'असर' या बेअसर

  • 17 जनवरी 2011
भारत में स्कूलों की हालत ख़स्ता
Image caption इस सर्वे ने भारत में शिक्षा के नाम पर की जा रही ख़ाना पूर्ती की कलई खोल दी है.

अब आपने इन पंक्तियों को पढ़ने कि ज़हमत उठाई है तो एक तकलीफ़ और कीजिये. अपने घर पर पास-पड़ोस से दूसरी से पांचवी कक्षा में पढ़ने वाले बच्चों को बुलाइए. उनसे कहिए कि वे निम्नलिखित पैरा को पढ़ कर सुनाएँ. यह पैरा दूसरी कक्षा की पाठ्यपुस्तक से लिया गया है.

"मैं और मेरी बहन रीता छत पर खेल रहे थे. अचानक आसमान में बादल गरजने लगे. बिजली कड़कने लगी. बारिश की बड़ी-बड़ी बूंदे पड़ने लगीं. मैं और रीता भाग कर जल्दी से नीचे आ गए. तभी भैय्या गरम-गरम पकौड़े और समोसे ले आए. हम सबने नीचे बैठकर समोसे और पकौड़े खाए और बारिश का मज़ा लिया."

अगर कोई दूसरी कक्षा में पढ़ने वाला बच्चा इस पैरा को सहजता से पढ़ ले तो उसे ज़रूर कुछ इनाम दीजिएगा.

ग्रामीण स्कूलों का हाल

ग्रामीण भारत के दूसरी कक्षा में पढ़ने वाले दस बच्चों में से एक ही बच्चा अपनी ही भाषा की अपनी ही पाठ्यपुस्तक का यह पैरा पढ़ पाता है. उस कक्षा के 45 फीसदी बच्चे तो "आलू" और "मौसी" जैसे शब्द भी नहीं पढ़ पाते हैं.

तीसरी में पढ़ने वाले पांच बच्चों में से सिर्फ एक इस पैरा को पढ़ सकता है. हाल ये है कि अगर पांचवी के विद्यार्थियों से दूसरी कक्षा का यह पैरा पढ़ने को कहा जाए तो उनमे से आधे (सही-सही कहें तो 47 फ़ीसदी) इस साधारण से पैरा को पढ़ नहीं पाएंगे. यहाँ तक कि गावों में सातवीं में पढ़ने वाले एक-चौथाई बच्चे भी इस इम्तिहान में बग़लें झांकेंगे.

अभी बच्चों को अपने साथ बनाए रखिए. अब उन्हें दहाई वाली किसी संख्या से एक और दहाई वाली संख्या घटाने को कहिये जिसमे उन्हें हासिल लेना पड़े. मसलन 48 में से 29 घटाने को कहिए, या फिर 75 में से 37.

तीसरी कक्षा में पढ़ने वाले दो-तिहाई बच्चे और पांचवी के कोई एक तिहाई छात्र-छात्राएं इतना साधारण गणित भी नहीं सीख पाए हैं. औपचारिक गणित को छोड़ भी दें और बाज़ार में ख़रीद-फ़रोख्त के लिए न्यूनतम जमा-घटाव की बात करें तो भी पांचवी के आधे बच्चे इस मामले में गोल हैं.

गुणा-भाग तो ऊँची बात है. गावों में रहने वाले सातवीं कक्षा के क़रीबन आधे विद्यार्थी 919 जैसी तीन अंकों के संख्या को 6 से भाग नहीं दे सकते.

अब आप बच्चों की छुट्टी कर सकते हैं और हमारे देश में शिक्षा की इस कड़वी हक़ीक़त से रु-बरू हो सकते हैं. आपने अपने घर या पास-पड़ोस के बच्चों के साथ जो प्रयोग किया यह प्रथम नामक एक गैर सरकारी संगठन द्वारा देश भर के ग्रामीण बच्चों के एक विशाल सर्वे पर आधारित है.

यह सर्वे देश के सभी राज्यों और लगभग सभी जिलों में किया गया. शिक्षा की गुणवत्ता की जाँच करने के लिए बच्चों से स्कूल में नहीं घर पर मुलाक़ात की गई. कुल तेरह हज़ार से ज्यादा गावों में आठवीं तक के बच्चों से उनके घर में जाकर ये सवाल पूछे गए. सवाल हर प्रदेश और भाषा के हिसाब से ढाले गए. भाषा का पैरा उस राज्य की पाठ्यपुस्तक से लिया गया था.

सरकार की बेरुख़ी

यह सर्वेक्षण कोई पहली बार नहीं हो रहा था. पिछले पांच साल से यह संगठन "असर" यानी एनुअल स्टेटस ऑफ़ एडुकेशन रिपोर्ट नामक इस सर्वेक्षण को कर रहा है और शिक्षा की इस शोचनीय तस्वीर को देश के सामने रख रहा है.

इस बार उप-राष्ट्रपति रपट का विमोचन करने जरूर आए, लेकिन भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने इस रपट का संज्ञान लिया हो ऐसा दिखाई नहीं पड़ा.

विडम्बना यह है कि शिक्षा को अपनी प्राथमिकता बताने वाली यह सरकार खुद ऐसा कोई सर्वे नहीं करवाती. सरकारी आंकडे यह बताते हैं कि किस विभाग ने कितना खर्च किया, कितनी योजनाए बनी, कितने अध्यापक नियुक्त हुए, कितनी इमारतें उठीं, कितने कमरे बढे. यह भी बताते हैं कि स्कूल के रजिस्टर में कितने नाम चढ़े. बस यह नहीं बताते कि कितने बच्चे सचमुच पढ़े और क्या कुछ सीखे.

इस लिहाज से "असर" शिक्षा व्यवस्था को एक आइना दिखाता है. इस आईने में दिखने वाली तस्वीर बेहद ख़ैफ़नाक है. 21वीं सदी के इस पहले दशक में शिक्षा का सार्वजनिक ढांचा चरमरा रहा है. शहरों में तो सरकारी स्कूल पहले ही उजड़ चुके हैं, अब गावों की बारी आ गई लगती हैं. सरकारी स्कूलों की संख्या बढ़ रही है, उनमे दाखिला लेने वाले बच्चों का अनुपात घट रहा है.

पिछले पांच साल में प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले ग्रामीण बच्चे 16 फीसद से बढ़कर 24 फीसद हो गए हैं. इस छोटे से आंकडे के पीछे एक बहुत बड़ी त्रासदी छुपी है. मतलब यह है कि गाँव में जो कोई थोड़ा-बहुत भी सामर्थ्य रखता है वो परिवार अपने बच्चों को सरकारी स्कूल कि बजाय प्राइवेट स्कूल में भेज रहा है.

फाइलों का पेट भरने के लिए सरकारी स्कूलों में फ़र्जी नाम लिखे जा रहे हैं, लेकिन बच्चे दरअसल किसी और स्कूल में पढ़ रहे हैं.

Image caption सरकारी स्कूल लगभग ख़त्म होते जा रहे हैं. कुछ राज्यों में हालात काफी गंभीर है.

सरकारी स्कूलों के उजाड़ीकरण कि यह प्रक्रिया कुछ राज्यों में बहुत गंभीर हो चुकी है. केरल में 54 फीसद, हरियाणा में 42 फीसद, उत्तर प्रदेश के 39 फीसद, पंजाब के 38 फीसद और आंध्र प्रदेश के 36 फीसद ग्रामीण बच्चे (उम्र 6 से 14 बरस) अब प्राइवेट स्कूलों में हैं.

कम्युनिस्ट राज वाले बंगाल और त्रिपुरा में यह संख्या अब भी नाम-मात्र की है. लेकिन वहां पिछले दरवाजे से प्राइवेट शिक्षा आ रही है. इन दोनों राज्यों में गावों में तीन-चौथाई बच्चे प्राइवेट ट्यूशन का सहारा लेते हैं. देश भर में सरकारी स्कूल अब गाँव के दीन-हीन का ही आसरा बचे हैं. स्कूलों में दाखिला लेने वाले बच्चों की संख्या और अनुपात बेशक बढ़ रहा है, लेकिन उन्हें शिक्षा कैसे और कैसी मिलेगी उसका भगवान ही मालिक है.

एक और शिक्षा के अधिकार का डंका बज रहा है, दूसरी तरफ सरकार शिक्षा व्यवस्था के हाशिये पर जा रही है. ऐसा नहीं कि प्राइवेट शिक्षा से बच्चों का बहुत भला हो रहा है. फीस की बात छोड़ दीजिये, देहात के अधिकांश प्राइवेट स्कूलों के पास न तो खेलने की जगह है, न ठीक इमारत न ही पढ़े लिखे अध्यापक. कहने को इंग्लिश मीडियम लेकिन न विद्यार्थी अंग्रेजी जानता है न ही अध्यापक.

इस सर्वे के मुताबिक़ प्राइवेट स्कूलों के बच्चों का भाषा और गणित ज्ञान सरकारी स्कूलों के बच्चों से थोड़ा सा ही बेहतर है. और वो भी शायद इसलिए क्योंकि प्राइवेट स्कूलों में गाँव के अपेक्षाकृत शिक्षित और समर्थ परिवारों के बच्चे पढ़ते हैं.

सरकारी स्कूलों का 'सच'

इस बार "असर" सर्वे ने सरकारी स्कूलों के भीतर भी झांकने कि कोशिश की है. शिक्षा के अधिकार क़ानून के तहत "स्कूल" कहलाने के लिए हर तीस विद्यार्थियों पर एक अध्यापक होना चाहिए, हर कक्षा के लिए एक कमरा होना जरूरी है और साथ में खेल का मैदान, दोपहर खाने के लिए रसोई और एक पुस्तकालय.

इस कसौटी से जांचेगें तो खुद सरकारी स्कूलों में आधे से कम स्कूल यह सुविधाएँ मुहैया कराते हैं. 45 फीसद स्कूलों में विध्यार्धी-अध्यापक अनुपात जरूरत से ज्यादा है, 38 फ़ीसदी में खेल का मैदान नहीं है, 62 फ़ीसदी में या तो पुस्तकालय नहीं है या बच्चे उसका इस्तेमाल नहीं कर सकते. आधे से ज्यादा सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में एक से ज्यादा कक्षाओं के बच्चे एक साथ बैठते हैं.

एक अन्य अध्ययन के मुताबिक़ औसतन 20 फीसदी अध्यापक बिना छुट्टी या अर्जी के ग़ैरहाज़िर रहते हैं.

अब जब आप इस लेख के अंत तक पहुँच गए हैं तो एक ज़हमत और कीजिए. अपने मन के दरवाज़े पर दस्तक दीजिए और पूछिए कि इस ख़ौफ़नाक हालत में आपका क्या फ़र्ज़ बनता है. केंद्र और राज्य कि सरकार पर आपका-हमारा बस नहीं है, लेकिन क्या हम अपने गाँव-मोहल्ले के स्कूल में भी कुछ नहीं कर सकते? अगर आप यह लेख पढ़ सकते हैं तो आप निश्चित ही अपने पास-पडौस के उन बच्चों के शैक्षणिक अभिभावक बन सकते हैं जिनके माँ-बाप उन्हें मिलने वाली शिक्षा की जांच नहीं कर सकते. स्कूल के पुस्तकालय में बच्चों के साथ बैठकर कहानियां पढ़ सकते हैं. और कुछ नहीं तो इस सर्वे कि तरह बच्चों की शिक्षा कि गुणवत्ता की जांच कर सकते हैं, शोर मचा सकते हैं.

"असर" का सरकार पर असर हो या नहीं, आपके मन पर कुछ असर हुआ?

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