ओबामा के सामने हैं कई सवाल

  • 4 नवंबर 2010
Image caption ओबामा और मनमोहन सिंह की पहले भी कई मुलाक़ातें हो चुकी हैं

सदभाव और मैत्री के संदेश के अलावा अपनी भारत यात्रा में बराक ओबामा ऐसा क्या ख़ास लाने वाले हैं?

जैसे-जैसे ओबामा की यात्रा की तारीख़ नज़दीक आ रही है रणनीति और कूटनीति के जानकारों के बीच यह सवाल सबसे अहम हो गया है.

बारह वर्ष पहले भारत ने परमाणु परीक्षण किया था और अमरीका ने तिरस्कार की नीति अपनाई थी, मगर तब से लेकर अब तक दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंध पूरी तरह बदल चुके हैं.

भारत और अमरीका के बीच संवाद बहुत बढ़ा है, बैठकों और चर्चाओं का सिलसिला चल पड़ा है लेकिन बहुत सारे ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब बराक ओबामा को देने होंगे.

भारत की आज़ादी के बाद पहले तीन दशकों में सिर्फ़ तीन अमरीकी राष्ट्रपति भारत आए, लेकिन अब ओबामा दस वर्षों की अवधि में भारत आने वाले तीसरे अमरीकी राष्ट्रपति होंगे.

शीत युद्ध के दौर का आपसी अविश्वास ख़त्म हो चुका है बल्कि दोनों देश परस्पर सहयोग के नए क्षेत्रों की तलाश में लगे हैं.

26 नवंबर 2008 को हमले का निशाना बने ताजमहल होटल में रुकने का ओबामा का फ़ैसला काफ़ी सांकेतिक महत्व रखता है, वे दुनिया को संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि "हम झुकेंगे नहीं."

मगर भारत में कूटनीति और रणनीति के माहिरों की चिंता कुछ और ही है. वे सोच रहे हैं कि जब अफ़ग़ानिस्तान से अमरीकी सैनिक निकल जाएँगे तो क्या होगा? भारत पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान की वजह से पैदा होने वाली अस्थिरता से किस तरह निबटेगा?

भारतीय सेना में सैनिक अभियानों के महानिदेशक (डीजीएमओ) रह चुके जनरल वीआर राघवन का कहना है कि "अमरीकी सेना के अफ़ग़ानिस्तान से हटने के बाद भारत की विदेश नीति का केंद्रीय पहलू यही होगा कि पाकिस्तान की तरफ़ से आने वाली चुनौतियों से किस तरह निबटा जाए".

राघवन कहते हैं कि अमरीका आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में बहुत ही सीमित प्रतिबद्धता दिखाई है, वह सिर्फ़ उन्हीं ख़तरों पर ध्यान देता है जो उसके सीधे-सीधे उसके हितों पर चोट करते हैं.

भारत और पाकिस्तान के आपसी रिश्ते, और अफ़ग़ानिस्तान से इन दोनों देशों के रिश्तों से जुड़े सवाल अमरीका और राष्ट्रपति ओबामा को परेशान करते रहे हैं.

अफ़ग़ानिस्तान-पाकिस्तान का सवाल

'ओबामाज़ वार्स' नाम की चर्चित किताब लिखने वाले पत्रकार बॉब वुडवर्ड ने लिखा है कि व्हाइट हाउस की एक मीटिंग में राष्ट्रपति ओबामा ने कहा, "भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव को कम करने के लिए हमें तेज़ी से क़दम उठाने की ज़रूरत है."

Image caption इस बार पाकिस्तान नहीं जा रहे हैं ओबामा

पाकिस्तान से रिश्ते सुधारने के ओबामा के सुझाव पर भारत कोई बहुत गर्मजोशी नहीं दिखाने वाला है, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पाकिस्तान से ताल्लुकात सुधारना चाहते हैं लेकिन किसी को ये उम्मीद नहीं है कि पाकिस्तान के मामले में कोई नाटकीय पहल होगी.

एक और सवाल जिसका उल्लेख वुडवर्ड ने अपनी किताब में किया है और ओबामा भी उससे अच्छी तरह परिचित हैं, वह है चरमपंथी इस्लामी गुटों से निबटने के मामले में पाकिस्तान के दोहरे मानदंड, यह सवाल भारत में चिंता का प्रमुख विषय है.

भारतीय रक्षा अध्ययन एवं विश्लेषण संस्थान (आईडीएसए) से जुड़े राना बनर्जी का कहना है, "अमरीका पाकिस्तान के दोहरे मानदंडों को बदलने में नाकाम रहा है. अमरीका के पास पाकिस्तान से निबटने के अलावा कोई विकल्प नहीं है."

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और अमरीकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन के बीच हनोई में हुई मुलाक़ात के बाद पत्रकारों से बातचीत में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन ने पत्रकारों से बातचीत में कहा पाकिस्तान को दिए जाने वाले ऐसे अमरीकी हथियार जिनका संबंध आतंकवाद निरोधक कार्रवाइयों से नहीं है, अपने आप में एक मुद्दा है.

पाकिस्तानी पहलू

पाकिस्तान के एक प्रमुख विश्लेषक अयाज़ अमीर ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि अमरीका-पाकिस्तान के रिश्तों को अफ़ग़ानिस्तान संघर्ष परिभाषित करता है.

वे कहते हैं, "अमरीका पाकिस्तान में भारी संकट में है, वे पाकिस्तान की मदद के बिना इस समस्या से नहीं निबट सकते, इसके बावजूद पाकिस्तान को बलि का बकरा बनाया जा रहा है."

Image caption अफ़ग़ानिस्तान से अमरीकी सेना के निकलने बाद की स्थिति भारत के लिए चिंता का विषय

अमीर कहते हैं, "पाकिस्तानी सेना पश्चिमोत्तर इलाक़े में अपनी पूरी ताक़त लगा रही है, इससे अधिक वे कुछ और नहीं कर सकते हैं, अमरीका चाहता है कि उत्तरी वज़ीरिस्तान में पाकिस्तानी सैनिक तैनात हों."

अमीर का कहना है कि पाकिस्तान सेना अब थक रही है और समस्या का कोई राजनीतिक हल निकलता नहीं दिख रहा है.

वे कहते हैं, "अमरीकी सैनिकों के अफ़ग़ानिस्तान से निकलने के बाद वैसे ही अफ़रा-तफ़री की हालत होगी जैसी 1989 में सोवियत सैनिकों के हटने के बाद हुई थी."

अमीर कहते हैं, "सैन्य कार्रवाइयाँ और ड्रोन हमले कारगर नहीं हैं, चरमपंथियों के पास लड़ने वाले लोगों की कोई कमी नहीं है."

इस बार की यात्रा में ओबामा पाकिस्तान नहीं जा रहे हैं फिर भी पाकिस्तान उनकी भारत यात्रा में भी छाया रहेगा.

ब्रितानी प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने पाकिस्तान के बारे में साफ़ शब्दों में बात की थी लेकिन ओबामा संभवतः संयत और कूटनीतिक भाषा का ही इस्तेमाल करेंगे जो भारत के लोगों के लिए नाकाफ़ी होगा.

अमरीका के साथ निकटता बढ़ाने की नीति तैयार करने वाले पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्र ने मुझसे कहा, "भारत की सुरक्षा ख़तरे में है, ओबामा को क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर भारत की भूमिका की बात करनी चाहिए, उन्हें कहना चाहिए कि भारत की सुरक्षा को अमरीका महत्वपूर्ण मानता है."

तेज़ी से उभर रहे और अपनी माँगों पर ज़ोर देने वाले भारत में आपका स्वागत है राष्ट्रपति ओबामा.

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