सर्दी में सूरज की परेशानियाँ

दिल्ली में जैसे-जैसे सर्दी बढ़ती जा रही है, वैसे-वैसे 18 साल के सूरज की परेशानियाँ भी बढ़ती जा रही हैं.

पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के पास रहने वाले सूरज के पास कोई छत नहीं है और वो कड़कड़ाती ठंड में खुले आसमान के नीचे रात गुज़ारता है.

अपनी परेशानी का ज़िक्र करते हुए सूरज कहता है,“ठंड बहुत ज़्यादा है, रात भर ठिठुरते रहते हैं. दो रज़ाई किराए पर लेते हैं, तब जाकर काम चलता है.”

सूरज अकेला नहीं है. दिल्ली में एक अनुमान के मुताबिक लगभग एक लाख लोग बेघर है.

सूरज को दिल्ली सरकार द्वारा चलाए जा रहे रैनबसेरों का पता तो है लेकिन सूरज वहाँ जाता नहीं है.

जब बीबीसी हिंदी ने सूरज से इसकी वजह जाननी चाही तो सूरज का जवाब था,“वहाँ जगह ही नहीं मिलती, लोग अपनी जान पहचान वालों के लिए पहले ही क़ब्ज़ा कर लेते हैं. अगर किसी दिन पहले पहुँच कर जगह मिल भी गई, तो लोग जेब काट लेते हैं. मेरी भी एक बार जेब कट चुकी है”

सड़क पर सोने वालों के लिए ये इकलौती परेशानी नहीं है. पुलिस भी इन्हें फ़ुटपाथ पर सोने से रोकती है.

फ़ुटपाथ पर ही सोने वाले राजन सिंह रावत कहते हैं ,“पुलिस वाले हमें डंडे मारकर भगा देते हैं, वो मारते वक्त ये भी नहीं देखते कि टाँग टूटती है या हाथ. यहाँ पर कई लोग पुलिस के हाथों मर चुके हैं."

सर्द मौसम की इन पर दोहरी मार पड़ती है. सर्दी के अलावा रात भर पड़ने वाली ओस से इनके बिस्तर गीले हो जाते हैं.

बिहार से आए सुरेंद्र कहते हैं, “रज़ाई किराए पर ले भी ली तो भी दुखों का अंत नहीं है. यहाँ तो रात भर ओस पड़ती है और सुबह तक हमारे बिस्तर गीले हो जाते है और हम बीमार पड़ जाते हैं.”

Image caption सूरज पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के पास रहता है.

रज़ाई की माँग ने यहाँ कुछ लोगों को व्यापार का अवसर दे दिया है

लोगों ने रज़ाई किराए पर देने का व्यापार शुरु कर दिया है. यहाँ पर भी माँग और आपूर्ति का नियम लागू होता है. सर्दी के बढ़ने के साथ ही किराया भी बढ़ जाता है.

राजन सिंह रावत ने बीबीसी को बताया,“एक रात के लिए रज़ाई का किराया 20 रुपये है. जैसे-जैसे सर्दी बढ़ती है किराया भी बढ़ता चला जाता है. अगर बारिश हो गई तो किराया 50 रुपए तक चला जाता है.”

वैसे रज़ाई उपलब्ध करवाने वालों से रजाई लेने का एक फ़ायदा ये है कि ये सोने वालों की चौकीदारी करते हैं और जेबकतरों से इन लागों को राहत मिल जाती है.

दिल्ली में चलने वाली शीतलहर हर साल कई लोगों की जान ले लेती है. मीडिया रिपोर्टों के अनुसार शीतलहर की वजह से पिछले साल सौ लोगों की जान चली गई थी. हालाँकि किसी भी निष्पक्ष संस्था से इस तरह की संख्या की पुष्टि नहीं हो पाती.

रैनबसेरे को बनाने और उनकी देखरेख का ज़िम्मा दिल्ली सरकार की ओर से दिल्ली अर्बन शेल्टर इंप्रूवमेंट बोर्ड को सौंपा गया है. इस विभाग के अंतर्गत फ़िलहाल 64 स्थाई रैनबसेरे चल रहे हैं. सर्दी बढने के साथ ही सरकार 84 अस्थाई रैनबसेरे बनाने की योजना पर काम कर रही है.

इस बार भी आसमान के नीचे रात बिताने वालों को कोई राहत मिलने की संभावना काफ़ी कम है.

रैनबसेरों के लिए ज़िम्मेदार संस्था दिल्ली अर्बन शेल्टर इंप्रूवमेंट बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अमर नाथ ने बीबीसी को बताया,“हम फ़िलहाल 64 स्थाई और 84 अस्थाई रैनबसेरे चला रहे है.लेकिन माँग के हिसाब से मुझे नहीं लगता कि हम सबको छत मुहैया करवा पाएँगे.”

अमर नाथ ने ये भी कहा कि दिल्ली में बेघरों की सही संख्या के बारे में अभी पक्का पता नहीं है और इस बारे में सर्वेक्षण चल रहा है.

मुख्य कार्यकारी अमर नाथ ने कहा “हमें इस समस्या से निपटने के लिए एक योजना की ज़रूरत है और सर्वेक्षण के आंकड़े आते ही हम योजना पर काम करेंगे.”

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