राजा के मंत्री बने रहने पर सवाल

ए राजा
Image caption डीएमके का कहना है कि राजा दलित हैं और उनके हटाने से ग़लत संदेश जाएगा

सुप्रीम कोर्ट ने मोबाइल के 2-जी स्पेक्ट्रम के आवंटन के घोटाले की धीमी चाल पर केंद्रीय जाँच एजेंसी (सीबीआई) को फटकार लगाई है और ए राजा के अब तक केंद्रीय दूससंचार मंत्री बने रहने पर सवाल उठाए हैं.

आरोप हैं कि 2-जी स्पेक्ट्रम के आवंटन में कथित तौर पर भारी पैमाने पर घोटाला हुआ है और इससे सरकार को अरबों रुपयों के राजस्व का नुक़सान हुआ है.

इस कथित घोटाले की जाँच सीबीआई कर रही है और इस जाँच में ए राजा की भूमिका की भी जाँच की जा रही है.

विपक्षी दल ए राजा को हटाने के लिए सरकार पर दबाव बनाते रहे हैं लेकिन प्रधानमंत्री ने उन्हें पद से हटाने से इनकार कर दिया है.

ए राजा अपने पद से इस्तीफ़ा देने से इनकार करते रहे हैं. उनका कहना है कि जो कुछ हुआ वह टेलीकॉम विनियमन संस्था ट्राइ के सुझावों के अनुरुप हुआ और इसमें प्रधानमंत्री कार्यालय की स्वीकृति थी.

राजनीतिक टीकाकार मानते हैं कि ए राजा यूपीए गठबंधन के अहम साझीदार डीमके के कोटे से मंत्री हैं और डीएमके के नेता करुणानिधि किसी भी सूरत में ए राजा को हटाने के पक्ष में नहीं हैं.

फटकार

न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी और न्यायमूर्ति एके गांगुली के पीठ ने शुक्रवार को सीबीआई को फटकारते हुए कहा, "आपने कुछ नहीं किया.मामला गंभीर है. वही मंत्री आज भी पद पर बने हुए हैं, क्या सरकारी कामकाज का यही तरीका है? क्या आप सभी मामलों में ऐसा ही करते हैं? एक साल से ज्यादा वक्त हो चुका है.’

सीबीआई की ओर से अदालत में मौजूद अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एएसजी हरेन रावल के सीबीआई के बचाव में कुछ बातें कहने पर न्यायालय ने सीबीआई के बारे में ये टिप्पणियां कीं.

एएसजी ने कहा था कि इस मामले के दस्तावेजों की संख्या, जटिलता और गहनता के मद्देनजर जांच पूरी करने के लिए और समय की जरूरत है.

उनकी बात को काटते हुए हुए पीठ ने कहा,"यह ढुलमुल रवैया है। आप क़दम पीछे खींच रहे हैं."

सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा है कि वह सीएजी की रिपोर्ट पर जवाब दे जिसमें कहा गया है कि 2-जी के सौदे में सरकार को 1.4 लाख करोड़ का नुक़सान हुआ है.

सॉलिसिटर जनरल गोपाल सुब्रमण्यम बीमार होने की वजह से उपस्थित नहीं थे.

अब इस मामले की सुनवाई 15 नवंबर को होगी.

मामला और आरोप

वर्ष 2007 में दूरसंचार मंत्री ए राजा ने 2-जी स्पेक्ट्रम को तयशुदा क़ीमतों में कंपनियों को देने मामला सुझाव के लिए विधि मंत्रालय को भेजा था. इसके जवाब में विधि मंत्रालय ने यह मामला मंत्रिमंडलीय समूहों को देने का सुझाव दिया था.

लेकिन विधि मंत्रालय के सुझाव को नज़रअंदाज़ करते हुए ए राजा ने फ़रवरी, 2008 में कोई दो दर्जन नई कंपनियों को मोबाइल लाइसेंस दिए गए थे.

आरोप है कि बाज़ार दरों की तुलना में बहुत कम दरों पर ये लाइसेंस जारी कर दिए गए थे जिससे सरकार को हज़ारों करोड़ रुपयों की राजस्व की हानि हुई थी.

केंद्रीय सतर्कता आयोग ने इस आवंटन के लिए अपनाई गई प्रक्रिया की जाँच सीबीआई से करवाने के आदेश दिए थे.

इस प्रक्रिया को लेकर बड़े सवाल उस समय खड़े हुए जब दो कंपनियों, यूनिटेक वायरलेस सर्विसेस और स्वान टेलीकॉम ने लाइसेंस मिलने के कुछ ही दिनों बाद उसे लगभग छह गुनी क़ीमतों पर बेच दिया था.

सीबीआई ने एक बयान में कहा है कि उनकी सूचना के अनुसार इन लाइसेंसों के आवंटन में दूरसंचार विभाग के अधिकारियों और लाइसेंस हासिल करने वाली कंपनियों के अधिकारियों के बीच साँठगाँठ थी.

विपक्षी दलों का कहना है कि इससे सरकार को 60 हज़ार करोड़ रुपयों का नुक़सान हुआ है. हालांकि विशेषज्ञों ने 20 से 25 हज़ार करोड़ रुपयों के नुक़सान का अनुमान लगाया है.

संबंधित समाचार