दम तोड़ता कश्मीर का बंदूक उद्योग

कश्मीर में बंदूक उद्योग

कश्मीर घाटी में बंदूक निर्माण उद्योग साढे चार सौ साल पुराना है. इतिहास के जानकारों का कहना है कि घाटी में बंदूक बनाने का काम मुग़ल शासक मिर्ज़ा हैदर दुगलत ने परिचत कराया.

मिर्ज़ा दुगलत ने कश्मीर में 1541 से 1551 तक शासन चलाया जिसके बाद शासन एक बार फिर कश्मीरियों के हाथ में आ गया.

कश्मीर विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर मोहम्मद अशरफ़ कहते हैं, ''साढ़े पांच सौ में जब मुग़ल सम्राट अकबर ने कश्मीर पर चढ़ाई की तो उस युद्ध में कश्मीरियों ने बंदूकों का खूब इस्तेमाल किया.''

जाने माने इतिहासकार फ़िदा मोहम्मद हसनैन कहते हैं कि डोगरा राजाओं ने बंदूक निर्माण उद्योग को काफ़ी प्रोत्साहन दिया.

वो कहते हैं कि 19वीं शताब्दी में ये बंदूकें लद्दाख के रास्ते मध्य एशिया को निर्यात की जाने लगीं. उन दिनों बंदूक बनाने के 22 कारखाने मौजूद थे जिनमें से कुछ श्रीनगर के बाहर भी स्थित थे.

वो बताते हैं कि जब अँगरेज़ पर्यटक यहाँ आने लगे तो उन्होंने भी यहाँ की बंदूकों की गुणवत्ता को देख इनकी ख़रीदारी शुरू कर दी. इस प्रकार से कश्मीर की बंदूक यूरोप तक पहुँच गईं.

लेकिन हसनैन कहते हैं कि 1947 के बाद भारत सरकार ने बंदूक निर्माण उद्योग को प्रोत्साहन देना बंद कर दिया. ये निर्णय तत्कालीन गृह मंत्री सरदार पटेल का था. परिणाम स्वरूप घाटी में बंदूक निर्माण के दो एक कारखाने ही बच पाए. बीस वर्ष पूर्व कश्मीर घाटी में सशस्त्र अलगावादी आंदोलन शुरू हुआ जो अब तक जारी है.

इन 20 वर्षो में देखा गया है कि स्थानीय कारखाने में बनने वाली बंदूकें कभी भी चरमपंथियों ने इस्तेमाल नहीं कीं.

बंदूक निर्माण से जुड़े मोहम्मद याकूब का कहना है कि आज तक एक बार भी ऐसा नहीं हुआ है कि किसी चरमपंथी के पास स्थानीय बंदूक पाई गई.

असल बात यह है कि चरमपंथियों के पास खुद राइफ़ल जैसे कि एके-47 मौजूद रहती हैं.

इसके बावजूद अलगावादी हिंसा शुरू होने के बाद सरकार ने श्रीनगर में बंदूक निर्माण करने वाली फैक्ट्रियाँ बंद करवा दीं.

लाइसेंस बंद

बाद में ये फैक्ट्रियां फिर से चालू हो गईं लेकिन सरकार ने यहाँ आम लोगो को लाइसेंस देना बंद कर दिया.

इससे स्थानीय बाज़ार में कश्मीरी बंदूक की बिक्री बंद हो गई. लेकिन बंदूक बनाने वाले लोगों का कहना है कि घाटी के बाहर कश्मीरी बंदूक की मांग बढ़ गई है.

परंतु बंदूक निर्माण उद्योग के समक्ष एक बड़ी समस्या यह खड़ी हो गई है कि केन्द्रीय ग्रह मंत्रालय स्थानीय कारखानों को 300 अथवा 500 से अधिक बंदूकें बनाने की अनुमति नहीं दे रहा.

एक फैक्ट्री के मालिक ज़हूर अहमद का कहना है, "हमने केन्द्र सरकार को दर्ख़ास्त दी कि हमारा कोटा बढ़ाया जाए लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई."

वो कहते है कि हम 300 बंदूकें ज्यादा से ज्यादा चार महीनों में बना लेते हैं. उसके बाद हमारे पास कोई काम नहीं होता है. इसलिए अब कारीगर भी हमारे पास काम करने नहीं आते.

बंदूक निर्माण उद्योग कश्मीर में कई लोगों के लिए रोज़गार उपलब्ध करा सकता था. लेकिन इस समय यह स्थिति है कि इस उद्योग से जुड़े परिवारों के सदस्य भी धीरे धीरे इससे अलग हो रहे हैं.

शफात अहमद कहते हैं, "मैं एक ग्रेजुएट हूँ. मैंने भी ये ही काम अपनाया था. लेकिन अब मैंने छोड़ दिया है. मेरा भाई भी अब सरकारी नौकरी करता है. मेरा दादा, पिता, मामू सब इसी काम के साथ जुड़े हैं, लेकिन नई पीढ़ी को इस काम में कोई भविष्य नज़र नहीं आ रहा".

सरकार के द्वारा ऐसा कोई संकेत नहीं मिल रहा कि वो कश्मीर मई बंदूक निर्माण उद्योग को फिर से प्रोत्साहन देने का इरादा रखती है.

लगता है कि यह उद्योग अब आख़िरी साँसे ले रहा है और इसके साथ ही साढ़े चार सौ वर्षों का इतिहास भी समाप्त होने जा रहा है.

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