कश्मीर में हत्याओं का वर्ष

कश्मीर

भारत प्रशासित कश्मीर में वर्ष 2010 को किशोर और युवाओं की हत्याओं का वर्ष कहा जा रहा है.

हत्याओं का यह सिलसिला जनवरी महीने में शुरू हुआ जब श्रीनगर में सातवीं कक्षा का एक छात्र वामिक फारूक़ पुलिस के हाथों मारा गया.

मई महीने में यह कांड भी सार्वजनिक हुआ कि भारतीय सेना ने कथित रूप से उत्तरी कश्मीर में तीन आम नागरिकों को नौकरी की लालच देकर उनका अपहरण करवाया और फिर सीमावर्ती इलाक़े मछिल में एक नकली संघर्ष में मार डाला.

यह भी माना जाने लगा कि इन नागरिकों को इसलिए मारा गया क्योंकि सेना के कुछ अधिकारी इनको सशस्त्र चरमपंथी जता कर इनाम और तरक्कियाँ हासिल करना चाहते थे.

लेकिन यह कांड भी ज़्यादा दिनों तक अख़बारों की सुर्ख़ियों में न रह सका क्योंकि, पर्यवेक्षकों के अनुसार, जून के महीने से पुलिस और अर्ध सैनिक बलों के हाथों युवाओं की हत्याओं का एक लंबा सिलसिला चल पड़ा.

बेलगाम

राज्य के क़ानून मंत्री अली मोहम्मद सागर ने एक बार एक संवाददाता सम्मेलन बुला कर केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल यानी सीआरपीएफ़ को बेलगाम फ़ोर्स बताया.

Image caption पुलिस पर कई गंभीर आरोप भी लगे हैं

लेकिन बाद में स्थानीय पुलिस पर भी बार-बार यह आरोप लगाया गया कि वो संयम से काम न लेते हुए बिना वजह गोली चला कर लोगों को मार रही है.

इन हत्याओं पर लोगो में काफ़ी ग़ुस्सा फैल गया और पूरी घाटी में लोगों ने सड़कों पर आकर विरोध प्रदर्शन किया.

इस दौरान अलगाववादी हुर्रियत कॉन्फ़्रेंस के गिलानी धड़े ने 'कश्मीर छोड़ दो' आंदोलन की घोषणा कर दी.

हुर्रियत कॉन्फ़्रेंस के कहने पर घाटी के विभिन्न भागों में सड़को पर 'गो इंडिया, गो बैक' के नारे लिखे गए जो अब भी मौजूद है.

सितंबर महीने के अंत तक पुलिस और अर्ध सैनिक बलो की फ़ायरिंग में मरने वालों की संख्या 100 से अधिक हो गयी. ये लोग या तो पुलिस पर पत्थर फेंक रहे थे या फिर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच संघर्ष के दौरान अथवा तुरंत बाद राह चल रहे थे कि उन्हें गोली का निशाना बनाया गया.

भारत विरोधी जन आंदोलन उसके बाद भी जारी रहा. हुर्रियत कॉन्फ़्रेंस गिलानी ग्रुप के आह्वान पर घाटी में कुल मिला कर चार महीने बंद रखा गया जबकि सरकार ने विरोध प्रदर्शन को रोकने के लिए लगभग एक सौ दिन तक कर्फ़्यू लगा दिया.

घेराबंदी

परिणामस्वरूप घाटी की लगभग पूरी आबादी जैसे घेराबंदी में रही. श्रीनगर के बटमालो इलाक़े में रह रहे 40 वर्षीय ज़ुबैर अहमद ने इस पर कहा, "अगर आगे भी ऐसी ही हालत रही तो घाटी में मानसिक रोग के और अस्पताल खोलने पड़ेंगे."

Image caption कई इलाक़ों में लंबे समय तक कर्फ़्यू जैसा माहौल रहा

केंद्र सरकार ने स्थिति की समीक्षा के लिए संसद सदस्यों का एक सर्वदलीय मंडल भेजा जिसकी अध्यक्षता स्वयं गृह मंत्री पी चिदंबरम कर रहे थे.

दल के सदस्यों ने अलगाववादी नेताओं और आम लोगों से मुलाक़ातें की. इस प्रतिनिधिमंडल की सिफ़ारिशों के आधार पर केंद्र सरकार ने आठ सूत्री पहल की घोषणा कर दी.

इसमें सुरक्षा बलों की संख्या घटाने, सेना के विशेष अधिकार वापस लेने और राजनैतिक क़ैदियों की रिहाई के बारे में गंभीरता से विचार करने का वादा किया गया.

लेकिन वास्तव में इस संबंध में कोई उल्लेखनीय क़दम नहीं उठाया गया है. इसी आठ-सूत्री पहल के अंतर्गत केंद्र ने वार्ताकारों की तीन-सदस्य टीम का ऐलान कर दिया.

वार्ता

लेकिन इसमें किसी राजनेता के बजाए एक पत्रकार, एक विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर और एक नौकरशाह को शामिल किया गया. कश्मीरी अलगाववादियों ने इसे एक मज़ाक कहकर इन वार्ताकारों से मिलने से इनकार कर दिया.

Image caption दिलीप पडगाँवकर वार्ताकारों में शामिल हैं

भारत में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी को छोड़ कई राजनैतिक पार्टियों के नेताओं ने भी वार्ताकारों की इस टीम पर आपत्ति जताई है.

उनका कहना है कि कश्मीर समस्या का समाधान तलाश करने के लिए संसद सदस्यों की समिति गठित करना उचित होगा. पूर्व केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष राम विलास पासवान का कहना है कि केंद्र सरकार के लिए ज़रूरी है कि वो कश्मीरी जनता को अपनी साफ़-नीयत और गंभीरता का विश्वास दिलाए. कश्मीर घाटी में अब शांति बनी हुई है. अलगाववादी नेता अब बंद का आह्वान नहीं कर रहे. बल्कि कई हलकों में अब भी इस बात पर चर्चा जारी है कि हुर्रियत कॉन्फ़्रेंस गिलानी धड़े ने चार माह तक घाटी में बंद का आयोजन किया, वो सही क़दम था अथवा ग़लत.

लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण प्रश्न जिसका किसी के पास जवाब नहीं है, वो ये कि आगे क्या होगा. कश्मीर में गत तीन वर्षो के दौरान हालात में जो उतार-चढ़ाव आए, उनके देखते कोई भी पर्यवेक्षक आगे के हालात के बारे में भविष्यवाणी करने का साहस नहीं करता.

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