मूर्ति भंजक साल रहा 2010

मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी

समय निष्ठुर और निर्मम होता है. समय का पहिया अपने ही रचे इतिहास को लेकर इतना तटस्थ होता है कि अक्सर वह अपनी ही रची हुई छवियों और मूर्तियों को ध्वस्त करता चलता है.

भारत के नज़रिए से वर्ष 2010 को देखें तो पता चलता है कि इस अकेले साल ने ऐसे बहुत से लोगों की छवि को या तो पूरी तरह से नष्ट कर दिया या फिर उसे इतना धूमिल कर दिया कि लगता है कि उनकी पहचान ही बदल गई.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह उनमें से एक हैं. वर्ष 2009 में यूपीए सरकार को दूसरी बार सत्ता में आने का मौक़ा मिला. तब कहा गया था कि मनमोहन सिंह की छवि की वजह से यह जीत हासिल हुई. यह भी कहा गया था कि भारतीय जनता पार्टी के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने जिस तरह से मनमोहन सिंह को 'निकम्मा प्रधानमंत्री' कहा, उससे जनता नाराज़ हुई.

लेकिन इस जीत को एक बरस होते-होते तक पासा पलट सा गया लगता है. राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में भ्रष्टाचार की ख़बरें लगातार आती रहीं. एक के बाद एक कलई खुलती रही. लेकिन प्रधानमंत्री तब तक ख़ामोश रहे जब तक विपक्ष ने यह पूछना शुरु नहीं कर दिया कि वे चुप्पी साधे क्यों बैठे हैं?

Image caption राहुल गांधी बिहार में उत्तर प्रदेश जैसा कोई असर नहीं डाल पाए

इसके बाद 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन के मामले में हुए घोटालों का पिटारा खुल गया. सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि सरकार को इससे 1.76 लाख करोड़ रुपयों का नुक़सान हुआ है. इसे लेकर भारत के इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने किसी प्रधानमंत्री की चुप्पी और कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए. फिर नीरा राडिया नाम की एक कॉर्पोरेट दलाल की टैप की गई बातचीत सार्वजनिक हो गई. इसने बताया कि 2009 में यूपीए-2 में केंद्रीय मंत्रिमंडल के गठन को लेकर किस तरह के खेल हो रहे थे.

इन सबके बाद भी हालांकि भाजपा की प्रवक्ता निर्मला सीतारमन से लेकर अमर्त्य सेन तक बहुत से लोग कह रहे हैं कि मनमोहन सिंह की सत्यनिष्ठा पर शक नहीं किया जा सकता. लेकिन मनमोहन सिंह की वह छवि अब नहीं रह गई है जो एक साल पहले थी. इसका अहसास उन्हें भी है इसलिए कांग्रेस महाधिवेशन में उन्हें कहना पड़ा कि प्रधानमंत्री को सीज़र की पत्नी की तरह संदेह से परे होना चाहिए. हालांकि विपक्ष की जेपीसी की मांग की आगे वे फिर भी नहीं झुके.

एक सुविज्ञ और सफल अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह बार-बार महंगाई घटने की समय सीमा तय कर रहे हैं लेकिन महंगाई है कि घटने का नाम ही नहीं ले रही है. ये ठीक है कि देश की अर्थव्यवस्था वैश्विक मंदी के दौर में भी आठ प्रतिशत से अधिक की दर से बढ़ रही है लेकिन आम लोगों को प्याज़ जब 70-80 रुपए किलो मिलता है तो उन्हें विकास दर याद नहीं रहता. महंगा अनाज ख़रीद रहा व्यक्ति इस बात के महत्व को नहीं समझ पाता कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पाँचों स्थाई सदस्य अमरीका, चीन, रूस, फ़्रांस और ब्रिटेन के नेता दो महीने के अंतराल में क्यों भारत आए.

सोनिया और राहुल का क़द

Image caption कर्नाटक की सरकार इस साल कई विवादों से घिरी रही

ऐसा नहीं है कि इन विवादों और आमजनता को हो रही परेशानी से सिर्फ़ यूपीए सरकार के मुखिया यानी मनमोहन सिंह की छवि को नुक़सान हुआ है. इससे यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गांधी की छवि भी ख़ासी प्रभावित हुई है. हालांकि वे किसी संवैधानिक पद पर नहीं हैं इसलिए उनसे सीधे सवाल नहीं पूछे जा रहे लेकिन उनकी चुप्पी भी लोगों को गड़ती रही है.

आदर्श हाउसिंग सोसायटी घोटाले और बिहार में हुई कांग्रेस की करारी हार ने भी सोनिया गांधी के नेतृत्व पर सवाल उठाए और विकीलीक्स के दस्तावेज़ ने एक तरह से इस पर मुहर लगाई. इन दस्तावेज़ों के अनुसार भारत में अमरीकी राजदूत मानते हैं कि सोनिया गांधी में सैद्धांतिक नेतृत्व देने की क्षमता नहीं है.

वैसे बिहार के चुनाव ने दो और दिग्गजों की छवि को नुक़सान पहुँचाया. एक लालू प्रसाद यादव और दूसरे राहुल गांधी. 2005 के विधानसभा चुनावों और फिर 2009 के लोकसभा चुनावों में लालू प्रसाद यादव की हार को राजनीतिक संयोग की तरह देखा जाता रहा. लेकिन इस साल हुए विधानसभा चुनाव के परिणामों ने लालू प्रसाद यादव की दिग्गज नेता की छवि को धोकर रख दिया. रामविलास पासवान भी इन चुनाव परिणामों के शिकार हुए.

लेकिन पासवान से ज़्यादा प्रभावित हुई राहुल गांधी की छवि. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को संसद की 20 सीटें मिलने के बाद नेहरु-गांधी परिवार के उत्तराधिकारी और कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के बारे में कहा जाने लगा था कि वे कांग्रेस के तारणहार हैं. लेकिन बिहार में उनका जादू नहीं चला. वहाँ कांग्रेस ने पिछले चुनावों से भी बुरा प्रदर्शन किया. हालांकि यह तर्क ग़लत नहीं है कि बिहार में एकाएक कुछ होना संभव नहीं था लेकिन वे उत्तर प्रदेश जैसा कुछ बिहार में नहीं कर सके. इससे तारणहार की उनकी छवि धुल सी गई.

Image caption शशि थरूर कोच्चि टीम के विवाद से पहले ट्विटर पर दिए गए बयानों की वजह से चर्चा में रहे

हो सकता है कि विकीलीक्स के दस्तावेज़ों के ज़रिए और सार्वजनिक बयानों से 'हिंदू कट्टरपंथ' पर उनका जो नज़रिया सामने आया है उससे कांग्रेस को राजनीतिक फ़ायदा पहुँचे लेकिन एक वर्ग राहुल गांधी के इन बयानों से नाराज़ भी हुआ है. भ्रष्टाचार के मुद्दे पर उनकी चुप्पी पर भी सवाल उठाए जाने लगे हैं.

भ्रष्टाचार ने दशकों की मेहनत से शिखर पर पहुँचे एक और व्यक्ति को पदावनत कर दिया है. वे हैं कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदुरप्पा. दक्षिण भारत में भाजपा की पहली सरकार बनवाने के लिए उनके सिर पर सेहरा बंधा था लेकिन खदानों और ज़मीनों के घोटालों और परिवारवाद ने उनकी दुर्गति कर दी.

इसी भ्रष्टाचार के मुद्दे ने कई और ऐसे लोगों की छवि पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है जो 2010 से पहले साफ़ सुथरी छवि के मालिक थे और कई मायनों में लोगों के लिए आदर्श थे.

उनमें से एक हैं शशि थरूर. कहाँ तो वे भारत की ओर से संयुक्त राष्ट्र के महासचिव पद के उम्मीदवार थे और कहाँ विदेश राज्यमंत्री रहते हुए कोच्चि की आईपीएल टीम में उनकी दिलचस्पी की वजह से आख़िर मंत्रिमंडल से इस्तीफ़ा देना पड़ गया.

नीरा राडिया का साया

Image caption नीरा राडिया की विभिन्न व्यक्तियों से हुई बातचीत ने बवाल मचा दिया

नीरा राडिया के फ़ोन टैपिंग ने भी कई गर्व भरे चेहरों पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं.

इनमें सबसे बड़ा नाम है रतन टाटा का. वर्ष 2010 से पहले वे एक ऐसे संत के रूप में देखे जाते थे जिनको उद्योग-व्यवसाय जगत का आदर्श माना जा सकता था. राजनीतिक विवाद की वजह से बड़ा नुक़सान झेल कर भी जनता के लिए नैनो कार बनाने का उनका ज़ज़्बा लोगों को द्रवित कर रहा थे. लेकिन नीरा राडिया के टेपों ने उनकी कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठा दिए. जैसे मौक़ा मिलने भर की देर थी कि उनके एक पुराने प्रतिद्वंद्वी राजीव चंद्रशेखर घोटाले के आरोपों का पिटारा लेकर खड़े हो गए. अब टाटा अपनी छवि बचाने की गुहार लेकर सुप्रीम कोर्ट में हैं और राजीव चंद्रशेखर के आरोपों का जवाब दे रहे हैं.

नीरा रा़डिया की बातचीत ने दो दिग्गज पत्रकारों की छवि पर सवाल खड़े कर दिए. एक हिंदुस्तान टाइम्स के सलाहकार संपादक वीर सांघवी और दूसरी एनडीटीवी अंग्रेज़ी की ग्रुप एडीटर और पद्मश्री से सम्मानित हो चुकीं बरखा दत्त. दोनों ने अपनी-अपनी ओर से सफ़ाई भी दी लेकिन इसमें संदेह ही है कि उनकी पत्रकारिता पर अब इस बरस से पहले की तरह कोई भरोसा कर सकेगा.सवाल तो कई अन्य छोटे-बड़े पत्रकारों पर भी उठे लेकिन उनकी छवि ऐसी नहीं थी जिस पर दाग़ लगने का नोटिस भी लिया जाता.

इसी साल कश्मीर के हिंसक दौर के बीच युवा मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के क्षमतावान होने पर सवाल खड़े किए गए तो कम से कम दो और युवा नेताओं पर टिकी आस निराशा में बदली. उनमें से एक हैं करुणानिधि की बेटी कनुमोझी और दूसरी शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले.

Image caption रतन टाटा पर व्यावसायिक लाभ के लिए तिकड़मों के आरोप लगे

ऐसा नहीं है कि वर्ष 2010 ने सब कुछ को धराशाई ही किया है. नीरा राडिया प्रकरण ने एक पत्रकार के क़द को बढ़ाया भी है. वो हैं विनोद मेहता. उन्होंने अपनी बिरादरी और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को आईना दिखाने के लिए जो कुछ भी किया वह बहुत समय तक याद किया जाता रहेगा. उनकी पत्रिका आउटलुक ने यदि नीरा राडिया प्रकरण के विवरण प्रकाशित नहीं किए होते तो इस देश के कथित राष्ट्रीय समाचार पत्रों ने तो उसे दुनिया से छिपाए रखने का पूरा इंतज़ाम कर रखा था. उन्होंने 'पेड न्यूज़' को लेकर भी बहस को जीवित रखा.

राजनेताओं में जिनकी छवि इस साल निखरी है वे हैं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार. उन्होंने विधानसभा चुनाव में जिस तरह से विपक्ष को हाशिए पर समेट कर जीत हासिल की है उसने बिहार में एक नई चर्चा छेड़ दी है. कहा जा रहा है कि नीतीश कुमार ने बिहार में विकास की धारा बहा दी है. अब तो उन्हें भविष्य में एनडीए की ओर से प्रधानमंत्री पद के दावेदारों में से एक माना जाने लगा है.

इसी साल ने एक और व्यक्ति की छवि को चमकाया है और उनका नाम है अज़ीम प्रेमजी. सूचना प्रद्योगिकी कंपनी विप्रो के संचालक अज़ीम प्रेमजी ने ग्रामीण इलाक़ों में शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए अपनी निजी संपत्ति में से क़रीब 9000 करोड़ रुपए दान में देने की घोषणा की है.

उनकी घोषणा ने इस साल तो किसी और धनकुबेर को प्रेरित नहीं किया लेकिन उम्मीद रखनी चाहिए कि आने वाला साल उन्हें प्रेरणा दे सकेगा.

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