2011: कैसी रहेगी लोकतंत्र की सेहत?

  • 12 जनवरी 2011
सोनिया और मनमोहन
Image caption इस समय मनमोहन सिंह के मंत्रिमंडल में फ़ेरबदल की चर्चा चल रही है

नए साल में लोकतंत्र की सेहत कैसी रहेगी?

अगर यह सवाल आपके मन में है, तो एक सुझाव मानिए. खबरों के सैलाब में डूबने से बचने के लिए कुछेक खंभे गाड़ लीजिए. इन खंभों पर मचान बांधकर बैठ जाइए. हर ख़बर के पीछे भागने के बजाय इन खंभों को देखकर नाप लीजिए कि हमारा लोकतंत्र कितने पानी में है. इस संदर्भ में वर्ष 2011 के लिए लोकतंत्र की 11 कसौटियाँ ये हैं.

2जी घोटाले की चटपटी खबरों पर वक़्त बरबाद करने के बजाय अपनी नज़र एक दूरगामी सवाल पर गड़ाकर रखें. इस राष्ट्रीय क्षोभ के फलस्वरूप क्या ऐसा कुछ हुआ, जिससे एक और घोटाले की आशंका घटे? अगर भ्रष्ट राजा को शुरू से ही रंक होने का डर सताए? उत्तर तो आप को खुद खोजना पड़ेगा, लेकिन इसकी एक झलक इसी महीने केंद्रीय मंत्रिमंडल के संभावित पुनर्गठन से मिल जाएगी.

राडिया टेपों में बहुचर्चित मंत्रियों कमलनाथ, मुरली देवड़ा और प्रफुल्ल पटेल की कुरसी बची रहे, तो आप खुद ही निष्कर्ष निकाल सकते हैं. अगर सिर्फ़ प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत ईमानदारी की चर्चा हो, तो इसे बाक़ी मंत्रियों के चरित्र पर टिप्पणी की तरह पढ़ सकते हैं.

तेलंगाना और कश्मीर

Image caption कश्मीर में 2010 का साल कर्फ़्यू और पथराव के बीच बीता

तेलंगाना के मुद्दे पर असली सवाल यह नहीं है कि अलग राज्य बनेगा या नहीं. जहाँ मन का बंटवारा हो चुका हो, वहां चूल्हा अलग होने से कोई नहीं रोक सकता. असल सवाल यह है कि राज्य का बँटवारा समझदारी और शांति के रास्ते से होगा या बदहवासी और हिंसा के माहौल में.

तेलंगाना को कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व की राजनीतिक सूझबूझ की कसौटी मानकर चलिएगा. अगर नेतृत्व दूरदर्शी है, तो तेलंगाना का जन्म भारतीय संघ के पुनर्गठन का एक सकारात्मक कदम बन सकता है.

अगर असमंजस, दोहरेपन और तिकड़म के ही दर्शन होते रहें, तो जाहिर है कि यह नेतृत्व देश का दीर्घकालिक हित नहीं समझता.

जम्मू-कश्मीर समस्या बेशक एक कड़ी परीक्षा है. मनमोहन सिंह सरकार ने फिर इसे एक गहरी खाई के कगार तक धकेल दिया है. नए साल में क्या हमें गैर राजनीतिक मध्यस्थों की हल्की-फुल्की बातचीत की बेमानी खबरें ही परोसी जाएंगी?

या फिर कश्मीर के अलगाव, जम्मू के असंतोष और लद्दाख की आकांक्षाओं से एक साथ संवाद करने की ठोस राजनीतिक पहल होगी?

खाद्यान्न सुरक्षा

राजस्थान का गुर्जर विवाद केवल एक राज्य के एक समुदाय से जुड़ा या फिर क़ानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं है.

यह सवाल देश में सामाजिक न्याय की नीति और राजनीति के ठहराव से जुड़ा है. जब नेता अल्पकालिक और अवसरवादी खेल खेलते हैं तो जनता भी समझ जाती है कि बांह मरोडऩे के सिवा कोई रास्ता नहीं है.

दीर्घकालिक समाधान के लिए राज्य सरकार को अपनी आरक्षण नीति की समीक्षा करनी होगी. केंद्र सरकार को जातिवार जनगणना को शिक्षा और रोजगार के आंकड़ों से जोडऩा होगा. नहीं तो यह मुद्दा अलग-अलग रूप में बार-बार उठता रहेगा.

बहुचर्चित महंगाई के बजाय खाद्य सुरक्षा क़ानून का तकनीकी-सा लगने वाला मुद्दा यह तय करेगा कि देश के भविष्य की योजनाओं में ‘आम आदमी’ के लिए कितनी जगह है.

सोनिया गांधी की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद पहले ही हर व्यक्ति के खाद्यान्न की गारंटी में काफ़ी कटौती स्वीकार कर चुकी है. लेकिन मनमोहन सिंह का दफ़्तर इसमें और भारी कांट-छांट पर आमादा है.

इस रस्साकशी का नतीजा इस सरकार के चरित्र को तो परिभाषित करेगा ही, 12वीं पंचवर्षीय योजना का रुझान भी तय करेगा.

लाल झंडा और राजनीतिक सुधार

पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन की संभावना हमारी कसौटियों को सरकार से व्यवस्था की ओर ले जाती है. यहां सवाल यह नहीं है कि वाम मोर्चा विधानसभा चुनाव हारेगा या नहीं. अब तो कोई चमत्कार ही वाम मोर्चे के डूबते जहाज को बचा सकता है.

असली सवाल यह है कि वाम मोर्चा कैसे हारेगा और उसकी हार के परिणाम क्या होंगे. क्या वाम मोर्चा उसी तरह से रुख़सत होगा, जैसे अन्य पार्टियां और सरकारें जाती हैं या कि लाल झंडा उतरने से पहले बंगाल की धरती ख़ून से लाल होगी? जनाधार खोता वाम मोर्चा ‘हरमद वाहिनी’ और बंदूक का सहारा लेगा, तो क्या विपक्ष भी यही हथकंडा अपनाएगा?

सरकार बदलेगी, तो क्या सत्ता का स्वरूप भी बदलेगा? उधर क्या चुनावी हार कम्युनिस्ट आंदोलन में आत्मालोचन की शुरुआत कर सकेगी? नई सदी में नए वामपंथ की संभावना बनेगी?

चुनाव सुधार और राजनीतिक व्यवस्था सुधार की दृष्टि से यह वर्ष खास अहमियत रखता है.

सवाल है कि यह प्रयास कोई ठोस शक्ल लेगा या एक बार फिर फ़ाइल का पेट भरने की औपचारिकता पूरी हो जाएगी.

सोनिया गांधी ने बुराड़ी सत्र में राजकीय कोष से चुनावी खर्च की बात करके एक ठोस शुरुआत की है. लेकिन साथ ही मीडिया और कुछ राजनीतिक हल्कों में इसका विरोध भी शुरू हो गया है.

कानून मंत्रालय ने चुनाव सुधार पर कानून बनाने के लिए बातचीत शुरू कर दी है, लेकिन इस प्रयास की दिशा स्पष्ट नहीं है. राष्ट्रीय सलाहकार परिषद सूचना का अधिकार क़ानून मजबूत करने की सोच रही है, तो सरकार इसे कमज़ोर करने का दबाव बना रही है.

अभिव्यक्ति का सवाल

लोकतंत्र में सुधार केवल सरकार, सत्ता और राजनीति में बदलाव से नहीं आएगा. पिछला वर्ष जाते-जाते लोकतंत्र के एक और स्तंभ यानी मीडिया में सुधार का एक मौका दे गया है.

सवाल यह है कि राडिया टेप के रहस्योद्घाटन से शुरू हुई यह प्रक्रिया क्या सिर्फ़ व्यक्तिगत दोषारोपण पर रुक जाएगी या इससे मीडिया में कुछ संस्थागत सुधारों की गुंजाइश बनेगी.

विनायक सेन को देशद्रोह की सज़ा का मामला देश में मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के भविष्य से जुड़ा है.

देश भर के मानवाधिकार संगठन और जनांदोलन पहले ही इस फैसले की भर्त्सना कर चुके हैं. विनायक सेन को सज़ा और अरुंधति राय के ख़िलाफ़ मुक़दमा देश भर में मानवाधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे लोगों को इशारा है.

देश के अलग-अलग राज्यों में सूचना के अधिकार से जुड़े कार्यकर्ताओं की हत्या हुई है. नए वर्ष में असहमति के बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकार की रक्षा के प्रयास होंगे?

सत्ता पक्ष और विपक्ष की कबड्डी से परे जाकर नए वर्ष में एक बड़ा सवाल पूछना होगा.

क्या राजनीतिक क्षितिज पर कोई विकल्प उभरेगा? यहां विकल्प का मतलब स्थापित राजनीति का स्थापित विकल्प नहीं है. सवाल यह है की क्या वैकल्पिक चाल, चरित्र और विचार वाली एक वैकल्पिक राजनीति उभरेगी.

लोकतंत्र की सेहत को जांचने की आखिरी कसौटी पर आपको स्वयं अपने आप को कसना होगा.

जनतंत्र कोई ऐसी मशीन नहीं है, जो हम सब के सोते-सोते अपने आप चलती रहेगी. इसलिए हमें अपने आप से पूछना होगा कि लोकतंत्र को समृद्ध करने के लिए हमने क्या किया?

राजनीति की दशा और दिशा के बारे में गंभीरता से विचार किया? किसी सवाल पर सरकारी या अन्य किसी अधिकारी से सूचना मांगी?

आप जिसे भी सही बात मानते हैं, उसके समर्थन में किसी मोर्चे, धरने, प्रदर्शन में शामिल हुए? अपने विरोधी की बात धीरज से सुनी? सिर्फ़ राजनीति को गाली ही दी या फिर किसी ईमानदार राजनीतिक कार्यकर्ता को समर्थन और सहयोग भी दिया?

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

संबंधित समाचार