के बावजूद भारत सरकार ने ये शेयर उन्हें नहीं दिए हैं.

सुदीप कहते हैं, ‘‘ बाकी बचे शेयरों की क़ीमत को लेकर दोनों पक्षों में मतभेद है. स्टरलाइट जो क़ीमत कह रहा है वो बहुत कम है जिसे सरकार नहीं मान रही है. इसके अलावा कुछ और शर्तें थी सरकार की जिसे स्टरलाइट ने नहीं माना है. इसलिए ये बाकी 49 प्रतिशत अभी भी स्टरलाइट को नहीं मिले हैं.’’

बाल्को में विनिवेश की प्रक्रिया टेढे मेढे रास्तों से होकर गुज़री लेकिन क्या हर उस कंपनी में समस्या हुई जहां विनिवेश हुआ.

आर्थिक मामलों के जानकार आलोक पुराणिक कहते हैं, ‘‘ विनिवेश की प्रक्रिया कई बड़ी कंपनियों में भी हुई है. स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, मारुति, ओएनजीसी, बाल्को, मार्डन इंडस्ट्रीज़. इसमें देखने वाली बात ये है कि जहां सरकार ने 51 प्रतिशत अपने पास रखा उन कंपनियों में बहुत ज़्यादा दिक्कतें नहीं हुई हैं. एसबीआई ने प्रगति ही की है बशर्ते कार्य प्रणाली सरकारी हो.’’

लेकिन बाकी कंपनियों के बारे में आलोक पुराणिक की राय अलग है. वो कहते हैं कि उन कंपनियों में जहां 51 प्रतिशत शेयर निजी कंपनियों को मिले वहां दिक्कतें रहीं हैं. मज़दूर यूनियनों लगातार आरोप लगाते रहे हैं कि वहां नौकरियां सुरक्षित नहीं रहीं.

पुराणिक कहते हैं, ‘‘ मिला जुला अनुभव कह लीजिए. सरकार को ये देखना होगा कि विनिवेश कैसे किया जाए. कोल इंडिया का विनिवेश हो रहा है. लोगों की भागेदारी लेने की कोशिश हो रही है. शायद ये ज्यादा सही रास्ता होगा.’’

मज़दूर संघों के आरोपों पर जब हमने बाल्को से प्रतिक्रिया लेनी चाही तो उन्होंने बार बार आग्रह करने के बाद भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.

उनके कॉरपोरेट कम्युनिकेशन विभाग को ईमेल, एसएमएस और फोन के ज़रिए संपर्क किए जाने का कोई जवाब नहीं दिया गया और इतना कहा गया कि जब वो प्रधानमंत्री को भेजा गया मज़दूर संघों का ज्ञापन देखेंगे तभी कुछ कहेंगे.

ये ज्ञापन उन्हें भेजे जाने के बाद भी ख़बर छापे जाने तक कंपनी की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिल पाई थी.

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