'मंत्री ने नहीं माने मेरे सुझाव'

ए राजा
Image caption पूर्व संचार सचिव डीएस माथुर ने कहा है कि संचार मंत्री ए राजा ने उनके सुझाव नहीं माने थे.

पूर्व संचार सचिव डीएस माथुर ने कहा है कि केन्द्रीय संचार मंत्री ए राजा तकनीकी क्षमताओं और क़ायदों को दरकिनार कर ज़्यादा से ज़्यादा कंपनियों को लाइसेंस देने के इच्छुक थे.

पूर्व सचिव का कहना है कि इस हित की पूर्ति के लिए उन्हें सरकार को होने वाले किसी नुक़सान की भी कोई परवाह नहीं थी.

हालांकि इस बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए ए राजा ने कहा है कि लाइसेंस से संबंधित लिए गए सभी निर्णयों में पूर्व सचिव शामिल थे.

लाइसेंसों के आवंटन के समय डी एस माथुर संचार विभाग के सचिव थे.

डीएस माथुर ने भोपाल से फ़ोन पर बीबीसी संवाददाता शालू यादव से बातचीत की.

'मैं राजा से असहमत था'

उन्होंने बीबीसी को बताया है कि साल 2007 में उनके कार्यालय में टेलिकॉम मंत्री को सुझाव दिया था कि 2-जी स्पैक्ट्रम के लाइसेंस के आवंटन की प्रक्रिया पारदर्शी रखी जाए.

माथुर ने बताया कि मई 2007 में संचार मंत्री बनने के बाद राजा ने उन्हें बुलाकर करीब 500 लाइसेंस जारी करने की इच्छा जताई थी जो 'मेरे हिसाब से संभव नहीं था.'

माथुर के अनुसार उन्होंने केन्द्रीय मंत्री को सलाह दी थी कि चूंकि स्पैक्ट्रम की क्षमता सीमित है इसलिए लाइसेंस देते समय इसका ध्यान रखा जाना चाहिए

क्योंकि अगर लाइसेंस देने के बाद सरकार स्पेक्ट्रम देने में विफल हो जाती है तो इससे क़ानुनी दिक़्कते खड़ी हो सकती हैं.

पूर्व सचिव का ये भी कहना था कि लाइसेंस के लिए आवेदन पत्र जमा करने की तारीख़ भी उनके सलाह के बगैर उनकी अनुपस्थिति में बढ़ा दी गई थी.

डीएस माथुर का ये बयान विपक्ष के प्रहार झेल रहे ए राजा की मुश्किलें और बढ़ा सकती हैं.

हालांकि स्पैक्ट्रम मामले पर सवाल किए जाने पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसे ये कहकर टाल दिया कि संसद सत्र के दौरान इसपर कुछ कहना ठीक नहीं होगा.

विपक्ष का दबाव जारी

इस बीच विपक्ष ने ए राजा की बर्खास्तगी की मांग को लेकर सरकार पर दबाव जारी रखा है.

भारतीय जनती पार्टी प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर ने कहा, "ए राजा का मकसद स्पैक्ट्रम की उप्लब्धता की परवाह न करते हुए लाइसेंस बांट कर मुनाफ़ा कमाने का था. माथुर जी के खुलासे ने यूपीए और राजा के लिए कहीं मुंह छिपाने की जगह नहीं छोड़ी है. लगता है राजा की मंशा स्पेक्ट्रम की सार्वजनिक नीलामी करने की नहीं बल्कि निजी कंपनियों को नीलामी करने की थी. नीलामी करने का पूरा खेल एक साज़िश के तहत हुआ."

विपक्षी दलों ने सीएजी की उस रिपोर्ट के बाद सरकार पर अपना दबाव बढ़ाया है जिसमें कथित तौर पर कहा गया है कि मोबाइल कंपनियों को सस्ती दरों पर लाइसेंस देने से सरकार को 1.70 लाख करोड़ का नुक़सान हुआ है.

ये रिपोर्ट अभी संसद में पेश नहीं हुई है इसलिए सरकार की ओर से इस पर कोई अधिकृत टिप्पणी नहीं की जा रही है.

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