रैन बसेरों में सुविधाओं का अभाव

रैन बसेरा
Image caption राज्य के जयपुर सहित पाँच बड़े शहरों में इस समय 39 रैन बसेरे हैं

राजस्थान में सरकार ने ठंड से ठिठुरते लोगो के लिए रैन बसेरे तो स्थापित किए है लेकिन सामाजिक संगठनों का आरोप है कि इन रैन बसेरों में बुनयादी सुविधाएं नहीं हैं.

राज्य सरकार ने राजधानी जयपुर में बीस रैन बसेरे स्थापित करने का दावा किया है.

पूरे राज्य में कड़ाके की ठंड पड रही है. जयपुर में बुधवार की रात बीते बीस सालों में सबसे सर्द रात बताई जा रही है.

इस कड़ाके की ठंड से लोगों को बचाने के लिए सड़क के निकट बने एक रैन बसेरे में उत्तरप्रदेश के बदायूँ से आया रमेश भी है.

रमेश कहता है अगर रैन बसेरा नहीं होता तो उसकी जान चली जाती .

शुक्रगुज़ार

वो अपने किसी रिश्तेदार के इलाज के लिए जयपुर आया है.

रमेश का कहना था, ''हमें इस रैन बसेरे में रजाई और गद्दे मिल गए हैं. भोजन भी मुफ़्त मिल गया. हम इसके लिए शुक्रगुज़ार हैं.''

अजमेर से आए रतन सिंह कहते हैं कि उसे सरकारी अस्पताल में ही पता चला कि यहाँ रैन बसेरा है. ये नहीं होता तो दिक़्कत हो जाती.

उसका कहना था कि ऐसी सुविधा अन्य शहरों में नहीं है. ये ही बात पाली ज़िले से आए देश राज ने बयान की.

जयपुर के इस रैन बसेरे में महिलाओं के लिए अलग से व्यवस्था है. यहीं टोंक से आई सुगनी देवी मिलीं.

उनका कहना था कि ये जगह बहुत ही ठीक है. यहां महिलाएं अपने आपको सुरक्षित महसूस कर सकती हैं.

मूलभूत सुविधाएं नहीं

मगर रैन बसेरे में शरण लिए बैठे लोगों का कहना था कि यहाँ मूलभूत सुविधाओं का अभाव है.

एक रैन बसेरे के प्रभारी वीरेंदर सोमरा ने बीबीसी को बताया कि उनके पास दो सौ लोगों की व्वयस्था है और हर रोज़ कोई सवा सौ लोग शरण लेते हैं.

वीरेंदर सोमरा का कहना है, '' महिलाओं के लिए अलग से व्यवस्था है. यहाँ भोजन पानी की व्यवस्था है. लेकिन बाथरूम न होने से लोग परेशान हैं. रात को कई बार नशेड़ी और शराबी भी तंग करते हैं तो उन्हें पुलिस की मदद लेनी पड़ती है.''

उधर सामजिक कार्यकर्ता कविता श्रीवास्तव कहती हैं कि रैन बसेरे मापदंड के मुताबिक नहीं हैं. सामाजिक संगठनों ने रैन बसेरों का सर्वे कर अदालत में रिपोर्ट पेश की है. इन संगठनों का कहना है कि राज्य के जयपुर सहित पाँच बड़े शहरों में 51 रैन बसेरे होने चाहिए लेकिन 39 ही हैं.

कविता श्रीवास्तव कहती हैं, '' ये रैन बसेरे पक्के भवन में होने चाहिए जबकि शामियानों में चल रहे हैं.महिलाओं के लिए अलग से व्यवस्था नहीं है, वहीं सरकार ये दावा करती है कि व्यवस्था माक़ूल है.'' जयपुर में सरकारी इंतजामों के बावजूद अनेक ग़रीब लोग रात फुटपाथ पर ही गुजार देते हैं. कोटा से आया रिक़्शा चालक रमेश ऐसे ही खुले में रात बिताता मिला. रमेश कहने लगा कि अगर वो रैन बसेरे में चला गया तो फिर रिक़्शे की हिफ़ाज़त कौन करेगा?

जिनके पास दौलत है वो दिवंगत होकर भी भव्य स्मारकों में रहते हैं. लाखो ऐसे भी हैं जो ताउम्र मेहनत करते है. अपने जिस्म को भवन निर्माण की मजदूरी में न्यौछावर करते हैं लेकिन छत भी नसीब नहीं होती.

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