'लालू को जूझकर निकलना आता है'

लालू प्रसाद यादव
Image caption हार के बाद उन्होंने कहा है कि वे नीतीश की जीत का रहस्य तलाश करेंगे

बिहार में नीतीश की जीत के जश्न से उड़ी धूल जब धीरे-धीरे बैठ रही है तो दूर एक जाना पहचाना नज़र आ रहा है.

यक़ीनन ये चेहरा लालू प्रसाद यादव का है.

इन चुनावों में लालू के राष्ट्रीय जनता दल का पराभव से एक सवाल छोड़ रहा है कि अब क्या होगा लालू का? क्या लालू की पार्टी हमेशा के लिए सिमट गई?

समस्या यही थी राष्ट्रीय जनता दल एक व्यक्ति के दल के रूप में पहचाना गया, लालू प्रसाद की पार्टी के रूप में. जनता की पार्टी के रूप में नहीं. इसलिए इस पराभव से आश्चर्य नहीं होता.

लेकिन न बिहार कोई इराक़ है और न लालू कोई सद्दाम हुसैन कि अमरीकी फ़ौजों ने मूर्ति तोड़ दी तो इसे पतन मान लिया जाए.

लालू की राजनीतिक जिजीविषा अद्भुत है. प्रतिकूल राजनीतिक परिस्थितियों से जूझकर निकलना और फिर अपनी हैसियत बरक़रार रखना लालू को बखूबी आता है. उनकी अपनी राजनीतिक ख़ूबियाँ हैं.

लालू का प्रयोग

Image caption लालू-पासवान का असुविधाजनक गठबंधन अब ख़ुद टूट जाएगा और हो सकता है पासवान कांग्रेस की ओर चले जाएँ

बिहार जैसे जटिल राजनीति चरित्र वाले राज्य में डेढ़ दशक की राजनीति में पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के बीच सुपर हीरो की जगह बनाने वाले लालू का राजनीतिक उदय तब हुआ था जब बिहार सहित पूरे देश में ग़ैर-कांग्रेसवाद के झंडाबरदारों ने अपना राजनीतिक अलख जगाया था.

कर्पूरी ठाकुर के बाद कौन, यह एक बड़ा सवाल था और इसका जवाब देवीलाल और वीपी सिंह ने ढूँढ़ा था लालू प्रसाद यादव के रुप में.

वह एक कठिन समय था जब कांग्रेस का सामंती चक्र अभी टूटा नहीं था और किसी ग़ैर कांग्रेसी सरकार को खींच ले जाना आसान नहीं था क्योंकि बाहरी दबाव पर अपना अंतर्विरोध हावी था.

तब नीतीश कुमार एक रणनीतिकार की तरह लालू के साथ थे.

वीपी सिंह ने जब मंडल आयोग की रिपोर्ट की सिफ़ारिशों को ज़मीनी रुप दिया तो उसकी तेज़ लपटों को सत्ता की लौ बनाने में क़ामयाब रहे लालू और फिर वे इसे पूरी शिद्दत के साथ जलाते भी रहे.

यही काल था बिहार में दलितों और पिछड़ों के आत्मसम्मान को जगाने का. लेकिन एक प्रयोग लालू ने ऐसा किया जो समाज को पहले से अधिक असुरक्षित और तनावग्रस्त बना गया.

राज्य में 1967 से 1977 के बीच ग़ैर कांग्रेसी सरकारों का नेतृत्व मायामाया प्रसाद सिन्हा, भोला पासवान शास्त्री, रामसुंदर दास और कर्पूरी ठाकुर ने किया. उन्होंने भी समाजवादी ढाँचे में समतामूलक समाज बनाने के लिए अगड़े और पिछड़े की बात दबी ज़बान से उठाई लेकिन उन्होंने भी राजनीतिक हित के लिए समाज को दो टुकड़ों में विभाजित करने की कोशिश नहीं की.

हालांकि इसी दौर के बाद जब दोबारा कांग्रेस सरकार की सुगबुगाहट शुरु हुई तो जातीय नरसंहारों का दौर शुरु हुआ. इसी दौर में बेलची हत्याकांड के पीड़ितों से मिलने इंदिरा गांधी हाथी पर चढ़कर गई थीं.फिर कांग्रेस शासन में अरवल और दलेलचक बघौरा जैसे भयानक नरसंहार हुए.

राजनीतिक चूक

लालू यादव ने सत्ता संभालने के बाद लालकृष्ण आडवाणी का रथ रोकने से लेकर सांप्रदायिक दंगों को रोकने का बहुत अहम काम किया.

Image caption लालू और मुलायम दोनों कांग्रेस को रास्ते का रोड़ा नज़र आते हैं

उन्होंने विरासत में मिली कांग्रेस की सामंती व्यवस्था का विरोध तो किया लेकिन वे सामंती जुल्म नहीं रोक पाए. ये ज़रुर देखा गया कि अति पिछड़ों और दलितों पर जुल्म करने वाले खलनायकों का चेहरा बदल गया. शोषण करने वाले अगड़ों की जगह पिछड़ों और नवसामंतों ने ले ली.

शोषण और जुल्म का दौर जारी रहा और एक वर्ग में आत्मसम्मान की जगह अहंकार ने ले ली और यहीं से बिहार में ज़ोर से पैदा हुआ सामाजिक असुरक्षा का भाव. डर और दहशत राजनीतिक हथियार बन गए.

लेकिन लालू यादव अपने शासन काल में निश्चिंत और निर्विध्न कभी नहीं रहे. चारा घोटाले से लेकर आय से अधिक संपत्ति का मामला उनके पीछे पड़ा रहा. वे जेल भी गए और जनादेश की मनमानी व्याख्या कर अपनी पत्नी को मुख्यमंत्री भी बना गए.

जब बिहार से राजपाठ गया तो अपने सांसदों की संख्याबल पर कांग्रेस का हाथ थामा और पाँच साल तक कांग्रेस के साथ केंद्र की सत्ता के सहभोगी बने रहे और अपनी राजनीतिक ज़मीन तलाश करते रहे.

पिछले लोकसभा चुनावों में कांग्रेस से किनारा कर लेने का फ़ैसला लालू को भारी पड़ा और वे केंद्र की सत्ता से भी दूर हो गए.

कर्पूरी ठाकुर राज्य की राजनीति में रहते हुए केंद्र की राजनीति को प्रभावित करते रहे लेकिन लालू इससे भी दो क़दम आगे रहे.

जो नेता अपने आधे-अधूरे जनाधार के साथ भी किंग मेकर कहलाता रहा उसका दिमाग़ी गणित इस तरह फ़ेल हो जाएगा यह उसने भी नहीं सोचा होगा.

नई ज़मीन की तलाश

अब नीतीश कुमार की राजनीतिक और प्रशासनिक चूक ही अब लालू का हथियार बनेगी.

लालू अब बिहार में प्रतिपक्ष की नई राजनीति करेंगे जिसमें वे ग़ैर-एनडीए और ग़ैर-यूपीए की राजनीति की वकालत करेंगे.

Image caption लालू अब यूपीए और एनडीए से अलग अपनी ज़मीन तलाश करेंगे

वे एक नए राजनीतिक आंदोलन की ज़मीन बनाने की कोशिश करेंगे. यह और बात है कि इस वक़्त बिहार में किसी आंदोलन की ज़मीन तैयार करने की संभावना नहीं दिख रही है.

लालू कुछ दिन चुप रह कर नीतीश से छूटे और टूटे हुए लोगों की तलाश करेंगे और उनको एक मंच पर लाने की कोशिश करेंगे. वे नए अवसरों की तलाश करेंगे. अब लालू अपने सांसदों और विधायकों से अलग ऐसा कुछ करते दिखेंगे जिससे जनता के बीच उनकी उपस्थिति दर्ज हो.

जहाँ तक राजनीतिक दोस्ती का सवाल है तो कांग्रेस से लालू आज को कांग्रेस से बहुत दूर हो चुके हैं. अब तो वे चाहें भी तो कांग्रेस से दोबारा दोस्ती नहीं हो सकती.

वैसे भी कांग्रेस की रणनीति रही है कि उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव और बिहार में लालू प्रसाद यादव को ख़त्म किया बिना कांग्रेस के लिए विपक्ष की भूमिका की जगह रिक्त नहीं होगी.

इन दोनों की राजनीतिक हैसियत चाहे जितनी छोटी हो जाए वह कांग्रेस से बड़ी ही रहेगी. इसलिए कांग्रेस अपनी हार से उतनी दुखी नहीं है जितनी वह लालू के हार से ख़ुश है.

रामविलास पासवान और लालू का गठबंधन वैसे भी असहज गठबंधन था ही. इसलिए इस हार के बाद रामविलास पासवान कांग्रेस के नज़दीक आने की कोशिश करेंगे.

पासवान का अहं लालू जितना बड़ा नहीं है और इसीलिए वे अपनी एक छोटी राजनीतिक ज़मीन के साथ कभी भी किसी से भी समझौता कर लेते हैं.

कुल मिलाकर इस हार से लालू का मनोबल टूटा हो इसमें संदेह है. वैसे भी राजनीति को संभावनाओं का खेल कहा जाता है.

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