भारत को दोस्त बनाती दुनिया

  • 22 दिसंबर 2010
मेदवेदेव के साथ मनमोहन
Image caption मेदवेदेव का दौरा विदेशी नेताओं के इस वर्ष के भारत दौरे का अंतिम दौरा था

भारत एक ऐसी विवाह योग्य कन्या है जिसके कई दीवाने हैं - एक अरब से अधिक की आबादी वाले इस देश को दिल्ली में राजनयिकों की एक जमात में कुछ इस तरह से बयाँ किया भारत में रूस के राजदूत अलेक्ज़ेंडर कदाकिन ने.

भारत में राजनयिक के तौर पर 20 साल बितानेवाले और धाराप्रवाह हिंदी बोलनेवाले कदाकिन ने चेहरे पर बिना कोई भाव लाए कहा,"रूस भारत की बहन है और चाहती है कि भारत को सबसे अच्छा वर मिले.”

एक ऐसे देश में उनका ये संदेश यूँ ही बेमानी नहीं है जिसने कि हाल ही में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सभी पाँच स्थायी सदस्यों के राष्ट्राध्यक्षों और सरकारों की मेज़बानी की हो, जिसकी शुरूआत हुई जुलाई में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन की यात्रा से.

पिछले 45 दिनों में भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इन राष्ट्राध्यक्षों के साथ संयुक्त बयान जारी किए हैं – आठ नवंबर को अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ, छह दिसंबर को फ़्रांसीसी राष्ट्रपति निकोला सारकोज़ी के साथ, 16 दिसंबर को चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ के साथ और 21 दिसंबर को दिमित्री मेदवदेव के साथ.

साथ ही इस दौरान, मनमोहन सिंह ने इस वर्ष जापान और जर्मनी की यात्रा के लिए भी समय निकालकर ये संकेत दे दिया कि भारत दुनिया की सभी बड़ी आर्थिक ताक़तों से ताल्लुक़ात बना रहा है.

चीनी प्रधानमंत्री के औपचारिक बयानों पर भरोसा किया जाए तो लगता है कि चीन भी चाहता है कि वैश्विक मंच पर भारत और बड़ी भूमिका निभाए, बावजूद इसके कि दोनों देश अभी भी संभवतः सबसे अधिक समय से अनसुलझे सीमा विवाद में अभी तक उलझे हुए हैं.

उपलब्धि

Image caption चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ एक बहुत बड़ा व्यापारिक दल लेकर भारत गए

चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापार सहयोगी है जिनका आपसी व्यापार इस वर्ष 60 अरब डॉलर तक पहुँचने की उम्मीद है.

भारत की ज़मीन से डेविड कैमरन ने पाकिस्तान के विरूद्ध जो कड़े बयान दिए उनका दिल्ली में काफ़ी स्वागत हुआ, विशेष रूप से आक्रामकता में विश्वास रखनेवाले प्रबुद्ध वर्ग में.

उनको लगा – ब्रिटेन की भारत और पाकिस्तान के बीच संतुलन क़ायम करने की भूमिका का आख़िरकार अंत हो गया.

रूसी प्रधानमंत्री मेदवेदेव की यात्रा में दोनों सरकारों के बीच 11 समझौते हुए, चुनाव के साझा निष्पादन से लेकर पाँचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान के साझा विकास और एक नए इस्पात कारखाने की स्थापना तक.

भारत पहले ही 2008 में परमाणु पाबंदी के हटने के बाद से परमाणु ईंधन ख़रीद रहा है, ना केवल रूस से बल्कि फ्रांस से भी.

आयातित परमाणु ईंधनों की बदौलत इसके परमाणु बिजलीघरों से पहले की तुलना में सबसे अधिक बिजली का उत्पादन हो रहा है.

और, यदि और प्रमाण की ज़रूरत हो, तो भारत एक पूर्ण सदस्य की हैसियत से न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप की सदस्यता लेने के लिए तैयार है, वो क्लब जो कि सारी दुनिया के परमाणु व्यापार की देख-रेख करता है.

एक ऐसे देश के लिए जो दशकों तक परमाणु मामले में अलग-थलग पड़ा रहा, उसके लिए एनएसजी में दाख़िल होना निश्चित तौर पर एक उपलब्धि होगी.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विभाग में प्रोफ़ेसर अमिताभ मट्टू कहते हैं,"ये दौरे भारत के बढ़ते महत्व का प्रमाण हैं."

अमिताभ मट्टू के अनुसार भारत को केवल एक बड़े बाज़ार के तौर पर ही नहीं बल्कि सारी दुनिया के लिए निवेश का एक स्रोत भी समझा जाता है जिनमें विकासशील अर्थव्यवस्थाएँ भी शामिल हैं.

उन्होंने कहा,"आपको इन सभी यात्राओं को अलग-अलग प्रिज़्म से देखना होगा. मगर ओबामा की यात्रा अलग थी. दुनिया के दूसरे देशों की ही तरह अमरीका के साथ भारत का संबंध सबसे अधिक महत्व रखता है."

आर्थिक अवसर

Image caption भारतीय संसद को संबोधित करते हुए अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा

अमिताभ मट्टू के अनुसार भारत को केवल एक बड़े बाज़ार के तौर पर ही नहीं बल्कि सारी दुनिया के लिए निवेश का एक स्रोत भी समझा जाता है जिनमें विकासशील अर्थव्यवस्थाएँ भी शामिल हैं.

भारत जैसा एक विकासशील देश भी आर्थिक अवसर बन सकता है, इसका संकेत इससे भी मिलता है कि राष्ट्रपति ओबामा अमरीकी निर्यात को बढ़ावा देने और नई नौकरियों के सृजन के उद्देश्य से मुंबई और दिल्ली गए.

भारतीय विदेश मत्रालय में पूर्व सचिव राजीव सीकरी मानते हैं कि कुछ ही महीनों के भीतर इन सब दौरों का होना एक संयोग भी है.

लेकिन वे कहते हैं,"संकेत स्पष्ट है, लोग व्यापार करना चाह रहे हैं...और निश्चित तौर पर भारत की वैश्विक छवि के लिए ये अच्छी बात है."

वैसे ये सभी दौरे ऐसे समय हुए हैं जब मनमोहन सिंह और उनकी गठबंधन सरकार एक कठिन दौर से गुज़र रहे हैं और कई तरह के भ्रष्टाचार के आरोपों के केंद्र में हैं – मोबाइल फ़ोनों के स्पेक्ट्रम को सस्ता बेचने से लेकर कॉमनवेल्थ खेलों के दौरान रिश्वत देने के मामलों को लेकर.

चुनौतियाँ

Image caption कैमरन ने अपनी भारत यात्रा के दौरान पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कड़ा संदेश दिया था

वैसे ये सभी दौरे ऐसे समय हुए हैं जब मनमोहन सिंह और उनकी गठबंधन सरकार एक कठिन दौर से गुज़र रहे हैं और कई तरह के भ्रष्टाचार के आरोपों के केंद्र में हैं – मोबाइल फ़ोनों के स्पेक्ट्रम को सस्ता बेचने से लेकर कॉमनवेल्थ खेलों के दौरान रिश्वत देने के मामलों को लेकर.

डटे हुए विपक्ष ने संसद को ठप्प किया हुआ है जिससे प्रधानमंत्री को इस सोमवार को मजूबर होकर कहना पड़ा कि वे स्पेक्ट्र सौदे की जाँच करनेवाली संसदीय समिति के सामने पेश होने के लिए तैयार हैं.

मगर विश्लेषकों का मानना है केवल इतना काफ़ी नहीं है कि मनमोहन सिंह की छवि ऐसी है जिसमें वे आलोचनाओं से परे हैं.

उनकी अपनी सरकार के मंत्रियों पर लगे आरोपों के बारे में क्या कहा जाए? और क्या कॉर्पोरेट जगत के साथ उनके काम-काज पर उनका पर्याप्त नियंत्रण है?

एक ऐसी गठबंधन सरकार के लिए जो ग़रीबों को अधिकार देने के नाम पर सत्ता में आई, स्पेक्ट्रम सौदे में 40 अरब डॉलर का नुक़सान केवल शर्म की बात नहीं है. ये इस सवाल की ओर भी ले जाता है कि जिस पैसे का नुक़सान हुआ उससे कितने बच्चों की पढ़ाई हो सकती थी और कितने अस्पताल बन सकते थे.

भारत ने लंबे समय तक भ्रष्टाचार को झेला है, एक ऐसी चीज़ जो उसकी प्रभावशाली आर्थिक वृद्धि के साथ ही जारी रही. भारत में अभी भी उस संस्कृति का विकास होना बाक़ी है जहाँ कि भ्रष्टाचार करनेवालों को सचमुच सज़ा मिलती है.

भारत की आर्थिक गाथा के टिकाउ रहने के लिए ये ज़रूरी है कि उसकी अंदरूनी प्रक्रिया पारदर्शी हो, ना केवल अपने लोगों के लिए बल्कि बाहर से आनेवाले निवेश के लिए भी.

क्योंकि बाहर की दुनिया की निगाहें लगीं होंगी, ये देखने के लिए कि भारत कैसे इन विरोधाभासों और चुनौतियों से पार पाता है.

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