महिलाओं का सर्वे

भारत के विभिन्न राज्यों में आर्थिक शोध संस्थान द्वारा कराए गए सर्वेक्षण से ये बात निकल कर आई है कि भारत में अब तलाक और शादी टूटने के अधिक मामले सामने आ रहे हैं. इतना ही नहीं अलग होने के बाद महिलाओं को उनके हक़ से वंचित रखा जाना उनकी बिगड़ती आर्थिक स्थिति का एक मुख्य कारण है.

शादी के दौरान पति पर निर्भरता और अगर किसी कारणवश अलग होना पड़े तो उसके बाद अपने माता पिता या भाई बहन पर निर्भरता. यहाँ तक की पति की मौत के बाद भी उसकी संपत्ति पर पत्नी से ज्यादा पति के घर वालों का अधिकार ज़्यादा हो जाता है.

भारतीय न्याय प्रक्रिया के इन्ही पेचीदगियों की दुहाई देते हुए पूर्व न्यायमूर्ति प्रभा श्रीदेवन ने कहा की जब तक महिलाऐं अपने आप को और दृढ़निश्चयी नहीं बनाएंगी तब तक उनकी कोई कुछ नहीं सुनेगा.

उन्होंने कहा, "मैं जानती हूँ की भारत की न्यायिक प्रक्रिया के चलते महिलों को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है लेकिन जब तक हम लड़ना नहीं सीखेंगे तब तक जीत कैसे मिलेगी. ''

उन्होंने ये भी कहा की भारत में महिलाओं की आर्थिक स्थिति खासी ख़राब है लेकिन उससे ठीक भी वो खुद ही कर सकती हैं.

न्यायिक प्रक्रिया में बदलाव लाना इतना आसान नहीं और ये नयायमूर्ति प्रभा श्रीदेवन खुद भी जानती हैं.

सर्वेक्षण से ये भी निकल कर आया है कि करीबन 85.6 प्रतिशत महिलाओं का कहना है कि पति से अलग होने के बाद बच्चों की जिम्मेदारी के चलते उनकी समस्याएं कई गुना बढ़ जाती हैं.

सर्वेक्षण के अनुसार 41 .7 प्रतिशत महिलों के पास अलग होने के बाद आमदनी का कोई साधन नहीं बच पाता है. तो केवल 27 .6 प्रतिशत महिलाऐं करीबन 2000 रूपए मासिक तक कमा पाती हैं.

पूर्व सांसद और महिलाओं की इस लड़ाई में एक मुख्य किरदार निभा रही सुभाषिनी अली का कहना है की ये आंकड़े साफ़ तौर पर दर्शाते हैं कि महिलाओं की आर्थिक स्थिति कितनी खराब हैं.

वो कहती हैं कि महिलाओं को उनका वाजिब हिस्सा मिलना चाहिए क्योंकि वो ज़िन्दगी भर घर में काम करती हैं पिसती हैं और अगर उन्हें अलग होना पड़ जाए तो उनकी उस मेहनत को हर कोई पूरी तरह नज़रंदाज़ कर देता हैं .

महिलाओं की इस बिगडती हालत को सुधारने के लिए कई ऐसे संगठन सामने आए हैं जो उन्हें उनके पति से अलग होने के बाद उनका वाज़िब हिस्सा दिलाने की मांग को पुरज़ोर तरीके से सामने रख रहे हैं .