माओवादी मना रहे हैं छापामार सेना के दस वर्ष

माओवादी (फ़ाइल फ़ोटो)
Image caption माओवादी अपने प्रभाव क्षेत्र में लोगों को हथियार इस्तेमाल करने का प्रशिक्षण भी देते हैं.

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) अपनी जनमुक्ति छापामार सेना यानी 'पीएलजीए' के गठन के दस वर्ष मना रही है और छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में जनजीवन अस्त व्यस्त हो गया है.

नक्सल हिंसा का केंद्र माने जाने वाले इस संभाग में कई जगहों पर पेड़ काट कर मार्ग अवरुद्ध करने की ख़बरें आ रहीं है.

कई इलाकों में पुलिस ने दावा किया है कि उसने पोस्टर बरामद किए हैं, जिनमें माओवादियों ने तीन सप्ताह के बंद का आह्वान किया है.

इन ख़बरों से जनजीवन पर ख़ासा असर पड़ने लगा है.

लेकिन संगठन ने स्पष्ट किया है कि जनमुक्ति छापामार सेना के 10वें स्थापना वर्ष में हो रहे आयोजनों के दौरान कोई बंद नहीं रहेगा.

इन बातों का खंडन करते हुए छत्तीसगढ़ में माओवादियों के प्रवक्ता गुड्सा उसेंडी ने कहा है कि उनके संगठन ने बंद का आह्वान नहीं किया है.

इस बाबत पूछे जाने पर बस्तर के पुलिस महानिरीक्षक पी लोंग्कुमेर का कहना था,"हमारी जानकारी के अनुसार माओवादी बंद मना रहे हैं."

दूसरी तरफ बीबीसी से बात करते गुड्सा उसेंडी ने कहा कि, "पीएलजीए की दसवीं वर्षगाँठ 2 दिसंबर से पूरे माह चलेगी. इस दौरान गाँव-गाँव में और जगह-जगह क्रांतिकारी प्रचार, रैली, जुलूस और सभा-सम्मेलनों का कार्यक्रम चलेगा. हम यह भी स्पष्ट करते हैं कि इस दौरान बंद का कोई आयोजन नहीं होगा. तीन सप्ताह तक बंद का जो प्रचार हो रहा है, उससे हमारा कोई लेना देना नहीं है."

पीएलजीए

हालाँकि माओवादी दंडकारण्य के इलाकों में तीन दशकों से भी ज़्यादा से सक्रिय हैं, लेकिन पीएलजीए की स्थापना 2 दिसंबर वर्ष 2000 में हुई.

पीएलजीए के गठन से पहले गुरिल्ला दस्ते और संगठन के कार्यकर्ता ही संगठन और और उसकी निजी सेना के कार्यभारों को पूरा करते थे.

पीएलजीए की स्थापना के बाद से कमीशन, कमानों और फार्मेशनों का गठन हुआ.

गुड्सा उसेंडी का दावा है कि छापामार सेना के गठन के बाद इन दस वर्षों में माओवादियों के प्रभाव का विस्तार हुआ है.

आज माओवादी दावा करते हैं कि उन्होंने कई लाख एकड़ ज़मीन ज़मींदारों के कब्ज़े से वापस लेकर उसे जनता के बीच बाँट दिया है.

उसेंडी कहते हैं कि "अब मिसाल के तौर पर दंडकारण्य को ले लीजिए. यहाँ गाँव और इलाक़ा स्तर पर जनता की राजसत्ता कायम कर ली गयी है. यहाँ सरकार की संस्थाएँ जनता के चौमुखी विकास को लेकर काम कर रहीं हैं."

कार्यशैली में बदलाव

मगर एक लंबे अरसे से माओवादी संघर्ष पर नज़र रखने वालों को लगता है कि पिछले कुछ वर्षों में माओवादियों की कार्यशैली में भी काफ़ी बदलाव आया है.

पीएलजीए के गठन के बाद से जन अदालतों का प्रभाव या यूँ कहा जाए चलन, कम हुआ है.

ऐसे आरोप लग रहे हैं कि जन अदालतों की बजाय हथियारबंद दस्ते अब जनता पर ख़ुद फ़ैसले थोप देते हैं.

Image caption पुलिस के मुताबिक माओवादियों से ये हथियार पश्चिम बंगाल में बरामद किए गए थे.

इनमें सबसे ज़्यादा मामले पुलिस की मुखबिरी का आरोप लगाकर की जाने वाली हत्याएं हैं.

पहले मुखबिरी के आरोपियों को जन अदालतों में पेश किया जाता था मगर अब हथियारबंद लोग उनके भाग्य का फ़ैसला ख़ुद करते हैं.

उसेंडी ने इन बातों का खंडन किया है.

आम लोगों पर हमले

इसके अलावा आम लोगों पर हो रहे हमलों में भी बढ़ोतरी हुई है.

माओवादी पहले यात्री वाहनों को अपना निशाना नहीं बनाया करते थे लेकिन झारखंड के लातेहार में दो बार ट्रेनों को माओवादियों ने घंटों अपने कब्ज़े में रखा.

ज्ञानेश्वरी ट्रेन हादसा हो या फिर छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में दो बार माओवादियों द्वारा यात्री बस पर हमले की घटनाएं, इन हमलों में सैकड़ों आम लोगों की जाने गईं.

इस पर गुड्सा उसेंडी ने सफ़ाई देते हुए कहा कि, "हम आम लोगों को निशाना नहीं बनाते हैं. हम उनके लिए ही संघर्ष कर रहे हैं. ज्ञानेश्वरी ट्रेन हादसे में हमारा कोई हाथ नहीं था. अलबत्ता दंतेवाड़ा में यात्री बस पर जो हमला हुआ जिसमें सुरक्षा बलों के साथ ग्रामीण मारे गए थे, वह हमारे दस्ते ने अंजाम दिया था. इसपर हमने सार्वजनिक रूप से माफ़ी भी मांग ली है. यह एक बड़ी चूक थी."

आंदोलन में बदलाव

Image caption माओवादियों के साथ कई महिलाएँ भी काम करती हैं,पुलिस का ये दावा है.

माओवादी मानते हैं कि समय के अनुरूप आंदोलन की रूपरेखा या तौर-तरीकों में बदलाव आता है.

मगर उनका दावा है कि जनमुक्ति छापामार सेना के गठन के बाद से उनका आंदोलन और मज़बूत और प्रभावशाली हुआ है.

पिछले दस सालों में माओवादी आंदोलन के दो प्रमुख बिंदु रहे हैं.

पहला, 2 दिसंबर 2000 को जनमुक्ति छापामार सेना का गठन और दूसरा 2004 में पीपुल्स वार और माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी) के विलय के बाद भरत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) का गठन.

कहा जा रहा है कि ऊपर के स्तर पर तो विलय क़ामयाब रहा है मगर नीचे के स्तर पर दोनों संगठनों में आपसी तालमेल सुनिश्चित नहीं हो पाया है.

उसेंडी इसे नहीं मानते. वो कहते हैं, "ऐसा लगता है, मगर यह हक़ीक़त नहीं है. हाँ, यह ज़रूर है कि कई शीर्ष नेता या तो मारे गए हैं या पकड़े गए हैं. इससे संगठन को धक्का ज़रूर लगा है. मगर आपसी ताल-मेल में कोई कमी नहीं आई है. विलय पूरी तरह क़ामयाब है और हम इसके बाद और मज़बूत हुए हैं."

बहरहाल अपने आधार के इलाक़ों में पीएलजीए की दसवीं वर्षगाँठ को लेकर माओवादियों नें वृहद् कार्यक्रमों की रूप रेखा तय की है जिसको लेकर राज्य सरकार गंभीर है. माओवादियों के इस आयोजन को लेकर पूरे राज्य में अलर्ट जारी किया गया है.

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