'बर्मा मुद्दे को तूल देने की ज़रुरत नहीं'

भारतीय संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करते बराक ओबामा
Image caption भारत का कहना है कि बर्मा पर ओबामा के बयान को तूल नहीं देना चाहिए.

भारत सरकार ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और बर्मा के मुद्दे पर अमरीकी राष्ट्रपति के बयान को और स्पष्ट करने की कोशिश की है और कहा है कि अमरीका के साथ अभूतपूर्व रिश्तों का दौर शुरु ही हुआ है.

बर्मा में मानवाधिकार उल्लंघनों पर कुछ नहीं कहने के भारत के रुख के बारे में विदेश मंत्रालय के सूत्रों का कहना था कि यह बयान मात्र है और भारत की बर्मा में अपनी बाध्यताएं हैं.

एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम उजागर न करने की शर्त पर कहा कि बर्मा से भारत की सीमा लगती है. उत्तर पूर्व के कई राज्य हैं सुरक्षा एक बड़ी समस्या है और बर्मा से रिश्ते इन्हीं आधारों पर तय होते हैं. वैश्विक मुद्दे अपनी जगह हैं. मानवाधिकार उल्लंघन पर स्टैंड लेना अपनी जगह है लेकिन ज़मीनी सच्चाई भी एक बात होती है.

उनका कहना था कि अमरीका से दोस्ती अभी शुरु हुई है और बर्मा संबंधी बयान को बहुत तूल देने की ज़रुरत नहीं है.

अधिकारी का कहना था, ‘‘ दोस्ती है नई है लेकिन पुख्ता है तो ये सब बातें होती ही हैं. इससे बहुत फ़र्क नहीं पड़ता है. हम खुलकर बात करते हैं. अब विचारधारा का मसला नहीं है. भारत और अमरीका बिल्कुल छोटी छोटी बातों को ध्यान में रखकर काम कर रहे हैं.’’

ईरान से संबंध

उन्होंने इसी पर ईरान का उदाहरण दिया और कहा, "कई बार ईरान के मसले पर हमारी राय अमरीका से मिलती है, कभी नहीं मिलती है तो उन्हें पता है कि हम ईरान को दोस्त मानते हैं. ईरान से हमारे संबंध हैं जिन्हें हम तोड़ नहीं सकते"

सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता पर अमरीकी समर्थन को और स्पष्ट करते हुए एक सूत्र ने कहा कि इस बारे में अभी बहुत काम करने की ज़रुरत है लेकिन अमरीका ने इतना समर्थन दिया है वो बहुत अच्छी बात है.

जर्मनी, जापान अकसर भारत की स्थायी सदस्यता की कोशिशों का विरोध करते रहे हैं. इस बारे में पूछे जाने पर अधिकारी ने कहा कि भारत को ये जानाकरी है और वो इस बारे में इन देशों से बात करता रहता है.

उनका कहना था कि अमरीका का भारत के बारे में बयान एक महत्वपूर्ण राजनीतिक बयान है.

अधिकारियों का कहना था कि अमरीका की उस सूची से भारतीय कंपनियों का नाम हटाया जाना बहुत महत्वपूर्ण है जिन्हें दोहरे इस्तेमाल की तकनीक नहीं दी जाती है.

बड़ी शुरूआत

संयुक्त बयान के अनुसार भारत के इसरो, डीआरडीओ, श्रीहरिकोटा और विक्रम साराभाई सेंटर को इस सूची में से हटाया गया है.

अधिकारियों के अनुसार ये एक बड़ा फ़ैसला नहीं तो बड़ी शुरुआत ज़रुर है जिससे भारत को फ़ायदा ही होने वाला है.

ओबामा की यात्रा के बाद सरकारी महकमे में एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है ख़ास कर सुरक्षा परिषद और प्रतिबंधित सूची से कंपनियों को हटाने को देखा जाए तो.

सरकार अब लोगों को ये संदेश देने की कोशिश में है कि अमरीका के साथ अब किसी तरह का वैचारिक मतभेद रहा नहीं है और अमरीका के साथ मिलकर दक्षिण एशिया में चीन की बढ़ती हुई निरंकुश ताकत को भी रोक सकते हैं.

सरकार की यह रणनीति कितनी सही साबित होगी ये कहना मुश्किल है लेकिन यथार्थवादी दृष्टिकोण की मानें तो अमरीका और भारत की बढ़ती दोस्ती चीन के लिए बहुत अच्छा संकेत नहीं प्रतीत होता है.

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