अयोध्या मसले पर वक्फ़ बोर्ड की याचिका

बाबरी मस्जिद ( फ़ाइल चित्र)

अयोध्या विवाद पर इलाहाबाद हाई कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुन्नी वक्फ़ बोर्ड ने अपील दायर की है.

बोर्ड का कहना है कि कोर्ट का फ़ैसला धारणाओं पर आधारित है.

वक्फ़ बोर्ड के वीकल ज़फ़रयाब जिलानी ने कहा है, "बोर्ड को लगता है कि बोर्ड ने ग़लत धारणाओं को आधार बनाकर फ़ैसला सुनाया. ये हर भारतीय मुसलमान का हक़ और फ़र्ज़ है कि वो फ़ैसले को चुनौती दे."

बोर्ड की याचिका में कहा गया है कि मुसलमान अयोध्या में ज़मीन पर अपना हक़ नहीं छोड़ेंगे.

कुछ महीने पहले जमीयत-उलमा-ए-हिंद ने भी अयोध्या मसले पर सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी. उसका कहना था कि फ़ैसला सबूतों पर नहीं बल्कि हिंदुओं की मान्यताओं पर आधारित है.

इस साल सितंबर में इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने फ़ैसले सुनाते हुए अयोध्या के विवादित स्थल को राम जन्मभूमि घोषित किया था.

फ़ैसला

हाईकोर्ट ने बहुमत से फ़ैसला किया था कि विवादित भूमि जिसे रामजन्मभूमि माना जाता रहा है, उसे हिंदू संगठनों को दे दिया जाए. वहाँ से रामलला की प्रतिमा को नहीं हटाया जाएगा.

लेकिन अदालत ने यह भी पाया कि चूंकि कुछ हिस्सों पर, जिसमें सीता रसोई और राम चबूतरा शामिल है, निर्मोही अखाड़े का भी कब्ज़ा रहा है इसलिए यह हिस्सा निर्मोही अखाड़े के पास ही रहेगा.

अदालत के दो जजों ने यह फ़ैसला भी दिया कि इस भूमि के कुछ हिस्सों पर मुसलमान प्रार्थना करते रहे हैं इसलिए ज़मीन का एक तिहाई हिस्सा मुसलमान गुटों दे दिया जाए.

तीनों जजों ने मुसलमानों के सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ़ बोर्ड के अपने दावे को कानूनन समय सीमा की मियाद बाहर होने के तकनीकी आधार पर ख़ारिज कर दिया था

वहीं दो जजों ने बहुमत से भगवान सिंह विशारद के मुक़दमे में प्रतिवादी के नाते सुन्नी वक्फ़ बोर्ड को एक तिहाई हिस्से का हक़दार माना था.

जजों ने माना है कि विवादित मस्जिद के अंदर भगवान राम की मूर्तियां 22/23 दिसंबर 1949 को रखी गई. यह भी माना है कि मस्जिद का निर्माण बाबर अथवा उसके आदेश पर किया गया और यह जगह भगवान राम का जन्म स्थान है .

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