भारत-पाक में हुआ था गुप्त समझौता

मुंबई हमला

मुंबई में 26 नवंबर, 2008 को हुए चरमपंथी हमलों के क़रीब एक महीने बाद हुए एक गोपनीय समझौते में पाकिस्तान ने इस मामले की जाँच की सूचनाएँ भारत के साथ साझा करने की सहमति दी थी. यह समझौता अमरीका की मध्यस्थता से हुआ था.

इस समझौते की जानकारी विकीलीक्स पर प्रकाशित ताज़ा दस्तावेज़ों से मिली है.

इन दस्तावेज़ों के अनुसार पाकिस्तान में अमरीकी राजदूत एन पैटरसन ने तीन जनवरी, 2009 को वॉशिंगटन भेजे गए अपने संदेश में कहा है, "सीआईए के इस आश्वासन के बाद कि सूचनाएँ सिर्फ़ ख़ुफ़िया विभागों के बीच रहेंगी आईएसआई के महानिदेशक (अहमद शुजा) पाशा ने इस बात की सहमति दी है कि वे (मुंबई हमलों की) पाकिस्तान की जाँच की 'टियरलाइन' सूचनाएँ भारतीय ख़ुफ़िया विभाग के साथ साझा करेंगे."

ख़ुफ़िया विभाग के मुहावरों की दृष्टि से देखें तो 'टियरलाइन' ख़ुफ़िया सूचनाओं के बीच एक विभाजन रेखा होती है और वह उन सूचनाओं को अलग करती है जिन्हें विदेशी सरकारों के साथ साझा करने की अनुमति होती है.

Image caption एन पैटरसन ने निभाई थी अहम भूमिका

उल्लेखनीय है कि 26 नवंबर को मुंबई में हुए चरमपंथी हमलों में 183 लोगों की मौत हुई थी और बहुत से लोग घायल हुए थे. हताहतों में अमरीकी सहित दूसरे विदेशी नागरिक भी थे.

इन हमलों के लिए भारत ने पाकिस्तान के चरमपंथी गुटों को दोषी ठहराया था और इसके बाद से दोनों देशों के बाद तनाव बढ़ गया था. इन हमलों के बाद ही भारत ने पाकिस्तान के साथ चल रहे शांति वार्ता को स्थगित कर दिया था.

पहले तो पाकिस्तान इस पूरे मामले से पल्ला झाड़ने की कोशिश करता दिखा लेकिन बाद में उसने सहयोग की बात कही.

कई संदेश

विकीलीक्स के दस्तावेज़ों के अनुसार एन पैटरसन ने अपने संदेश में कहा था कि अमरीकी प्रशासन भारत सरकार पर यह दबाव बनाए कि वह मुंबई हमलों की अपनी जाँच की उन जानकारियों को सार्वजनिक न करे, जिससे सूचना आदान-प्रदान के इस नए समझौते पर आँच आए.

इस संदेश में एन पैटरसन ने कहा है, "यदि भारत अपनी जाँच के नतीजों की जानकारी पाकिस्तान को दिए बिना सार्वजनिक करके पाशा पर दबाव बनाएगा, तो इससे पाकिस्तान को जाँच जारी रखने में अड़चन आएगी, पाकिस्तान में लोगों की नाराज़गी बढ़ेगी और व्यक्तिगत रूप से पाशा कमज़ोर पड़ेंगे."

दिलचस्प यह है कि इस संदेश को भेजे जाने के दो दिन बाद भारत ने मुंबई के बारे में हुई जाँच के ब्यौरे पाकिस्तान के उच्चायुक्त को सौंपे थे. इन हमलों की जानकारी बाद में दूसरे देशों के साथ भी साझा की गई थी.

इन 'टियरलाइन सूचनाओं' का ज़िक्र एन पैटरसन के एक और संदेश में भी हुआ है जो उन्होंने दो जनवरी, 2009 को पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी से हुई मुलाक़ात के बाद भेजा था.

पाँच जनवरी, 2009 को भेजे गए एक संदेश में कहा गया है, "ज़रदारी को आईएसआई के निदेशक लेफ़्टिनेंट जनरल पाशा ने डीसीआईए (डायरेक्टर, सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी) के साथ वॉशिंगटन में हुई अपनी मुलाक़ात का ब्यौरा दिया है और उन्होंने भारत को 'टियरलाइन' सूचनाएँ भारत को देने की मंज़ूरी दे दी है."

'अपरिपक्व क़दम'

Image caption अमरीका चाहता था कि पाशा पर दबाव न बने

इससे पहले भेजे गए अपने एक और संदेश में एन पैटरसन ने कहा है कि उनकी दृष्टि में जाँच पूरी होने से पहले मुंबई हमलों से जुड़ी सूचनाएँ सार्वजनिक करना भारतीयों का एक अपरिपक्व क़दम था.

पाकिस्तान में अमरीका की राजदूत एन पैटरसन ने कहा है, "अभी एफ़बीआई ने उन सूचनाओं की एक लंबी सूची भारतीयों को सौंपी है जिसकी ज़रुरत उन्हें अपनी जाँच को आगे बढ़ाने के लिए है."

यह महत्वपूर्ण है कि राजदूत की राय में मुंबई हमलों के लिए ज़िम्मेदार चरमपंथी गुट लश्करे तैबा की 'पनाहगाहें' भारत, नेपाल, बांग्लादेश और पाकिस्तान में अभी भी सक्रिय हैं.

तीन जनवरी को भेजे गए अपने संदेश में उन्होंने कहा है, "इस तरह के किसी बड़े हमले को रोकने के लिए हमें सहयोग और सूचनाएं साझा करने का रास्ता खुला रखना होगा...हमारा लक्ष्य न केवल मुंबई हमलों की साज़िश रचने वालों को सज़ा दिलाना है बल्कि बातचीत भी शुरु करना है जिससे कि भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव कम हो सके."

उल्लेखनीय है कि मुंबई हमलों की जाँच में अमरीका ने सक्रिय भूमिका निभाई है. इन हमलों की जाँच के लिए एफ़बीआई की टीम ने भारत का दौरा भी किया था.

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