पाइपलाइन पर अंतत: सहमति

Image caption पाइपलाइन बिछाने पर आठ अरब डॉलर की लागत आएगी

तुर्कमेनिस्तान ने अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और भारत के साथ गैस पाइपलाइन बिछाने संबंधी एक अहम समझौते पर अश्काबात में हस्ताक्षर किए हैं.

यह पाइपलाइन 1700 किलोमीटर लंबी होगी और अफ़ग़ानिस्तान-पाकिस्तान से गुज़कर भारत तक आएगी.

जिस समझौते पर हस्ताक्षर किए गए हैं उसे 'फ्रेमवर्क एग्रीमेंट' कहा जा रहा है यानी सिद्धांत रूप में चारों देश इस योजना पर सहमत हैं और अब इसे परियोजना की शक्ल देने का काम शुरू हो सकता है.

अफ़ग़ानिस्तान को इस पाइपलाइन से काफ़ी उम्मीदें हैं, अनुमान है कि इसकी वजह से 12 हज़ार लोगों को रोज़गार मिलेगा और अपनी ज़मीन का इस्तेमाल करने देने के बदले में उसे रॉयल्टी की मोटी रकम हासिल होगी.

अगले क़दम के तौर पर निजी ऊर्जा कंपनियों से प्रस्ताव मँगाए जा रहे हैं कि वे किस तरह इस पाइपलाइन का निर्माण करेंगे.

इस पाइपलाइन को बिछाने में आठ अरब डॉलर की लागत आएगी, यह पाइपलाइन तुर्कमेनिस्तान के दौलताबाद गैसफ़ील्ड से चलकर भारत के फ़ाज़िल्का तक आएगी.

जानकारों का कहना है कि यह आसान काम नहीं होगा क्योंकि पाइपलाइन का हिस्सा अफ़ग़ानिस्तान के उस इलाक़े से भी गुज़रेगा जहाँ तालिबान का नियंत्रण है, इसके अलावा पाकिस्तान के कबायली इलाक़े में पाइपलाइन की सुरक्षा एक कड़ी चुनौती होगी.

इस परियोजना पर पिछले 15 वर्षों से बातचीत चल रही थी और अभी भी इसके पूरे होने में कितना समय लगेगा यह कहना मुश्किल है.

अमरीकी समर्थन

इस परियोजना को अमरीका का खुला समर्थन हासिल है, अमरीका ईरान से पाकिस्तान के रास्ते भारत गैस ले जाए जाने का विरोध करता रहा है.

तुर्कमेनिस्तान के पास प्राकृतिक गैस का दुनिया का चौथा सबसे भंडार है और वह पिछले कुछ समय से नए ग्राहकों की तलाश में रहा है.

कभी सोवियत संघ का हिस्सा रहा तुर्कमेनिस्तान गैस को रूस के रास्ते यूरोपीय बाज़ार में बेचने का भी इच्छुक है.

तुर्कमेनिस्तान से 1800 किलोमीटर लंबी एक पाइपलाइन के ज़रिए चीन को पहले ही गैस की सप्लाई जारी है.

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