आंध्र के लिए रहा अस्थिरता भरा वर्ष

  • 31 दिसंबर 2010
तेलंगाना समर्थक

वर्ष 2010 आंध्र प्रदेश में जिस अनिश्चितता के वातावरण में शुरू हुआ था उसी हाल में समाप्त भी हो रहा है. मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी की हवाई दुर्घटना में मौत की त्रासदी का साया इस पूरे वर्ष आंध्र प्रदेश की राजनीति पर मंडराता रहा और यह बात खुलकर सामने आई कि कांग्रेस पार्टी इस झटके से आंतरिक रूप से टूट-फूट गई है. दूसरी ओर अलग तेलंगाना राज्य के आंदोलन ने भी राज्य की चूलें हिला कर रख दी हैं. हालांकि फ़रवरी में केंद्र सरकार की ओर से श्रीकृष्णा समिति गठित किए जाने के बाद आंदोलन कुछ थमा लेकिन बेचैनी ख़त्म नहीं हुई और किसी न किसी मुद्दे पर गड़बड़ी होती रही. इससे जो हालत बिगड़े उस पर टिप्पणी करते हुए हैदराबाद के पुलिस आयुक्त अब्दुल कयूम ख़ान ने कहा, "इतना ख़राब और कठिनाइयों से भरा साल हमने पहले नहीं देखा."

राजनीति

Image caption वाईएसआर की मौत का साया राजनीति पर मंडराता रहा

राजनीतिक रूप से तेलंगाना राष्ट्र समिति और उसके नेता के चन्द्रशेखर राव और भी ज़्यादा शक्तिशाली बनकर उभरे.

टीआरएस के जितने विधायकों ने तेलंगाना के लिए त्यागपत्र दिया था न केवल वो सब चुने गए बल्कि उसने तेलुगू देशम पार्टी की एक सीट भी छीन ली. दूसरी और कांग्रेस का अंदरूनी कलह भी राजनीतिक अस्थिरता को बढ़ाने का एक कारण था.

वाईएसआर की मृत्यु के बाद मुख्यमंत्री बनाए गए वरिष्ठ नेता के रोसैया प्रभावशाली नेता सिद्ध नहीं हो सके और उनकी विफलताओं की बढ़ती सूची के मद्देनज़र कांग्रेस आलाकमान ने उन्हें रुख़सत कर दिया. रोसैया वाईएसआर के पुत्र और बाग़ी सांसद वाईएस जगनमोहन रेड्डी की चुनौती का मुक़ाबला नहीं कर सके और उनसे टक्कर लेने के लिए सोनिया गाँधी ने चुना नाल्लारी किरण कुमार रेड्डी को. लेकिन उसके बाद भी जगन मोहन ने और भी ज़्यादा आक्रामक रुख़ अपनाते हुए कांग्रेस और लोकसभा से त्यागपत्र दे दिया और अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना शुरू कर दिया. शुरू में केवल आठ-दस कांग्रेसी विधायक ही जगन के साथ नज़र आए लेकिन अब उनकी संख्या बढ़कर 20 -25 के क़रीब पहुँच गई है. वर्ष 2011 में कांग्रेस के लिए सब से बड़ी चुनौती यह होगी कि वे और विधायकों को जगन के साथ जाने से कैसे रोकें और कैसे राज्य में अपनी सरकार को बचाए रखें.

कृषि-व्यापार

Image caption अच्छी फसल बारिश और बाढ़ की भेंट चढ़ गई

इस राजनीतिक उठापटक का व्यापार जगत पर भी बहुत बुरा असर पड़ा.

राज्य में इस वर्ष किसी बड़ी परियोजना पर काम शुरू नहीं हो सका और न ही किसी बड़े पूँजी निवेश की घोषणा हुई.

कृषि क्षेत्र के लिए भी यह वर्ष विनाशकारी ही रहा.

हालाँकि पहले अच्छी बारिश से उम्मीद बंधी थी कि इस साल बहुत अच्छी फसल होगी लेकिन दिसंबर के आते-आते इतनी बारिश हुई और बाढ़ आई और प्राकृतिक विपदाएँ टूटीं कि लाखों एकड़ पर खड़ी फसल नष्ट हो गई.

किसानों की आत्महत्याओं की लहर चल पड़ी. अनुमान लगाया जा रहा है कि इसी महीने 200 से ज़्यादा किसानों ने आत्महत्याएं की हैं.

ग्रामीण इलाकों के संकट को दर्शाते हुए ऐसी कई महिलाओं और पुरुषों ने भी आत्महत्याएँ कीं जिन्होंने माइक्रो फ़ाइनैंस कंपनियों यानी छोटे ऋण देने वाली कंपनियों से ऋण लिया था. ब्याज़ दर ज़्यादा होने की वजह से वे उसे चुका नहीं पाए.

साल के अंत में किसानों के लिए आमरण अनशन करके चंद्राबाबू नाडयू ने किसानों के मुद्दे को सुर्खियों में ला दिया और केंद्र सरकार को उन्हें मुआवज़ा देने की घोषणा करनी पड़ी.

क़ानून व्यवस्था

बीता बरस हैदराबाद के लिए इन मायनों में भी ख़राब रहा कि एक लंबे समय के बाद नगर को सांप्रदायिक हिंदू-मुस्लिम दंगों की मार झेलनी पड़ी जिसमें चार लोगों की जान गई और कई दिनों तक कर्फ़्यू लगाना पड़ा. आतंकवाद के मोर्चे पर भी नगर को एक धक्का लगा जबकि चरमपंथियों ने एक पुलिसकर्मी को गोली मार दी और कहा कि यह मक्का मस्जिद में विस्फोट और उसके बाद हुई पुलिस फ़ायरिंग का बदला है. लेकिन दूसरी ओर पुलिस को भी चरमपंथियों के विरुद्ध काफ़ी सफलताएँ मिलीं.

उसने पुलिस कर्मी को गोली मारने वाले चरमपंथी विकार अहमद को गिरफ्तार कर लिया और उससे पहले उसने हरकत-उल-जिहाद के दो कार्यकर्ताओं को भी पकड़ कर चरमपंथी हमले की साज़िश विफल कर दी. चरमपंथ के विरुद्ध लड़ाई में एक और कामयाबी यह मिली कि केंद्रीय जाँच ब्यूरो ने मक्का मस्जिद विस्फोट में हिंदू कट्टरवादी संगठनों के लिप्त होने का पता लगाया और इस संबंध में तीन व्यक्तियों, आरएसएस के प्रचारक देवेंद्र गुप्ता, लोकेश शर्मा और असीमानंद को गिरफ़्तार करके उनके ख़िलाफ़ अभियोग पत्र अदालत में दाख़िल किया गया.

नक्सलवाद के मोर्चे पर यह वर्ष राज्य के लिए अच्छा रहा और हिंसा का स्तर काफ़ी घटा.

हालांकि माओवादियों के हाथों इस वर्ष 21 नागरिक मारे गए और पुलिस ने 12 माओवादियों को मारा लेकिन किसी पुलिस वाले की जान नहीं गई.

वर्ष 2009 में भी माओवादियों के हाथों कोई पुलिस वाला नहीं मारा गया था लेकिन वर्ष 2008 में एक ही घटना में 33 पुलिस वाले मारे गए थे जिनमें 32 ग्रे-हाउंड कमांडो शामिल थे. यह घटना तब हुई थी जब माओवादियों ने उड़ीसा की बालीमेला झील में इन पुलिस वालों की कश्ती डुबो दी थी. इस वर्ष माओवादियों को बड़े नुक़सान उठाने पड़े और उनके कई बड़े नेता मारे गए. उन्होंने आंध्र प्रदेश में वापस आकर अपनी गतिविधियाँ शुरू करने की कोशिश की लेकिन क़ामयाब नहीं हो सके.

अनिश्चितता के बादल

Image caption तेलंगाना पर बनी श्रीकृष्णा समिति की रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंप दी है

अब जबकि आंध्र प्रदेश नव वर्ष में क़दम रखने जा रहा है, हालात में तुरंत कोई ख़ास बदलाव की उम्मीद नहीं दिखती.

अनिश्चितता और अस्थिरता के काले बादल राज्य पर मंडरा रहे हैं.

अब सबके दिमाग में एक ही सवाल है: क्या आंध्र प्रदेश एक राज्य रह पाएगा या उसके दो टुकड़े हों जाएंगे या फिर तीन.

चाहे जवाब कुछ भी हो, राज्य में हालत के जल्द सामान्य होने की कोई आशा नहीं है.

अगर तेलंगाना बनता है तो आंध्र और रायल सीमा के लोग नाराज़ होंगे और नहीं बनता है तो तेलंगाना भड़क उठेगा.

तेलंगाना बनता है तो आंध्र और रायल सीमा के सांसद और विधायक इस्तीफ़े की धमकी दे रहे हैं और अगर तेलंगाना नहीं बनता है तो वहां के सांसद और विधायक अपने त्यागपत्र अभी से लहरा रहे हैं.

लगता यह है कि आंध्र प्रदेश में अगर कोई राजनीतिक भूकंप आता है तो उसके झटकों से केंद्र सरकार भी बची नहीं रहेगी.

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