'सान्याल-सेन के खिलाफ़ तथ्य कमज़ोर'

  • 29 दिसंबर 2010
बिनायक सेन

रायपुर की एक निचली अदालत ने मानवाधिकार कार्यकर्ता बिनायक सेन और उनके साथ दो अन्य लोगों को देशद्रोह के आरोप में उम्रक़ैद की सजा सुनाई है.

नारायण सान्याल के वकील का दावा है कि पूरा मामला पुलिस की ओर से कमज़ोर तथ्यों के आधार पर बुना गया है, जिसके समर्थन में अभियोजन ना सही दलील जुटा पाया है और ना ही गवाह.

बिनायक सेन पेशे से एक चिकित्सक हैं और मानवाधिकार कार्यकर्ता भी हैं जिनपर नक्सलियों के समर्थक होने का आरोप पुलिस नें लगाया है. मगर पुलिस जिसे कट्टर नक्सली बता रही है उनके ख़िलाफ़ भी अभियोजन के पास ज्यादा पुख़्ता दलील नहीं हैं.

दलील

अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश बीपी वर्मा द्वारा दिए गए 92 पन्नों के आदेश का आवलोकन कर रहे कानून के जानकार कहते हैं कि अप्रैल 2006 से रायपुर की जेल में बंद नारायण सान्याल के खिलाफ भी माओवादी होने की बहुत मज़बूत दलील अभियोजन पक्ष ने पेश नहीं की है.

नारायण सान्याल के वकील हाशिम खान का कहना है, "सिर्फ कहा सुनी के आधार पर नारायण सान्याल को पुलिस ने माओवादी नेता करार दिया है. इस आरोप के पीछे उनका कोई मज़बूत तर्क नहीं है ना ही सबूत. अप्रैल 2006 में उन्हें दंतेवाड़ा जिले के कोंटा से जिस हत्या के मामले में छत्तीसगढ़ की पुलिस नें गिरफ्तार किया है उस मामले में पुलिस द्वारा जुटाए गए सभी गवाह बागी हो गए हैं. यहाँ तक कि मामले के अनुसंधानकर्ता पुलिस अधिकारी भी अदालत में पेश नहीं हुए हैं."

'दो तरह के बयान'

हाशिम खान का कहना है कि तीन साल तक यह मामला चला मगर पुलिस अधिकारी इस मामले में अदालत में उपस्थित नहीं हुए.

इससे पहले 28 दिसंबर 2005 को नारायण सान्याल को आन्ध्र प्रदेश के भद्राचलम से गिरफ्तार किया गया था.

पुलिस के अनुसार जब नारायण सान्याल को गिरफ्तार किया गया था तो उनके पास से एक पिस्तौल और कुछ कारतूस बरामद किये गए थे.

खान का कहना है चूँकि पुलिस ने उस मामले में 90 दिनों के अन्दर आरोप पत्र दाखिल नहीं किया इसलिए सान्याल को बेल मिल गयी थी और उन्हें उसी दिन छत्तीसगढ़ पुलिस ने फिर गिरफ्तार कर लिया गया था.

अपील

उनका मानना है की जिस मामले में नारायण सान्याल, बिनायक सेन और पियूष गुहा पर छत्तीसगढ़ जन सुरक्षा अधिनियम लगाया गया, उस मामले में भी अभियोजन पक्ष की दलील काफी कमज़ोर है.

हाशिम खान का कहना है कि पियूष गुहा की गिरफ्तारी के मामले में पुलिस के दो तरह के बयान हैं.

सुप्रीम कोर्ट में पुलिस ने कहा कि उन्हें होटल से गिरफ्तार किया गया जबकि रायपुर की अदालत में पुलिस का कहना था उन्हें रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार किया गया है.

खान कहते हैं, "देखिए सज़ा के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता. इसमें जज को इतनी आज़ादी है कि उन्होंने जो पाया उस पर फैसला दिया. अब अगर हम संतुष्ट नहीं हैं तो हमें ऊपरी अदालत में अपील करने का अधिकार है. हम ऊपरी अदालत में अपील करेंगे."

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