बिहार में अब आख़िरी खंदक की लड़ाई

लालू और नीतीश
Image caption लालू और नीतीश दोनों ने अपनी पूरी ताक़त झोंक दी है

बिहार की कुल 243 विधानसभा सीटों में से 217 के लिए पाँच चरणों में मतदान संपन्न हो चुका है. अब बाक़ी 26 सीटों के लिए छठे और आख़री दौर का मतदान आगामी 20 नवंबर को होना है.

ज़ाहिर है कि चुनावी-प्रक्रिया से जुड़े सभी पक्षों की नज़रें या गतिविधियाँ अब इन्हीं विधानसभा क्षेत्रों पर केंद्रित हो गई हैं.

नक्सली-हिंसा की आशंका भी इन्हीं इलाक़ों में ज़्यादा है.

पिछले विधानसभा चुनाव के परिणाम को ध्यान में रख कर देखा जाए तो मौजूदा सत्ताधारी (जदयू-भाजपा) गठबंधन को इन क्षेत्रों में बढ़त नहीं मिल पाई थी, क्योंकि विपक्षी दलों ने कुल मिलाकर पलड़ा बराबर कर दिया था.

वर्ष 2005 के चुनाव में यहाँ की 26 सीटों में से जनता दल यूनाईटेड (जदयू) को नौ और भाजपा को तीन सीटें मिली थीं. उधर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने छह, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने तीन और भाकपा-माले ने एक सीट हासिल की थी. लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के एक और निर्दलीय दो उम्मीदवार जीते थे.

यानी पिछले चुनाव में गया, औरंगाबाद, रोहतास, कैमूर और बक्सर ज़िलों से जुड़े इन 26 विधानसभा क्षेत्रों में से 12 पर सत्ता पक्ष का और 14 पर ( दो निर्दलीय समेत ) विपक्षी दलों का क़ब्ज़ा हो गया था.

सब जुटे

Image caption राजद-पासवान ने पूरी ताक़त झोंक दी है

इस बार बसपा अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने इन्हीं इलाक़ों में अपना पूरा ज़ोर लगाया है.

कांग्रेस को भी यहाँ से कुछ सीटें मिलने की उम्मीद है, इसलिए सोनिया गांधी और राहुल गांधी की यहाँ चार चुनावी सभाएं रखी गईं.

कांग्रेस और बसपा यहाँ की सभी 26 सीटों पर चुनाव लड़ रही है.

राजद ने 22 और लोजपा ने 4 प्रत्याशी इन क्षेत्रों में खड़े किये है.

उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे बिहार के विधानसभा क्षेत्रों में बसपा का काफी असर रहा है, जिसे रामविलास पासवान कम करने की कोशिश में जुटे हैं.

सबसे ज़्यादा ताक़त यहाँ झोंक रहे हैं लालू प्रसाद और रामविलास पासवान.

ये दोनों इस आख़री दौर की चुनावी सभाओं में एक साथ मंच पर होते हैं और जदयू-भाजपा के ख़िलाफ़ और भी अधिक आक्रामक तेवर दिखा रहे हैं.

इनके निशाने पर जदयू-भाजपा गठबंधन की वो सीटें हैं, जहाँ इस बार या तो जातीय समीकरण थोड़ा बदला है या सवर्ण मतों के विभाजन का इन्हें लाभ मिलने की उम्मीद है.

वामपंथी पार्टी भाकपा-माले का भी यहाँ कम-से-कम दो विधानसभा क्षेत्रों में अच्छी पकड़ दिख है.

इसलिए जदयू-भाजपा गठबंधन को यहाँ कई सीटों पर इन तमाम विरोधी ताक़तों से अलग-अलग चुनौती मिल रही है.

जदयू-भाजपा भी मुस्तैद

Image caption जदयू और भाजपा का गठबंधन अपने कामकाज पर वोट माँग रहा है

उधर भाजपा ने इस अंतिम दौर के मतदान वाले इलाक़ों में नितिन गडकरी, अरुण जेटली और सुषमा स्वराज जैसे अपने बड़े केंद्रीय नेताओं को प्रचार में उतार कर विपक्ष का दबाव कम करने की कोशिश की है.

उसके 10 और जदयू के 16 उम्मीदवार यहाँ चुनाव मैदान में हैं.

सबसे दिलचस्प मुक़ाबला रामगढ़, चैनपुर और औरंगाबाद विधानसभा सीटों पर है.

राजद के सांसद जगतानंद के पुत्र सुधाकर सिंह रामगढ़ से भाजपा के उम्मीदवार हैं. जदयू के सांसद महाबली सिंह के पुत्र धर्मेन्द्र कुशवाहा चैनपुर से राजद के प्रत्याशी हैं और औरंगाबाद से जदयू के सांसद सुशील सिंह के भाई सुनील सिंह को राजद ने अपना उम्मीदवार बनाया है.

यानी बाप इधर तो बेटा उधर, या पति यहाँ तो पत्नी वहाँ वाली पारिवारिक खिचड़ी इस बार कई सीटों पर पक रही है.

आरोप-प्रत्यारोप

Image caption कांग्रेस में अभी से आरोप प्रत्यारोप का दौर शुरु हो चुका है

जदयू के पांच सांसदों का पार्टी नेतृत्व के प्रति क्षोभ इस चुनाव के समय इतना मुखर हुआ कि इन्हें दलीय प्रचार मुहिम से पूरी तरह अलग कर दिया गया.

इनमें उपेन्द्र कुशवाहा, मोनाज़िर हसन, पूर्णमासी राम, जाय नारायण निषाद और महाबली सिंह शामिल हैं.

जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव और बिहार इकाई के अध्यक्ष विजय चौधरी ये संकेत दे चुके हैं कि चुनाव के बाद इस बाबत अनुशासनिक कार्रवाई ज़रूर होगी.

इस बीच राज्य के प्रमुख कांग्रेसी नेता उम्मीद के मुताबिक़ पार्टी के हक़ में परिणाम नहीं आने की आशंका से ग्रस्त बयान देने लगे हैं.

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष महबूब अली कैसर ने कहा है कि उम्मीदवार-चयन से जुड़े पार्टी पदाधिकारियों को प्रतिकूल परिणामों की सामूहिक ज़िम्मेदारी लेनी होगी.

इसे यहाँ कई कांग्रेसियों ने ग़लत समय पर व्यक्त की गई दुर्भाग्यपूर्ण प्रतिक्रिया कहा है.

वैसे, कांग्रेस ही नहीं, अन्य प्रमुख दलों के भीतर भी कलह के फोड़े फटने को तैयार हैं. बस 24 नवम्बर को परिणाम आ जाने का इंतज़ार है.

संबंधित समाचार