फिर से चले मुक़दमा: कसाब

कसाब

मुंबई में 26 नवंबर, 2008 में हुए चरमपंथी हमलों के एकमात्र जीवित अभियुक्त आमिर अजमल कसाब ने कहा है कि उनके ख़िलाफ़ चलाया गया मुक़दमा अन्यायपूर्ण था और यह फिर से चलाया जाना चाहिए.

उनके वकील ने भी आरोप लगाया है कि विशेष अदालत में कई अहम गवाहों को सुनवाई के दौरान बुलाया ही नहीं गया.

कसाब को एक विशेष अदालत ने गत मई में दोषी ठहराते हुए मौत की सज़ा सुनाई थी.

इस सज़ा के ख़िलाफ़ उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट में अपील की है, जिसकी सुनवाई चल रही है.

इस हमले में कुल दस चरमपंथी शामिल थे जिनमें से नौ की हमलों के दौरान ही मौत हो गई थी और सिर्फ़ कसाब को जीवित पकड़ा गया था.

कसाब को आर्थर रोड जेल में रखा गया है और सुरक्षा की दृष्टि से उन्हें अदालत में पेश नहीं किया जाता. मामले की सुनवाई वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग के ज़रिए होती है.

कसाब को इस पर भी आपत्ति है और उनकी मांग है कि उन्हें अदालत में पेश होने की अनुमति दी जाए. इसी नाराज़गी में वह एक बार कैमरे पर थूक भी चुके हैं.

वकीलों की नियुक्ति पर भी सवाल

Image caption सोलकर का कहना है कि कई अहम गवाहों की गवाही विशेष अदालत में नहीं हुई

न्यायाधीश रंजना देसाई और आरवी मोरे की खंडपीठ के समक्ष बचाव पक्ष के वकील अमीन सोलकर ने गुरूवार को कहा कि इस मामले में महत्वपूर्ण गवाहों से पूछताछ नहीं हुई और ठोस साक्ष्य भी पेश नहीं किए गए.

उन्होंने यह भी कहा कि कसाब के बचाव के लिए वकील नियुक्त करने में भी मानदंडों का पालन नहीं किया गया.

उनका कहना था कि इस आधार पर कसाब के ख़िलाफ़ नए सिरे से मुक़दमा चलाया जाना चाहिए.

सोलकर ने इस संबंध में गुजरात की बेस्ट बेकरी मामले का हवाला दिया और कहा कि इसी तरह के आधारों पर सुप्रीम कोर्ट ने बेस्ट बेकरी मामले में नए सिरे से मुकदमा चलाने का आदेश दिया था.

अमीन सोलकर ने दावा किया कि इस मुक़दमे में अहम गवाहों का परीक्षण नहीं किया गया और ठोस सुबूत पेश नहीं किए गए.

कसाब के वकील सोलकर ने कहा कि हमले के दिन चरमपंथियों को समुद्र के किनारे मच्छीमार कालोनी के समीप नाव से उतरते देखने का दावा करने वाली एक मात्र चश्मदीद गवाह अनीता उदैया को सुनवाई के दौरान पूछताछ नहीं की गई.

उनका कहना है कि अनीता ने बाद में जेजे अस्पताल में मारे गए हमलावरों की शिनाख्त की थी.

Image caption सोलकर का कहना है कि पवार की नियुक्ति नियम के विरुद्ध थी

अमीन सोलकर ने एक अन्य गवाह आरपीएफ के सिपाही पारसनाथ गिरी का भी ज़िक्र किया जिनके सीने में छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पर चरमपंथियों की गोली लगी थी. उनका कहना था कि निचली अदालत में उस जवान से भी पूछताछ नहीं की गई.

सोलकर का कहना था कि चरमपंथियों की गोली से मारे गए पुलिस अधिकारी हेमंत करकरे और अन्य पुलिसकर्मियों के बीच उस दिन की बातचीत के विवरण भी पेश नहीं किए गए जिससे गामा अस्पताल के समीप हुई हलचल पर प्रकाश पड़ सकता था.

यहीं से कसाब और अबू इस्माइल भागे थे और बाद में कसाब को पकड़ लिया गया था.

अमीन सोलकर ने बचाव पक्ष के वकीलों की नियुक्ति पर भी सवाल उठाए.

उनका कहना था कि बचाव पक्ष के लिए वकील अब्बास काज़मी की नियुक्ति ग़लत थी क्योंकि वह क़ानूनी सहायता प्रदान करने वाले पैनल से नहीं थे.

उनका कहना था कि विशेष अदालत के न्यायाधीश ने यह स्पष्ट नहीं किया था कि काज़मी की नियुक्ति किस आधार पर की गई थी.

सोलकर का कहना था कि जिस मामले में फांसी की सज़ा की संभावना हो ऐसे मामलो में क़ानूनी सहायता पैनल से एक वरिष्ठ और एक कनिष्ठ वकील की नियुक्ति बचाव पक्ष के लिए की जानी चाहिए.

दूसरे वकील पवार को बचाव पक्ष के लिए वरिष्ठ वकील के रूप में नियुक्त पर सवाल उठाए और कहा कि कि एक कनिष्ठ वकील वरिष्ठ कैसे हो सकता है.

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