'बहुत मज़बूत होना होता है यहां'

सुमित निझावन

मुंबई फ़िल्मोद्योग में छोटे शहरों के लोग अब धीरे-धीरे अपना मुकाम बना रहे हैं. इस श्रृंखला में आपको मिलवाएंगे ऐसे ही कुछ लोगों से जो संघर्ष की सीढ़ी चढ़ कर फ़िल्मोद्योग में सफल हुए हैं.

सुमित निझावन उन अभिनेताओं में से हैं जो बहुत सोच समझ कर रोल चुनते हैं और रोल पसंद न हों तो बड़े निर्देशकों को भी मना कर देते हैं.

सुमित, फ़िल्मों में कैसे आना हुआ और क्यों आना हुआ?

फ़िल्मों में रुचि शुरु से ही थी. बड़े कलाकारों से प्रेरित भी होता था. मैं मेरठ से हूं. दिल्ली, चंडीगढ़ में पढ़ा. दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में भी पढ़ाई की. मम्मी पापा चाहते थे कि मास्टर्स कर लूं फिर जो चाहे करुं. पढ़ना मैं भी चाहता था.

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क्या अभिभावक चिंतित थे जब फ़िल्म उद्योग को चुना?

हां चिंतित तो थे क्योंकि ये एक ऐसा फ़ील्ड है जहां सफलता पक्की नहीं होती लेकिन मैं मुंबई आया और साल भर में ही जैकी श्राफ की एक फ़िल्म मिली 'तुम हो ना'. ये सहारा चैनल पर रीलिज़ हुई. फ़िल्म बुरी गई. टीवी पर रीलिज़ हुई लेकिन घरवालों को लगा कि मैं काम जानता हूं. कुछ कर लूंगा.

मुंबई के शुरुआती दिन कैसे थे?

सांस्कृतिक रुप से झटका लगा मुंबई में. मिलने के तौर तरीक़े रवैये मुंबई में अलग हैं. लोग प्रोफेशनल होते हैं. काम से काम रखते हैं. ये बात सबसे पहले महसूस की. मैंने किसी इंस्टीट्यूट से एक्टिंग की ट्रेनिंग नहीं ली लेकिन नुक्कड़ नाटक ख़ूब किए थे.

किस तरह का संघर्ष करना पड़ा?

बड़ा बुरा लगता था. अपनी फोटो लेकर डायरेक्टर के पास जाते हैं और डायरेक्टर का सातवां असिस्टेंट आपकी फोटो देखे बिना आपको रिजेक्ट कर देता है. बहुत कठिन होता है वो दौर. लेकिन इसका कोई और तरीक़ा नहीं है. इंडस्ट्री में मुझे कोई जानता नहीं था. लेकिन मुझे लगता था कि टिके रहने पर सफलता मिलेगी.

क्या इंडस्ट्री में छोटे शहरों के लोग अपनी पहचान बना रहे हैं?

मैं ये रिस्क लेकर आया था कि अगर मुंबई में कुछ करना है तो बहुत मजबूत होना होगा. दिक्कत होती ही है छोटे शहरों से आने पर क्योंकि यहां कोई हमारा माई बाप नहीं होता है अगर हम इंडस्ट्री से जुड़े नहीं हों तो. अब तो काम मिला है मुझे. सरकार में था. और भी फ़िल्में हैं. राम गोपाल जी के साथ काम कर रहा हूं. लेकिन अभी बड़े ब्रेक का इंतज़ार है.

क्या इंडस्ट्री में ऐसे लोग बढ़ रहे हैं?

बिल्कुल बढ़ रहे हैं. ये इंडस्ट्री प्रतिभा को पहचानती है. अगर आपका कोई माई बाप है तो ब्रेक जल्दी भले ही मिल जाए लेकिन आप आगे नहीं बढ़ सकते अगर आपके अंदर प्रतिभा नहीं है.

आपकी नई फ़िल्म?

ये ओबामा और मंदी के दौर से जुड़ी है. अमरीका में मंदी के दौर का उत्तर प्रदेश के अपहरण उद्योग पर क्या प्रभाव पड़ा है इस पर एक कटाक्ष करती हुई फ़िल्म है. मैं इसमें एक गैंगस्टर का रोल कर रहा हूं.

Image caption सुमित मानते हैं कि चरित्रों के मामले में छोटे शहर के लोगों का अनुभव संसार बड़ा होता है

क्या छोटे शहरों के लोगों का रवैया इंडस्ट्री के बारे में बदला है?

असल में ये सब्जेक्टिव मामला है. अभी भी लोगों के अंदर एक हिचकिचाहट रहती है क्योंकि इस इंडस्ट्री में गारंटी नहीं है कि काम मिलेगा या नहीं. किसी और करियर में दिल दिमाग से काम करें तो सफलता मिलेगी लेकिन यहां किस्मत बहुत काम करती है.

कोई निजी अनुभव?

कई बार ऐसा होता है कि पैसे नहीं होते हैं लेकिन मेरे पास दोस्तों की कमी नहीं थी. इस मामले में किस्मत अच्छी रही. कभी दुःखी नहीं होने दिया. प्रतिभा पर लोगों ने यकीन किया. मैं कम निर्देशकों से ही मिला. जहां कहीं पर काम नहीं मिला तो उनके कारण मैं मान लेता था. किसी ने बेइज्जती तो नहीं की लेकिन कई बार ऐसा ज़रुर लगा कि मैं किसी निर्देशक के पास क्यों गया क्योंकि मिलने के बाद लगता था कि मैं शायद इनके साथ काम करना ही नहीं चाहता था.

आप बड़े निर्देशकों को भी मना कर देते हैं अगर आपको उचित नहीं लगता है तो?

हां ऐसा हो सकता है लेकिन जो अच्छे निर्देशक हैं वो ऐसा करते नहीं है. मैंने कुछ लोगों को मना ज़रुर किया है लेकिन उनको जो मुझे समझते हैं. मैं नाचने गाने वाले हीरो के चरित्र में फिट बैठता नहीं हूं. मैं अच्छा एक्टर बनना चाहता हूं काम अच्छा होगा तो लोग पसंद करेंगे ही.

छोटे शहरों के लोगों की दिक्कतें?

मानसिक रुप से मज़बूत होना पड़ता है. क्योंकि उनके पास सपोर्ट सिस्टम नहीं होता है. हां, उसका एक फायदा होता है कि जो चीजें, जो चरित्र आपने देखी होती हैं वो इंडस्ट्री में रहने वालों को नहीं पता होता है. उन्होंने वो देखा नहीं होता है जो छोटे शहरों के लोग देख कर अनुभव कर आते है. वो अपनी एक यात्रा पूरी कर के आते हैं तो शायद कई भूमिकाएं वो बेहतर अदा कर पाते हैं.