विश्लेषणः भारत-रूस रक्षा संबंध

दिमित्री मेदवदेव और मनमोहन सिंह

रुस के राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव ने अपने भारत दौरे में एक नए युद्धक विमान के साझा विकास करने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं.

दिल्ली में भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और दिमित्री मेदवदेव के बीच हुई बातचीत में इस अत्याधुनिक, फ़िफ़्थ जेनरेशन विमान के विकास पर सहमति हुई.

भारत और रूस शीत युद्ध के दौर में एक-दूसरे के मित्र थे और भारत पारंपरिक तौर पर अपना अधिकतर हथियार रूस से ही ख़रीदता रहा है.

लेकिन पिछले 10 वर्षों में भारत ने अलग-अलग देशों से हथियार ख़रीदना शुरू किया और इसलिए इस सौदे के बावजूद रूस को हथियारों के सौदे के क्षेत्र में यूरोप और अमरीका के देशों से कड़ी प्रतियोगिता का सामना करना होगा.

रूसी राष्ट्रपति ने अपने दौरे से पहले भारतीय अख़बार टाइम्स ऑफ़ इंडिया को दिए गए एक इंटरव्यू में इस स्थिति को स्वीकार भी किया था.

उन्होंने इस इंटरव्यू में कहा,"पश्चिम के कई हथियार निर्माता भारत के साथ सहयोग बढ़ाने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं जिसके कि कारण भी हैं. हम इसे संयत भाव से स्वीकार करते हैं. हम प्रतियोगिता के लिए तैयार हैं. लेकिन ये महत्वपूर्ण है कि सभी सौदे पारदर्शी हों और नियमों का पालन करते हों."

नज़दीकी संबंध

जानकारों का मानना है कि रूस के इस प्रतियोगिता को लेकर संयत रहना दरअसल दोनों देशों के ऐतिहासिक संबंधों से संभव हुआ है.

मॉस्को स्टेट इंस्टीच्यूट फ़ॉर इंटरनेशनल रिलेशंस के विश्लेषक विक्टर मिज़िन का कहना है कि भारत और रूस के संबंध मूलतः आपसी भौगोलिक-राजनीतिक हितों के आधार पर निर्मित हुए हैं.

वे कहते हैं,”सोवियत संघ को जब चीन से परेशानी होने लगी तो भारत ने चीन को संतुलित किया. ये बात सभी जानते हैं कि भारत के भी चीन के साथ असहज रिश्ते रहे हैं“

भारत को परमाणु सामग्रियों की आपूर्ति पर पाबंदी लगने से दोनों देशों के संबंधों को अतिरिक्त ऊर्जा मिली और इसने परोक्ष रूप से हथियारों के व्यापार को भी प्रभावित किया.

ऑनलाइन समाचारपत्र डेली जर्नल के सैन्य मामलों के विशेषज्ञ उपसंपादक अलेक्ज़ेंडर गोल्त्ज़ कहते हैं, रूस का प्रतिस्पर्धी कोई नहीं था. भारत को आधुनिक सैन्य उपकरण चाहिए थे और एक रूस ही उसे इनकी आपूर्ति कर सकता था.

लेकिन गोल्त्ज़ के अनुसार पश्चिम की दूसरी ताक़तों की भारत के हथियार बाज़ार में उपस्थिति से रूसी रक्षा उद्योग की कमज़ोरियाँ उजागर हुई हैं.

वे कहते हैं,"स्थिति बदल गई है. हम एक अत्यंत प्रतिस्पर्धी माहौल में प्रवेश कर रहे हैं."

अड़चनें

रूस इस नए प्रतिस्पर्धी बाज़ार में मिले-जुले अनुभव लेकर प्रवेश कर रहा है जिसमें उसे सफलताएँ भी मिली हैं और विफलताएँ भी.

भारत-रूस संबंध के बीच एडमिरल गोर्शकोव समझौते को लेकर अड़चन आई है. गोर्शकोव एक विमानवाही युद्धपोत है जिसे भारत ने ख़रीदा और उसे आधुनिकीकरण के लिए रूस में ही छोड़ दिया. तैयार होने पर इस जहाज़ का नाम बदलकर विक्रमादित्य हो जाएगा.

वर्ष 2004 में हुए मूल सौदे के अनुसार इसकी मरम्मत पर डेढ़ अरब डॉलर ख़र्च होना था मगर बाद में ये लागत बढ़कर सवा दो अरब डॉलर से अधिक हो गई.

जहाज़ को सौंपने का समय भी लगभग एक वर्ष आगे बढ़ा दिया गया है और ये 2012 के अंत से पहले नहीं हो सकेगा.

ऐसे में भारत में कई लोग इस सौदे की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठा रहे हैं. मगर सौदे को रद्द करना बेमानी है क्योंकि इसपर पहले ही अच्छा-ख़ासा ख़र्च हो चुका है.

जानकार दूसरे समझौतों की समस्याओं के ऊपर भी ध्यान दिलाते हैं, विशेष रूप से बिक्री के बाद हथियारों की देख-रेख और उनके कलपुर्जों आदि के लिए हुए सौदों की तरफ़.

थिंक टैंक - ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ंड - में यूरेशिया मामलों के प्रमुख नंदन उन्नीकृष्णन ने बीबीसी को बताया कि भारत हथियार ख़रीद प्रक्रिया की समीक्षा करना चाहता है ताकि हथियारों की ख़रीद और उनकी देख-रेख का ख़र्च एक ही सौदे में डाला जा सके.

वे कहते हैं,"हमारे लिए टैंक जैसे एक हथियार के लिए उसके पूरे जीवन के लिए एक ही समझौता करना आसान होगा जिससे कि उसकी सर्विसिंग और दूसरे सारे ख़र्च उसकी क़ीमत में ही शामिल हों."

प्रतियोगिता

Image caption भारतीय वायुसेना को लड़ाकू जहाज़ देने का सौदा 2011 में ख़त्म हो रहा है

भारत रूस से टैंक और लड़ाकू जहाज़ों की ख़रीद को जारी रखते हुए इनके विकल्पों पर ध्यान दे रहा है. भारत अमरीका से सी-17 और सी-130 विमान ख़रीदनेवाला है.

भारतीय वायु सेना को 126 लड़ाकू जहाज़ देने का सौदा वर्ष 2011 में समाप्त हो रहा है.

नए सौदे के लिए रूसी मिग-35 विमानों के अतिरिक्त अमरीकी एफ़-16 और एफ़-18, यूरोफ़ाइटर और स्वीडन का ग्रिपेन विमान भी मुक़ाबले में हैं,

रूस के सामने प्रतियोगिता गंभीर तो है लेकिन बाज़ार में अपनी स्थिति को ध्यान में रखते हुए वो घुटने टेकता दिखाई नहीं देता.

रूसी राष्ट्रपति का नए युद्धक विमान के विकास के लिए भारत के साथ समझौता करना इसी का एक परिचायक है.

इस विमान की चर्चा वर्ष 2005 से ही हो रही है. शुरू में रूस ये आशा कर रहा था कि वो ऐसा कोई समझौता करेगा जिससे कि वो भारत को टी-50 विमान बेच सकेगा.

लेकिन भारत इसके साझा विकास पर ज़ोर देता रहा जिसके बाद अंततः ये समझौता हुआ कि दोनों देश मिलकर एक ऐसा विमान बनाएँगे जो कि आधारित तो होगा टी-50 पर मगर उसमें भारतीय वायुसेना की आवश्यकताओं के हिसाब से बदलाव किए जाएँगे.

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