गूजर आंदोलन का इतिहास

गूजर
Image caption गूजर पिछले कुछ वर्षों से लगातार आरक्षण की मांग पर आंदोलनरत हैं.

राजस्थान में सरकार के लिए गूजर आन्दोलन से निबटना भारी चुनौती बन गया है.

पिछले गूजर आंदोलनों के दौरान बड़े पैमाने पर हिंसा हुई है और इस बार भी ऐसी आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता.

इस गूजर आन्दोलन पर नजर डालें तो इसका सिलसला पिछली बीजेपी सरकार के दौरान शुरू हुआ जब गूजर वर्ष 2006 में यकायक करौली जिले में रेल लाइनों पर आ जमे और दिल्ली -मुंबई बाधित कर दिया.ये इस आन्दोलन का पहला कदम था.

गूजरों का कहना था कि वो तत्कालीन सत्तारूढ़ बीजेपी सरकार को उसका वादा याद दिलाना चाहते जो बीजेपी ने अपनी परिवर्तन यात्रा के दौरान किया था.

कुछ गूजर नेताओ के मुताबिक, बीजेपी ने कथित तोर पर गूजर बिरादरी के लिए आरक्षण का वादा किया था मगर बीजेपी ने इससे इंकार किया और कहा ये उसके चुनावी घोषणा पत्र में नहीं था.

तीन सितम्बर, 2006 में गूजर नेता किरोड़ी सिंह बैंसला के नेतृत्व में करौली जिले में हिंडोन स्टेशन पर रेललाइन पर आ जमे और गाड़ियों की आवाजाही रोक लगा दी.

सरकार ने अपने अधिकारियों को हेलीकॉप्टर से मौके पर भेजा और गूजर नेताओ को आन्दोलन का कदम वापस लेने पर राजी कर लिया.

इस कदम से गूजर उत्साहित हुए और आगे के आन्दोलन की तैयारी शुरू कर दी.

फिर 29 मई, 2007 को गूजर सड़को पर निकले और दौसा के पाटोली में रास्ता रोक दिया.

पुलिस से उनकी मुठभेड़ हुई जिसमें पांच आन्दोलनकारी और एक पुलिस कर्मी हिंसा की भेंट चढ़ गए.

ये पहला मौका था जब गुज्जर आन्दोलन के दौरान जमीन पर खून गिरा.

आन्दोलनकारी शवो को लेकर बैठ गए. लिहाजा सरकार ने आंदोलनकारियों को बातचीत का न्योता दिया और चार जून, 2007 को तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से सुलह के बाद अपना आन्दोलन वापस ले लिया.

मगर ये सुलह लम्बी नहीं चली. इस बार गूजर अजमेर जिले के पुष्कर मे जमा हुए. दिन था 23 जून , 2007.

गूजरों ने पंचायत की और आन्दोलन फिर शुरू करने का ऐलान कर दिया.

इस बार वे भिन्न तरह से अपना विरोध दर्ज करा रहे थे.

इसमें सड़कों पर दूध फैलाया और अपनी मांगो पर आवाज बुलंद की.वर्ष 2007 में अक्टूबर का माह आया तो गूजर फिर सड़कों पर निकले और जुलूस निकाले मगर शांति बनी रही.

लेकिन समय जैसे वर्ष 2008 में दाखिल हुआ, ये आन्दोलन फिर राजमार्गो पर आ खड़ा हुआ. गूजर तेईस मई, 2008 को पूर्वी राजस्थान में कई स्थानों पर जमा हुए.

गूजरों ने भरतपुर जिले में पीलुपुरा में रेललाइनो पर कब्ज़ा कर लिया.वही पुलिस से उनकी भिडंत हुई.

इसमें सोलह आन्दोलनकारी और एक पुलिसकर्मी की मौत हो गई.

ये आन्दोलन कोई 27 दिन तक चला. राजमार्ग और मुम्बई दिल्ली रेलमार्ग रुका रहा और फिर सरकार से समझौते के बाद आन्दोलन वापस ले लिया गया. इसमें गूजरों से आरक्षण का वादा किया गया.

इस वादे के तहत सरकार ने गूजर और कुछ अन्य जातियों के आरक्षण के लिए विधयेक विधान सभा से पारित करवाया.लेकिन ये विधेयक राजभवन में रुक गया क्योंकि तत्कालीन राज्यपाल एसके सिंह ने इस पर दस्तखत करने से इंकार कर दिया.

22 अगस्त 2008 को गूजरों ने फिर महापंचायत की और विधयेक लागू करने की मांग की. फिर 26 जुलाई 2009 को करौली जिले में गूजरों ने आन्दोलन शुरू कर दिया और कुछ समय बाद सरकार के आश्वान के बाद आन्दोलन वापस ले लिया.

इस साल मई में गूजर फिर आंदोलित हुए और सरकार को आर पार की लड़ाई की चुनौती दी.

सरकार ने मान मनुहार की और और पांच मई को बैंसला और सरकार के बीच निर्णायक बात हुई.

दोनों पक्ष इस समझौते पर सहमत हुए और आन्दोलन ख़त्म कर दिया गया.मगर गूजर अब फिर आन्दोलन पर है और मुंबई -दिल्ली रेलमार्ग पर धरना दिए बैठे हैं.

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