पत्रकार सोचें,सत्ता से उचित दूरी क्या?

पत्रकारिता में भ्रष्टाचार को रोकने के लिए दिशा निर्देशों की ज़रूरत है और संपादक उद्योगजगत और नेताओं के दबाव के आगे झुकने से मना करें-नीरा राडिया टेप प्रकरण पर हुई चर्चा में ये बात उभरकर सामने आई जहाँ मीडिया की लगभग सभी बड़ी हस्तियाँ मौजूद थीं.

दिल्ली में प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया में आयोजित इस चर्चा में इस बात पर भी सहमति दिखी कि पत्रकार निर्धारित करें कि सत्ता से उचित दूरी क्या है.

प्रसार भारती की अध्यक्ष मृणाल पांडे ने कहा कि असल समस्या मीडिया के मालिकाना हक़ को लेकर है. मीडिया घराने के मालिक ही संपादक बनने लगे है. मृणाल पांडे ने कहा, "मालिक जब बाज़ार से पैसा उठाते हैं, तो उनकी जवाबदेही पाठक के प्रति होगी या शेयर धारकों के प्रति?"

इसी मंच पर मौजूद वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर ने कहा कि असल समस्या पत्रकारों की नौकरी को लेकर है. आजकल पत्रकारों को करार पर रखा जाता है जो पत्रकारों के लिए बनाए गए वर्किंग जर्नलिस्ट ऐक्ट का उल्लंघन है.

एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष राजदीप सरदेसाई ने कहा, "कुछ पत्रकार ख़ासकर संपादक ख़ुद को पाक-साफ़ बताते हुए टीवी और अख़बार में जो आलोचना कर रहे हैं, वो मुझे सबसे ज़्यादा चौंकाती है जबकि उनमें से ज़्यादातर के पिछले काम को हम जानते हैं और ये भी की ये सड़न पिछले 20 साल में आई है."

मेल टुडे की संवाददाता पूर्णिमा जोशी ने एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष राजदीप सरदेसाई का ब्यान सुनने के बाद कहा, "मुझे ये जानकर बेहद दुख हो रहा है कि एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष उन पत्रकारों का बचाव कर रहे हैं जो एक व्यापारिक घराने का संदेश दूसरे व्यापारिक घराने तक पहुँचा रहे हैं. आप को राजनैतिक जानकारी के लिए नीरा राडिया से खबर लेने की ज़रूरत है, आप करुणानिधि से सीधे क्यों नहीं पूछते हैं."

जिन पत्रकारों का नाम इन टेप में आ रहा है उन पर राजदीप सरदेसाई ने अपने संबोधन में कोई कड़ा रुख अपनाने से परहेज़ किया.

सवाल

Image caption राजदीप सरदेसाई ने सवाल करने वाले पत्रकारों के पास जाकर अपना पक्ष रखने की कोशिश की

उन्होने ये सवाल भी किया कि जिन पत्रकारों के नाम आए, उनका पक्ष पत्रिका ने क्यों नहीं छापा.

राज़दीप सरदेसाई ने कहा, "दोनों पत्रकारों की हो रही आलोचना के बीच क्या आप गंभीरता से मानते हैं कि पत्रकारों के बीच हुई बातचीत से मनमोहन सिंह और करुणानिधि कैबिनेट निर्धारित करेंगे? पत्रिका में लेख लिखते वक़्त ये शक ज़ाहिर क्यों नहीं किया गया."

आउटलुक पत्रिका के संपादक विनोद मेहता ने इस आरोप से इनकार करते हुए कहा कि पत्रिका का अगला अंक पत्रकारों के जवाब पर आधारित है जो आज बाज़ार में आ चुका है.

वहाँ मौजूद कई पत्रकारों ने राजदीप पर इस मामले में नरम रुख़ अपनाने का आरोप लगाया. इस पर उन्होंने कहा कि वो किसी भी तरह उन पत्रकारों का बचाव नहीं कर रहे हैं.

कई पत्रकारों ने सवाल किया कि अगर किसी नेता के ख़िलाफ़ ख़बर छापते समय उनका पक्ष रखने की परवाह नहीं की जाती तो आप पत्रकारों के लिए इसकी उम्मीद क्यों करते हैं.

कुछ ने सवाल उठाया कि क्या कभी किसी नेता और अपराधी को उनके ही ख़िलाफ कार्रवाई के लिए नियुक्त करते सुना है, तो फिर ये उम्मीद क्यों की जाती है कि पत्रकार इस मामले में न्याय कर पाएँगे. क्यों नहीं इस मामले की जाँच कोई कोर्ट या एजेंसी करें.

सुझाव ये भी आया कि नेताओं और न्यायाधीशों की तरह पत्रकार भी अपनी संपत्ति सार्वजनिक करें.

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