ओबामा से मुआवज़े के लिए गुहार

पैन एम का एक विमान
Image caption पैन एम का विमान मुंबई से न्यूयॉर्क जा रहा था

अमरीकी विमान पैन एम 73 त्रासदी के भारतीय पीड़ितों के परिजनों ने राष्ट्रपति बराक ओबामा से लीबिया से मुआवज़ा दिलवाने में सहायता की गुहार लगाई है.

परिवार के लोगों ने बराक ओबामा को एक पत्र लिखकर कहा है कि अगले महीने उनकी भारत यात्रा के दौरान वे उनसे मिलना चाहते हैं.

उल्लेखनीय है कि पैन एम 73 का मुंबई से कराची जाते वक़्त चार हथियार बंद लोगों ने अपहरण कर लिया था. उनके पास बंदूकें, हथगोले और विस्फोट थे.

17 घंटे तक चले इस अपहरण की त्रासदी ख़ून ख़राबे के साथ ख़त्म हुई थी जिसमें 20 लोग मारे गए थे.मारे गए लोगों में से 13 भारतीय थे. शेष अमरीका पाकिस्तान और मैक्सिको के नागरिक थे.

इस घटनाक्रम में सौ से अधिक भारतीय घायल हुए थे, जिनमें से कई गंभीर रूप से घायल थे.

इन भारतीयों के परिजनों का कहना है कि उन्हें अब तक लीबिया की ओर से कोई मुआवज़ा नहीं मिला है.

उपेक्षा का आरोप

21 अक्तूबर को लिखे इस पत्र में परिजनों ने कहा है कि अमरीकी सरकार ने लीबिया के साथ जो समझौता किया है उसके तहत केवल अमरीकी नागरिकों को मुआवज़ा दिया गया है लेकिन भारतीय पीड़ितों को कुछ भी नहीं दिया गया है.

इस पत्र में कहा गया है, "जब आतंकवादियों ने विमान में प्रवेश किया तो एक भारतीय परिचारिका ने विमान के अमरीकी परिचालकों को तुरंत इसकी सूचना दे दी जिसकी वजह से वे आपात रास्ते से निकलने में सफल हो सके."

उन्होंने कहा है, "इस परिचारिका ने आतंकवादियों के कहने पर यात्रियों के पासपोर्ट तो जमा किए लेकिन उन्होंने सारे अमरीकियों के पासपोर्ट छिपा लिए जिससे कि यह पता न चल सके कि अमरीकी नागरिक कौन हैं."

पत्र में कहा गया है यह साहसिक कारनामा करने वाली नीरजा भनोट को तो अमरीकी सरकार ने अपने सर्वोच्च सम्मान से नवाज़ा लेकिन कोई मुआवज़ा नहीं दिया.

इस घटनाक्रम के अंत में चरमपंथियों ने नीरजा भनोट को गोली मार दी थी.

नीरजा भनोट की 83 वर्षीय माँ रमा भनोट ने बीबीसी से हुई बातचीत में कहा, "उन्होंने कैप्टन आदि सभी को मुआवज़ा दिया क्योंकि वो अमरीकी थे पर भारतीयों को कुछ नहीं दिया गया. क्या ये ज़्यादती नहीं है. क्या भारतीयों का खून खून नहीं है?

उन्होंने कहा,"आपके कैप्टन तो अपहरण का पता चलते ही भाग गए. मेरी बेटी नीरजा ने गोलियाँ खाईं और कई लोगों को बचाया. अमरीकियों के पासपोर्ट छुपाए ताकि लीबियाई अपहर्ता उन्हें मार न डालें."

मामला

भारतीय पीड़ितों की ओर से 178 लोगों ने ओबामा को लिखे पत्र में लिखा है कि वर्ष 2004 में इस बात का पता चला कि पैन एम 73 के अपहरण के पीछे लीबिया के चरमपंथियों का हाथ है और इसके बाद वर्ष 2006 में उन्होंने मुआवज़े के लिए अमरीकी अदालत में एक मुक़दमा दर्ज किया था.

लेकिन वर्ष 2008 में बुश प्रशासन ने लीबिया के साथ एक समझौता किया था और इसके बाद मुआवज़े के सारे मुक़दमे वापस से लिए थे. इस समझौते के तहत लीबिया ने अमरीका को मुआवज़े के रुप में 1.5 अरब डॉलर का भुगतान किया था.

पीड़ितों के परिजनों का कहना है कि पैन एम 103 पर लॉकरबी में हुए हमले के शिकार हुए सभी देशों के नागरिकों को मुआवज़ा दिया गया लेकिन पैन एम 73 के मामले में सिर्फ़ अमरीकी नागरिकों को मुआवज़ा दिया गया.

पत्र में कहा गया है, "चरमपंथियों के निशाने पर अमरीका और अमरीकी थे लेकिन अमरीकी सरकार ने एक तरफ़ा निर्णय में अमरीकी विमान में फँसे भारतीयों के उन दावों को अनदेखा कर दिया जिसके वे हक़दार थे."

उनका कहना है, "इस घटना ने हमारे दिलो-दिमाग और हमारे जीवन पर एक अमिट घाव छोड़ा है और इस मामले का अंतिम निपटारा अभी शेष है."

इस पत्र में पीड़ितों और उनके कुछ परिजनों के वक्तव्यों का हिस्सा भी शामिल किया गया है.

पीड़ितों के परिजनों ने बराक ओबामा से न्याय की उम्मीद करते हुए अनुरोध किया है कि वे अपनी भारत यात्रा के दौरान यदि समय दें तो वे उनसे मिलना चाहेंगे.

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