छत्तीसगढ़ में पत्रकार परेशान

  • 23 दिसंबर 2010
सलवा जुडुम के कार्यकर्ता
Image caption छत्तीसगढ़ के माओवाद प्रभावित इलाक़ों में आम आदमी और पत्रकार सब परेशान हैं.

नक्सली हिंसा का केंद्र माने जाने वाले छत्तीसगढ़ में युद्ध की लकीरें साफ़ खिचीं हुईं हैं. एक तरफ माओवादी छापामार तो दूसरी तरफ सुरक्षा बल. इनके बीच में पिस रहा हैं आम आदमी.

सिर्फ आम आदमी ही नहीं, इस संघर्ष का सबसे बुरा दंश झेल रहे हैं इस राज्य के बस्तर संभाग में काम कर रहे पत्रकार जो कभी माओवादियों की धमकी का शिकार बनते हैं तो कभी पुलिस के गुस्से का.

हाल ही में एक संगठन नें दंतेवाड़ा के कुछ चुनिन्दा पत्रकारों के नाम से परचा जारी कर उन्हें बुरे परिणामों की धमकी दी है.

घने जंगलों की श्रंखला. कच्चे रास्ते और इन रास्तों पर बिछी हुई मौत. यह है छत्तीसगढ़ का बस्तर संभाग, जो पिछले एक दशक से भी ज्यादा समय से माओवादियों और पुलिस के बीच चल रहे संघर्ष का केंद्र बना हुआ है.

इस रक्तरंजित भूमि में कई निर्दोषों नें अपनी जान गंवाई है. कभी इन्हें पुलिस का मुखबिर कहकर मारा गया तो कभी नक्सली समर्थक होने के आरोप में. यहाँ हर पग पर प्रतिबंधों का साया है. कहीं माओवादियों का प्रतिबन्ध तो कहीं पुलिस का.

इन सब के बीच एक ऐसी प्रजाति यहाँ काम कर रही है जो अपनी जान हथेली पर रखकर लोगों तक खबरें पहुंचाने का काम कर रही है. यह बिरादरी है पत्रकारों की जो कठिन परिस्थितियों और दुर्गम रास्तों पर चलकर भी खबरें लोगों तक पहुंचा रहे हैं. यूँ तो बस्तर के पत्रकार माओवादियों और प्रशासन के निशाने पर रहे हैं मगर हाल की घटना नें सबको झकझोर कर रख दिया है.

माँ दंतेश्वरी आदिवासी स्वाभिमानी मंच के नाम से एक परचा जारी किया गया है जिसमे दंतेवाड़ा के तीन पत्रकारों को जान से मारने की बात कही गयी है.

हालांकि इस संगठन ने इस पर्चे से अपने आप को अलग कर लिया है मगर पत्रकारों के अन्दर खौफ का माहौल है. जिन तीन पत्रकारों की चर्चा इस पर्चे में की गयी है उनके नाम हैं एन आर के पिल्लई, अनिल मिश्र और यशवंत यादव.

तहलका पत्रिका से जुड़े अनिल मिश्र का आरोप है कि परचा जारी करने वाला संगठन पुलिस द्वारा ही प्रायोजित संस्था है.

वो कहते हैं, ‘‘माँ दंतेश्वरी आदिवासी स्वाभिमान मंच पुलिस द्वारा ही प्रायोजित एक संस्थान है जिसमे सलवा जुडूम के नेता ही शामिल हैं. कुछ दिनों पहले इस संस्था के नाम से एक परचा जारी किया गया है जिसमे मानवाधिकार से जुड़े लोगों और पत्रकारों को जान से मारने की बात कही गई है.’’

दंतेवाड़ा के वयोवृद्ध पत्रकार और श्रमजीवी पत्रकार संघ के उपाध्यक्ष एनआरके पिल्लई का आरोप है कि दंतेवाड़ा के वरीय पुलिस अधीक्षक एसआरपी कल्लूरी ने पूरे मामले को बड़े हल्के ढंग से लिया.

पिल्लई कहते हैं, ‘‘हम सीनियर एसपी से मिलने गए तो वह परचा देख कर पहले तो हँसे, फिर बोले कि यह हमारा ही संगठन है मगर इसमें आपलोगों का नाम कैसे आ गया है. हम अभी जांच करवाते हैं. मगर जब हम थाने पहुंचे तो पुलिस ने प्राथमिकी भी दर्ज करने से इनकार कर दिया. सिर्फ एक शिकायत ही दर्ज की गई है.’’

पिल्लई का कहना है कि दंतेवाड़ा और बस्तर के अन्य हिस्सों में काम कर रहे पत्रकारों को बड़ी दुष्वारियों का सामना करना पड़ रहा है.

वो कहते हैं, ‘‘यहाँ काम करना दिन ब दिन मुश्किल होता जा रहा है. कोंटा में पत्रकार साईं रेड्डी का घर माओवादियों नें फूँक दिया और बाद में पुलिस नें उन पर माओवादियों का समर्थक होने का आरोप लगाते हुए जेल भेज दिया. इसी तरह भोपालपटनम के अफज़ल खान और कोंटा के सुभाष रेड्डी के साथ भी हुआ है. पत्रकार सच्चाई लिखता है तो दोनों तरफ से पिस जाता है.’’

कई बार ऐसा भी हुआ है कि किसी नक्सली का बयान छपने पर पत्रकारों को पुलिस द्वारा कानूनी नोटिस भी भेजा गया.

ताज़ा धमकी के मामले में जब दन्तेवाड़ा के सीनियर एसपी कल्लूरी से पूछा गया तो उन्होंने इस मामले में अनभिज्ञता ज़ाहिर करते हुए फ़ोन काट दिया.

बहरहाल माँ दंतेश्वरी स्वाभिमानी मंच के नाम से जारी किए गए पर्चे में दी गई धमकी के बाद बस्तर के पत्रकारों में खौफ भी है और रोष भी.

रविवार की सुबह बिलासपुर में दैनिक भास्कर के पत्रकार सुशील पाठक की हत्या के बाद राज्य के पत्रकार और भी ज्यादा असुरक्षित महसूस कर रहे हैं.

हालाकि बुधवार को श्रमजीवी पत्रकार संघ के एक प्रतिनिधिमंडल नें मुख्य मंत्री रमन सिंह से मुलाक़ात की तो उन्होंने पत्रकारों की सुरक्षा का आश्वासन दिया है.

संबंधित समाचार