तीन राज्यों की पुलिस को असीमानंद की तलाश

भारत में हैदराबाद, अजमेर और मालेगांव में धर्मस्थलों पर विस्फोट की घटनाओ में कथित तौर पर प्रमुख भूमिका निभाने वाले स्वामी असीमानंद को खोज निकालना तीन राज्यों की पुलिस के लिए टेढ़ी खीर बना हुआ है.

राजस्थान पुलिस के आतंकवाद विरोधी दस्ते (एटीएस) ने असीमानंद को कथित रूप से 'हिंदू कट्टरपंथियों के गिरोह का नेतृत्व करने वाले व्यक्ति के रूप में चिंहित किया है.'

अजमेर दरगाह में हुए धमाकों की सिलसिले में दाखिल आरोप पत्र में पुलिस ने इस स्वामी की भूमिका का तफ़सील से जिक्र किया गया है.

पुलिस के मुताबिक गुजरात के डांग में केंद्रित रह कर गतिविधियां चला रहे स्वामी असीमानंद यकायक तब अंतर्ध्यान हो गए जब एक हिंदू संगठन के सदस्य देवेन्द्र गुप्ता को अजमेर ब्लास्ट के सिलसिले में गिरफ़्तार किया गया.

पुलिस कहती है कि स्वामी असीमानंद ने मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र के कोई 12 ज़िलों में अपने 'हिंदू प्रभाव' का तानाबाना बुन रखा था.

पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बीबीसी को बताया, ''उन्होंने अपना कामकाज दक्षिण गुजरात के पांच ज़िलों- डांग और खेड़ा, उत्तरी महाराष्ट्र के नंदनवार और पश्चिमी मध्य प्रदेश के झाबुआ में फैला रखा था, मगर उनका केंद्र गुजरात के डांग ज़िले में स्वामी का शबरी धाम था जहाँ वो अपने मंसूबों को कामयाब करने के लिए बैठकें आयोजित करता था.

पुलिस के अनुसार स्वामी मूलत पश्चिमी बंगाल के हुगली के हैं.

ऊंची तालीम हासिल असीमानंद कभी नब कुमार थे, फिर उन्हें पुरुलिया में काम करते देखा गया, मगर वो कम से कम दो दशक से मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में ही सक्रिय रहे हैं.

पुलिस ने अभी आरोप पत्र में स्वामी का नाम आरोपियों की सूची में नहीं लिखा है, मगर इन विस्फोटों में उनकी भूमिका को सबसे अहम बताया है.

असीमानंद की भूमिका

पुलिस का कहना है कि मालेगांव धमाकों में गिरफ़्तार श्रीकांत पुरोहित और सुधाकर के 'अभिनव भारत' संगठन और साध्वी प्रज्ञा सिंह और सुनील जोशी के 'वन्दे मातरम' संगठन के बीच असीमानंद ने सेतु का काम किया.

मालेगांव धमाकों में गिरफ़्तार लोगों ने पुलिस को बताया कि स्वामी ने उन्हें सीख दी कि अगर ये दोनों संगठन आपस में मिल जाए तो अच्छे नतीजे आ सकते हैं.

ये असीमानंद ही थे जिनकी सदारत में वर्ष 2004 में उज्जैन के सिंहस्थ कुंभ में एक बैठक हुई जिसमे प्रज्ञा सिंह, सुनील जोशी, रामजी कलसंगरा, देवेन्द्र गुप्ता और अन्य अनेक लोग मौजूद थे.

आरोप पत्र के अनुसार इस बैठक में हिंदू धर्मस्थलों पर 'मुस्लिम चरमपंथियों के हमलों पर गुस्सा जाहिर किया गया और कहा सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठे है, लिहाजा खुद के दम पर कुछ किया जाए.'

पुलिस ने इस स्वामी के व्यक्तित्व का खाका कुछ यू खींचा है कि 'वो एक कट्टरवादी हिंदू हैं और उन्होंने गुजरात के डांग में रह कर मुस्लिम अतंकवादियों के विस्फोटों के जवाब में मुस्लिम धर्मस्थलों और मुस्लिम बहुल इलाकों में विस्फोट करने वाले समूह का नेतृत्व कर रहे थे.'

पुलिस कहती है, ''न केवल स्वामी ने इन विस्फोटों की योजना बनाई बल्कि उसे अमली जामा पहनाने में इन लोगों की मदद की, अजमेर ब्लास्ट के बाद उन्होंने इन लोगों को अपने यहाँ पनाह दी.''

पुलिस के मुताबिक स्वामी वर्ष 1995 में गुजरात के आहवा में अवतरित हुए और हिंदू संगठनों के साथ 'हिंदू धर्म जागरण और शुद्धिकरण 'का काम शुरू किया. यहीं उन्होंने शबरी माता का मंदिर बनाया और शबरी धाम स्थापित किया.

पुलिस के मुताबिक ये वो ही शबरी धाम है जहाँ स्वामी ने वर्ष 2006 में धमाकों से पहले शबरी कुंभ का आयोजन किया और धमाकों में शामिल लोग कोई 10 दिन तक वहां रहे.

पुलिस अब स्वामी को खोज निकलने के लिए इन राज्यों की खाक छान रही है, मगर वो अब भी पकड़ से दूर हैं.

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