बदली ज़िंदगी

दिल्ली विश्वविद्यालय में रिक्शा चलाने वालों की परेशान हाल ज़िंदगियों को विश्वविद्यालय के कुछ छात्रों ने पूरी तरह से बदल दिया है.

रिक्शा चालकों की समस्याओं और मजबूरियों पर कभी किसी का ध्यान नहीं जाता था. इस पर वाणिज्य की पढ़ाई के लिए देशभर में विख्यात श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के छात्रों का ध्यान गया और इनकी जिंदगी में बदलाव लाने की पहल की.

दिल्ली विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैंपस में एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए छात्र ज्यादातर रिक्शे का इस्तेमाल करते हैं. ये रिक्शाचालक किराए पर रिक्शा लेकर दिनभर कैंपस में रिक्शा चलाते हैं और अपने परिवार का भरणपोषण करते हैं.

रिक्शा चलानेवालों का कहना है कि कभी इनके रिक्शे को पुलिस पकड़ लेती है तो कभी कॉरपोरेशन के कर्मचारी उठा ले जाते हैं. रिक्शा किराए पर देनेवाले ठेकेदार भी तरह-तरह से इनका शोषण करते हैं.

रिक्शाचालक राजू हलधर कहते हैं, ''साइफ के रिक्शे से मुझे बहुत फायदा हुआ है. पहले किराये का रिक्शा चलाते थे हर दिन 40 रुपए देने पड़ते थे. अब ये हमें 250 रुपए देते हैं फिर भी हमें फायदा है. इस रिक्शे में लोग बहुत शौक से बैठते हैं और हमें दो-चार-पांच रुपए ज्यादा ही देकर जाते हैं.''

वहीं साइफ एसआरसीसी का ही रिक्शा चलानेवाले सुनील कर्मकार कहते हैं, ''पुलिसवाले, ट्रैफ़िक वाले इज़्ज़त करते हैं. पहले तो देखते ही भगा देते थे लेकिन अब श्रीराम कॉलेज की वजह से हमें इज़्ज़त मिलती है.''

एक और रिक्शाचालक रामशिरोमणि कहते हैं कि साइफ के रिक्शे की वजह से हमारी आय की सुरक्षा बढ़ी है. साथ ही हमारी नियमित स्वास्थ्य जांच की जाती है और हमारे बच्चों की पढ़ाई का ध्यान रखा जाता है. इससे हम बेहद खुश हैं.

अंतरराष्ट्रीय संस्था साइफ यानि स्टूडेंट्स इन फ्री इंटरप्राइजेज़ के तत्वावधान में श्रीराम कॉलेज के चुनिंदा छात्र आज इस काम को बखूबी अंजाम दे रहे हैं.

एसआरसीसी में साइफ की उपाध्यक्ष अशिमा गुप्ता बताती हैं, ''रिक्शेवाले दिनभर जीतोड़ मेहनत करते हैं. सर्दी हो गर्मी या बरसात हर मौसम में वो दो पैसे कमाने के लिए कैंपस में जगह-जगह खड़े रहते हैं, लेकिन फिर भी उनके नियमित आय की कोई गारंटी नहीं होती.''

छात्रों की पहल

साइफ एसआरसीसी के छात्रों ने कैंपस के रिक्शाचालकों की मदद के लिए दो योजनाएं शुरू कीं. पहली योजना के तहत पंजाब नेशनल बैंक से लोन पर रिक्शाचालकों की पहचान सुनिश्चित कर नया रिक्शा दिया गया.

बदले में चालकों को अपनी रोज़ की कमाई से 40 रुपए साइफ को जमा कराने होते हैं और 52 हफ्तों में रिक्शा उनका हो जाता है.

कैंपस में रिक्शे तो पहले से ही चल रहे थे. छात्रों के सामने चुनौती ये थी कि उनका रिक्शा पहले से चल रहे रिक्शों से अलग हो, वो रिक्शाचालकों के लिए आरामदायक हो साथ ही उसकी अलग पहचान विकसित हो सके. इसके लिए उन्होंने रिक्शे को अलग तरीके से डिजाइन करवाया.

रिक्शे के ऊपर का शेड ऐसा बनवाया गया जो चालक को भी छाया दे सके. उसमें बोतल रखने की जगह बनाई गई. पेपर होल्डर बनाया गया. साथ ही रिक्शे के पीछे की जगह विज्ञापन के लिए खाली रखी गई.

छात्रों की पहल पर टाइम्स ऑफ इंडिया ने साइफ के मौजूदा 100 रिक्शों के लिए मुफ्त में अखबार की कॉपी देना शुरू कर दिया. इसके साथ ही छात्रों ने रिक्शाचालकों को एक नीली वर्दी भी बनाकर दी ताकि उन्हें अलग पहचान मिल सके.

छात्रों की इस कोशिश का नतीजा ये है कि अब कैंपस मे एसआरसीसी के इन रिक्शों की एक अलग पहचान बन गई है.

सवारियां ज्यादातर इसी रिक्शे पर बैठना पसंद करती हैं. नीली वर्दी और अलग डिजाइन वाले रिक्शे की वजह से रिक्शाचालकों को अब जिल्लत नहीं झेलनी पड़ती, लोग उन्हें अब एक अलग नजरिये से देखते हैं. यहां तक की ठेकेदार का रिक्शा चलानेवाले रिक्शाचालक भी अब चाहते हैं कि उन्हें भी ऐसा ही रिक्शा मिल जाए.

डीयू दर्शन

रिक्शाचालकों की एक अन्य बड़ी समस्या ये थी कि शनिवार और रविवार को जब विश्वविद्यालय में अवकाश होता है तो उन्हें काफी कम सवारी मिल पाती थी.

एसआससीसी के इन छात्रों ने रिक्शाचालकों की इस समस्या के निदान के लिए डीयू दर्शन की शुरुआत की.

Image caption छात्र रिक्शा चालकों की जिंदगी में बदलाव लाना चाहते हैं

इस दूसरी योजना के बारे में साइफ एसआससीसी अध्यक्ष महक नान्नर बताती हैं कि डीयू दर्शन के तहत पर्यटकों को दिल्ली विश्वविद्यालय के भीतर आठ स्थानों की सैर कराई जाती है.

ये पर्यटन स्थल हैं –ग्वायर हॉल, फ्लैग स्टाफ़ टावर, वायस रीगल लॉज, चौबुर्जा मॉस्क, खूनी खां झील, पीर ग़ायब, बाड़ा हिंदू राव, अशोक स्तंभ और म्यूटिनी मेमोरियलय. साइफ की तरफ से रिक्शाचालकों को ये प्रशिक्षण भी दी गई है ताकि वो पर्यटकों को एक गाइड की तरह पर्यटन स्थलों की जानकारी भी दे सकें.

डीयू दर्शन की शुरुआत होने से सप्ताह के अंत में रिक्शाचालकों के सामने कम कमाई की जो समस्या थी वो अब काफी हद तक दूर हो गई है.

साइफ एसआससीसी के छात्र इन रिक्शाचालकों को रोजगार की सुरक्षा देने के साथ-साथ उनकी नियमित स्वास्थ्य जांच करवाते हैं साथ ही उनके बच्चों की शिक्षा का भी प्रबंध करते हैं.

अब इन छात्रों का मकसद विश्वविद्यालय के अन्य रिक्शाचालकों को भी रिक्शा मुहैया कराने का है ताकि उनकी जिंदगी में भी बदलाव लाया जा सके.

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