टीका या अंधेरे में तीर?

  • 1 दिसंबर 2010
Image caption पूर्वी उत्तर प्रदेश के सात ज़िलों में जापानी इंसेफ़्लाइटिस के ख़िलाफ़ टीकाकरण अभियान शुरु किया गया है.

उत्तर प्रदेश में दिमागी बुखार के दर्ज किए गए कुल मामलों में से 15 प्रतिशत मामलों के लिए जापानी इंसेफ़्लाइटिस को ज़िम्मेदार माना गया है लेकिन बाकी बचे 85 प्रतिशत मामलों के लिए कौन सा वायरस ज़िम्मेदार है इसकी पहचान अब तक नहीं हो पाई है.

पूर्वी उत्तर प्रदेश के सात ज़िलों में मंगलवार 30 नवंबर से जापानी इंसेफ़्लाइटिस के ख़िलाफ़ टीकाकरण अभियान शुरु किया गया है.

गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज के सोशल और प्रिवेंटिव मेडिसिन विभाग के प्रमुख डॉ डीके श्रीवास्तव कहते हैं "दिमागी बुखार की जो हम बात कर रहे हैं, उसमें 12 से 15 प्रतिशत मामले ही हैं जिन्हें हम जापानी इंसेफ़्लाइटिस कहते है. बाक़ि जो है उसके बारे में अभी कुछ पता नहीं है."

यही वजह है कि इस टीकाकरण अभियान से एक सीमित लक्ष्य ही हासिल हो पाने की उम्मीद है.

डॉ श्रीवास्तव कहते हैं "हम जो टीकाकरण कर रहें है उससे हम दरअसल 15 प्रतिशत मामले ही कम करने की कोशिश कर रहे है."

उनका कहना है कि इससे पहले भी 2006 में उत्तर प्रदेश में टीकाकरण अभियान चलाया गया था लेकिन वो सघन नहीं था और उसके बाद लगातार टीकाकरण नहीं हो पाया जिससे पहले प्रयास के पूरे परिणाम नहीं आ सके .

स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आज़ाद ने 10 नवंबर को राज्यसभा में दिए गए लिखित जवाब में स्वीकार किया था कि दिमागी बुखार की वजह से पूरे भारत में 2,453 मौतें हो चुकी है, जिनमें से 1,738 उत्तर प्रदेश में हुई हैं.

साल 2005 में दिमागी बुखार की वजह से फैली महामारी के बाद राष्ट्रीय वायरोलॉजी संस्थान की शाखा गोरखपुर में खोली गई जिससे इस बीमारी की पहचान जल्द हो सके.

राष्ट्रीय वायरोलॉजी संस्थान ही दिमागी बुखार के वायरस की पहचान के लिए अनुसंधान कर रहा है, लेकिन पिछले चार वर्षों में वायरस की पहचान में कोई खास प्रगति नहीं हो पाई है.

राष्ट्रीय वायरोलॉजी संस्थान की गोरखपुर शाखा के प्रमुख डॉ मिलिंद गोरे कहते है " इसके बारे में नेशनल इंस्टिट्युट ऑफ वायरोलॉजी में अनुसंधान चल रहा है. 2006 से अब तक एक या दो प्रतिशत मामलों में पानी से जनित वायरस के अंश पाए है, लेकिन कितना है, क्या है इसके बारे में जानकारी नहीं है."

डॉ मिलिंद गोरे कहते है कि विदेशों में भी इस तरह के वायरस की पहचान मुश्किल होती है लेकिन वहां 30-40 प्रतिशत मामलों में वायरस की पहचान हो जाती है.

वायरस का पता न होना इस बीमारी से लडाई का सबसे कमज़ोर पहलू है.

पूर्वी उत्तर प्रदेश में यह जानलेवा बीमारी 32 साल पहले 1978 में आई और तब से हज़ारों बच्चों की जाने गईं और हज़ारों विकलांग हो गए. लेकिन अभी तक यह बीमारी सरकार के एजेंडे में प्राथमिकता सूची में नही आ पाई है.

संबंधित समाचार