टीआरपी पर उठे सवाल

रिमोट कंट्रोल
Image caption टीआरपी समिति ने टीआरपी मापने की प्रक्रिया पर कई सवाल उठाए हैं.

टेलीविज़न कार्यक्रमों की लोकप्रियता जानने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली तकनकी टीआरपी यानि 'टेलीविज़न रेटिंग प्वाइंट्स'को फ़िक्की के महानिदेशक अमित मित्रा की अध्यक्षता वाली एक समिति ने 'अपूर्ण' क़रार दिया है.

भारत के सूचना एंव प्रसारण मंत्रालय ने इस समिति का गठन टीआरपी एकत्रित करने के लिए सैंपल साइज़ के छोटे होने और ग्रामीण क्षेत्रों को इससे बाहर रखे जाने की चिंताओं के बीच किया गया था.

ग़ौरतलब है कि फ़िलहाल कार्यक्रमों की लोकप्रियता जानने के लिए 8000 का सैंपल एकत्रित किया जाता है. समिति ने इसे पहले दो सालों में 15 हज़ार करने और फिर तीसरे साल से 30 हज़ार तक बढ़ाने का सुझाव दिया है.

समिति के अनुसार बढ़े हुए सैंपल साइज़ में शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के अलावा पूर्वोत्तर भारत और भारत प्रशासित जम्मू और कश्मीर को भी शामिल किया जाना चाहिए.

भारत में 'टैम मीडिया रिसर्च' और 'एमैप' नाम की दो कंपनियां ही टीआरपी मापने का काम करती हैं.और ये दोनों ही एजेंसिया ग्रामीण भारत से आंकड़े एकत्रित नहीं करती हैं.

सैंपल साइज़ में बढ़ोतरी के अलावा समिति ने टीआरपी इकट्ठा करने के तरीके को सही आंकड़े हासिल करने के लिए और अधिक वैज्ञानिक बनाने का भी सुझाव दिया है.

रिपोर्ट में कहा गया है, "सरकार और उद्योग दोनों ही मानते हैं कि टीआरपी मापने के तरीके में कुछ गंभीर समस्याएं हैं.इन तरीकों में पारदर्शिता और भरोसे की कमी है. टीआरपी के आंकड़ों का इस्तेमाल करने वाला ब्रॉडकास्ट उद्योग भी इस प्रणाली को अपारदर्शी मानता है."

फ़िक्की के महानिदेशक अमित मित्रा की अध्यक्षता वाली इस समिति में वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधुरी, भारतीय प्रबंध संस्थान अहमदाबाद के निदेशक प्रोफ़ेसर एसके बरुआ और कोलकाता स्थित भारतीय सांख्यिकी संस्थान के प्रोफ़ेसर आशिष सेन गुप्ता समेत आठ विशेषज्ञ शामिल थे.