तेलंगाना रिपोर्ट पर आशा और आशंका

पृथक तेलंगाना राज्य के समर्थन में आंदोलन
Image caption पृथक तेलंगाना राज्य की माँग को लेकर काफ़ी दिनों से आंदोलन चल रहा है

आंध्र प्रदेश इस समय आशा और आशंका की मिली जुली भावनाओं और तनाव की चपेट में है. प्रदेश का बँटवारा करके अलग तेलंगाना राज्य बनाने की मांग पर विचार के लिए बनाई गई श्रीकृष्ण समिति ने जब अपनी रिपोर्ट केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम को सौंपी तो राज्य दम साधे ये प्रतीक्षा कर रहा था कि इस पर किस तरह की प्रतिक्रिया सामने आएगी. क्योंकि इस समिति की रिपोर्ट का ब्यौरा सार्वजनिक नहीं किया गया है और कोई यह नहीं जानता की समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा क्या है, कोई भी अभी इस पर टिप्पणी नहीं करना चाहता.

अधिकतर राजनीतिक दल और नेता इस पर खामोश हैं. इस रिपोर्ट के इंतज़ार में कई दिनों से तरह-तरह की अटकलें लगाने वाले नेता और मीडिया दोनों बिल्कुल ख़ामोश रहे.

सरकार ने मीडिया से अनुरोध किया है कि वो श्रीकृष्ण समिति की रिपोर्ट पर उस समय तक न कोई टिपण्णी करे और न ही कोई क़यास लगाए जब तक कि सरकार ख़ुद ही छह जनवरी को इस रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं कर देती है. दूसरी ओर सत्तारुढ़ कांग्रेस के आला कमान ने आंध्र प्रदेश में अपने सांसदों, राज्य मंत्रियों और दूसरे नेताओं को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि वो भी रिपोर्ट को लेकर कोई टिप्पणी ना करें. पार्टी अध्यक्ष सोनिया गाँधी का यह आदेश पार्टी महासचिव वीरप्पा मोइली ने दूसरे नेताओं तक पहुँचाया. लेकिन उससे पहले ही एक लोक सभा सदस्य विवेकानंद ने कहा कि अगर रिपोर्ट तेलंगाना के ख़िलाफ़ रही तो वो त्याग पात्र दे देंगे.

एक और लोक सभा सदस्य पूनम प्रभाकर ने कहा कि तेलंगाना के कांग्रेसी सांसदों को श्रीकृष्ण समिति की रिपोर्ट से कोई मतलब नहीं है और वो चाहते हैं कि केंद्र सरकार गत वर्ष दिसंबर में किए अपने वादे को पूरा करे और संसद के अगले अधिवेशन में तेलंगाना राज्य का बिल लाए. अलग राज्य को फिर जीवन देकर खड़ा करने वाली तेलंगाना राष्ट्र समिति भी ख़ामोश ही रही. पार्टी महासचिव टीआर राव ने केवल इतना कहा कि छह जनवरी को तमाम राजनीतिक दलों की एक और बैठक बुलाने का गृहमंत्री का फ़ैसला अनैतिक है.

उन्होंने कहा कि अगर बैठक करनी ही है तो उस में हर दल से दो प्रतिनिधियों को बुलाने की ज़रूरत नहीं है, केवल हर पार्टी अध्यक्ष को बुलाना चाहिए.

इस ऐतराज़ का कारण ये दिखाई देता है कि अगर कांग्रेस और तेलुगू देशम आंध्र और तेलंगाना क्षेत्रों के एक-एक प्रतिनिधि को बैठक में भेजती है तो एक बार फिर उनके आपसी मतभेद असल विषय को पीछे धकेल देंगे और मामला ठंडे बस्ते में जाने का डर रहेगा. पुलिस सतर्कता इधर गुरूवार को पूरे आंध्र प्रदेश में और विशेषकर हैदराबाद और तेलंगाना के दूसरे ज़िलों में पुलिस सुरक्षा कड़ी कर दी गई है. आंध्र प्रदेश पुलिस के महानिदेशक के अरविंद राव ने कहा कि पुलिस हर स्थिति का सामना करने के लिए तैयार है.

Image caption हिंसा की आशंका के बीच सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की गई है

उन्होंने कहा कि केंद्र ने अर्द्धसैनिक बलों की 50 कंपनियाँ आंध्र प्रदेश भिजवाई हैं जिन्हें तैयार रखा गया है और उन्हें केवल ज़रूरत पड़ने पर ही तैनात किया जाएगा. लेकिन तेलंगाना के कुछ इलाकों में इन सुरक्षा बलों ने फ़्लैग मार्च किया है. पुलिस का कहना है की ये फ़्लैग मार्च लोगों में सुरक्षा की भावना पैदा करने के लिए है जबकि राजनीतिक दल कह रहे हैं कि इससे लोगों में भय फैल रहा है. अरविंद राव ने कहा, "इन बलों को एहतियात के तौर पर रखा गया है क्योंकि पिछले वर्ष इसी मुद्दे पर काफ़ी हिंसा हुई थी और 1667 मामले दर्ज किए गए थे." उन्होंने कहा, "मेरी निजी राय में किसी को डरने और घबराने की कोई ज़रूरत नहीं है क्योंकि जो लोग इस आंदोलन में भाग ले रहे हैं उन्होंने भी बार-बार यही कहा है कि उनका आंदोलन लोकतांत्रिक होगा और उन्हें इस बात की भी चिंता होगी की वो जो कुछ करेंगे उस पर लोग क्या सोंचेंगे." यह भी महत्वपूर्ण है कि पुलिस ने आंदोलनकर्ताओं की भीड़ पर कोई प्राणघातक हथियारों का उपयोग नहीं करने का फ़ैसला किया है. अरविंद राव ने कहा कि पुलिस को ऐसे हथियार दिए गए हैं जो कम घातक हैं. इनमें रबर की गोलियां भी शामिल हैं.

साथ ही सीधे गोली चलाने की आदत रखने वाले अर्द्धसैनिक बलों से भी कहा गया है कि वो संयम से काम लें और ज़्यादा शक्ति का उपयोग न करें.

इस बीच राज्य के सचिवालय पर भी सुरक्षा कड़ी कर दी गई है और इसके आसपास सीमा सुरक्षा बल के जवान तैनात कर दिए गए हैं ताकि सचिवालय में घुस कर गड़बड़ करने की कोई कोशिश सफल न हो सके. इतने कड़े प्रबंधों पर टिप्पणी करते हुए लोक गायक और तेलंगाना प्रजा फ्रंट के अध्यक्ष ने कहा, "इन सुरक्षा उपायों से ही लगता है कि रिपोर्ट तेलंगाना के पक्ष में नहीं होगी. अगर पक्ष में होती तो अर्द्धसैनिक बल यहाँ नहीं आंध्र में तैनात किए जाते." बहरहाल, अब सब को इंतज़ार है छह जनवरी का, जबकि केंद्र सरकार पहले आठ राजनीतिक दलों को और फिर आम लोगों को यह बताएगी की इस रिपोर्ट में क्या है और वो उस पर क्या कार्रवाई करने का इरादा रखती है. और शायद तब ही आंध्र प्रदेश और उसकी जनता के लिए परीक्षा का समय शुरू होगा.

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