माओवादियों की उगाही….

नक्सली
Image caption छत्तीगसगढ़ और झारखंड में नक्सलियों का बड़ा प्रभाव है

नक्सलियों के सबसे मज़बूत गढ़ माने जाने वाले छत्तीसगढ़ में व्यावसायी ही नहीं सरकारी अधिकारी भी जान के डर से माओवादियों को पैसे देते हैं.

छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री ननकी राम कंवर की एक चिट्ठी में यह बात सामने आई है.

हाल ही में उन्होंने राज्य के अपराध अनुसंधान विभाग यानी सीआईडी को पत्र लिख कर ऊँचे ओहदों पर बैठे कुछ एक अधिकारियों द्वारा माओवादियों को कथित रूप से पैसे पहुंचाने की जांच करने का निर्देश दिया है.

गृह मंत्री की चिट्ठी में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना से जुड़े एक कार्यपालक अभियंता के बारे में बताया गया है जिसने कथित रूप से माओवादियों को उगाही के तौर पर एक मोटी रक़म पहुंचाई है.

इस मामले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि उक्त अधिकारी ने कथित रूप से माओवादियों को पहुंचाई जाने वाली रक़म अपने मातहतों से भी वसूल की है.

बाद में इसका खुलासा होने पर अधिकारी का कहना था कि उन्होंने अपनी जान बचाने के लिए ऐसा किया है.

मगर गृह मंत्री ननकीराम कंवर इस दलील से संतुष्ट नहीं हैं.

कंवर ने बीबीसी से बात करते हुए कहा, ‘‘सवाल उठता है कि अगर उस अधिकारी को जान का खतरा था तो उसने सरकार को क्यों सूचित नहीं किया. या फिर यह क्यों नहीं बताया कि माओवादी उससे जबरन पैसे मांग रहे हैं.’’

यह अधिकारी बस्तर संभाग के नक्सल प्रभावित कोंडागांव इलाके में प्रतिनियुक्त है. सूत्रों का कहना है कि पिछले दिनों कांकेर जिला की पुलिस नें एक संदिग्ध माओवादी को गिरफ्तार किया था जिसने अपने इकबालिया बयान में कथित रूप से उस अधिकारी के बारे में खुलासा किया था.

अधिकारियों का पैसा

कंवर कहते हैं, ‘‘इस मामले को हलके तौर पर नहीं लिया जाना चाहिए. इस लिए मैंने सीआईडी से जांच करने को कहा है.’’

कंवर नें अपने पत्र में कहा है कि नक्सलियों को पैसे देने वाले अधिकारी पर कौन सा अपराध बनता है यह तय कर के कार्रवाई होनी चाहिए.

हांलाकि मजेदार बात यह है कि सीआईडी विभाग के अधिकारियों का कहना है कि अभी तक उन्हें गृह मंत्री की चिट्ठी नहीं मिली है.

इस बाबत पूछे जाने पर कँवर कहते हैं, ‘‘हर जगह बाबूओं का राज है. चिट्ठी चार जनवरी को ही भेजी गई है. हो सकता है साहब नहीं हों और चिट्ठी अभी तक बाबू के पास ही हो.’’

बहरहाल गृह मंत्री के पत्र से उन विभागों में खलबली मच गई है जो सीधे तौर पर विकास के काम से जुड़े हुए हैं. इन्हीं विभागों में काम करने वाले कुछ एक अधिकारियों का कहना है कि बिना माओवादियों को पैसा दिए उनके आधार वाले इलाकों में कोई भी विकास का काम नहीं कराया जा सकता है.

हालांकि माओवादियों द्वारा पैसे की उगाही विवाद का विषय रहा है लेकिन अगर पुलिस की मानें तो माओवादी तेंदू पत्ता के व्यवसाय और खनिज पैदा करने वाले इलाक़ों में जबरन उगाही के ज़रिए अच्छी कमाई करते हैं.

आंकलनों के हिसाब से सिर्फ छत्तीसगढ़ और झारखंड से माओवादी सालाना 25 सौ करोड़ रूपए की वसूली करते हैं. यह सिर्फ अनुमान पर आधारित आंकडें हैं जिनकी कोई ठोस पुष्टि नहीं की जा सकती है.

पुलिस की रिपोर्टों के अनुसार माओवादी जंगल में होने वाले तेंदू पत्ते पर उगाही वसूलते हैं और साथ ही खनिज पैदा करने वाले इलाकों से भी इनकी अच्छी खासी कमाई है. इसके अलावा विकास के कार्यों में भी माओवादियों का भी हिस्सा होता है.

पहले तो बड़ी कंपनियों, व्यवसाइयों और ठेकेदारों पर आरोप लगते रहे हैं कि वह माओवादियों को पैसे पहुंचाते हैं लेकिन अब सरकारी अधिकारियों के भी पैसे देने का मामला सामने आ रहा है.

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