प्रधानमंत्री ने चुप्पी का खंडन किया

मनमोहन सिंह
Image caption मनमोहन सिंह पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिन पर सुप्रीम कोर्ट ने इतनी कड़ी टिप्पणी की है

2जी स्पेक्ट्रम मामले में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा दायर कर दिया है जिसमें इस आरोप को ख़ारिज किया गया है कि ए राजा को लेकर वे चुप्पी साधे रहे.

शनिवार को दायर 11 पन्ने का यह हलफ़नामा प्रधानमंत्री कार्यालय की निदेशक वी विद्यावती की ओर से एटॉर्नी जनरल जीएस वाहनवती ने दाख़िल किया है.

सुप्रीम कोर्ट ने ए राजा के मामले में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की चुप्पी पर सवाल उठाते हुए पूरे मामले पर शपथ पत्र दाख़िल करने को कहा था.

यह पूरा मामला जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका से शुरु हुआ है जिसमें उन्होंने कहा था कि उन्होंने पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई करने के लिए अनुमति मांगते हुए प्रधानमंत्री को पाँच पत्र लिखे लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं मिला.

इस पर सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताते हुए कहा था कि प्रधानमंत्री की चुप्पी परेशान करने वाली है.

हलफ़नामा

प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से दायर हलफ़नामा में ब्यौरा दिया गया है कि सुब्रमण्यम स्वामी के 29 नवंबर, 2008 से पाँच अक्तूबर, 2010 के बीच लिखे पत्रों पर क्या कार्रवाइयाँ की गईं.

इसमें यह भी बताया गया है कि किस तरह से पत्रों पर क़ानून मंत्रालय की राय मांगी गई.

प्रधानमंत्री की ओर से जिस निदेशक ने जवाब तैयार किया है, उन्होंने कहा है कि नौ फ़रवरी, 2010 को तैयार किए गए एक नोट में लिखा था, "क़ानून मामलों के मंत्रालय की ओर से मिली सलाह के अनुसार मुक़दमा दायर करने की अनुमति जब जाँच एजेंसी (यानी सीबीआई) की ओर से एकत्रित कोई मौखिक या लिखित सबूत और सक्षम अधिकारियों की ओर से दाख़िल दस्तावेज़ों को देख नहीं लिया जाता."

उन्होंने कहा है, "इस नोट पर संयुक्त सचिव ने सुझाव दिया था कि क़ानून मंत्रालय से अनुरोध किया जाए कि वह याचिकाकर्ता सुब्रमण्यम स्वामी को समुचित जवाब भेज दे. इसे प्रधानमंत्री ने 13 फ़रवरी को स्वीकृति दे दी थी."

प्रधानमंत्री कार्यालय की निदेशक ने बताया कि इसके बाद किस तरह से क़ानून मंत्रालय और कार्मिक एवं प्रशिक्षण मंत्रालय के बीच के बीच बातचीत हई और आख़िर में 19 मार्च, 2010 को सुब्रमण्यम स्वामी को जवाब भेजा गया.

हलफ़नामें में इसके बाद सुब्रमण्यम स्वामी की ओर से लिखे पत्रों के बारे में की गई विभागीय कार्रवाइयों का विवरण भी दिया गया है.

इस ब्यौरे से यह साबित करने की कोशिश की गई है कि सुब्रमण्यम स्वामी के पत्रों पर प्रधानमंत्री कार्यालय चुप्पी साधे नहीं बैठा था बल्कि उस पर कार्रवाई की जा रही थी.

अब यह फ़ैसला सुप्रीम कोर्ट को लेना है कि वह इसे स्वामी के पत्रों पर कार्रवाई के रुप में देखता है या नहीं.

'ज़िम्मेदारी नहीं संभाली'

सुब्रमण्यम स्वामी ने हलफ़नामा दायर किए जाने के बाद बीबीसी संवाददाता रेणु अगाल से बातचीत में कहा कि “मैं इस बात से संतुष्ट हूँ कि जो भी मैंने अभी तक कोर्ट में कहा है, उसकी उन्होंने पुष्टि कर दी है. इस विषय पर प्रधानमंत्री भीष्म पितामह की स्थिति में थे, जब द्रौपदी का चीरहरण हो रहा था.”

सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा कि हलफ़नामे को देखकर ये तो समझ में आता है कि प्रधानमंत्री ने इस विषय को गंभीरता से लिया था लेकिन उनके अधिकारियों ने उन्हें चक्कर में लगा कर रखा था.

स्वामी का कहना है कि अधिकारियों ने प्रधानमंत्री को सही सलाह नहीं दी.

उनका कहना था कि इससे प्रधानमंत्री पर कोई दाग़ नहीं है, कोई लांछन नहीं है, उनको विधि या क़ानून की जानकारी नहीं है.

सुब्रमण्यम स्वामी का आरोप है कि क़ानून मंत्री ने इस विषय में अपनी ज़िम्मेदारी नहीं संभाली और उन्हें अपने पद से इस्तीफ़ा दे देना चाहिए.

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