परेश बरुआ पर उल्फ़ा का दबाव

उल्फ़ा
Image caption परेश बरुआ समर्थक कड़ा रुख़ अपनाए हुए हैं

असम के अलगाववादी संगठन यूनाइटेड लिबरेशन फ़्रंट ऑफ़ असम (उल्फ़ा) के नेता मृणाल हज़ारिका ने कहा है कि संगठन के सैन्य प्रमुख परेश बरुआ को सरकार के साथ बातचीत के फ़ैसले को स्वीकार करना ही होगा.

हज़ारिका ने कहा कि अगर परेश बरुआ ने संगठन में बहुमत से लिए गए फ़ैसले का विरोध किया, तो यह असंवैधानिक होगा.

हालाँकि उन्होंने परेश बरुआ के बातचीत की प्रक्रिया के ख़िलाफ़ होने की ख़बरों को अर्धसत्य बताया.

मृणाल हज़ारिका का कहना था कि सरकार के साथ बातचीत के लिए फ़िलहाल परेश बरुआ के आगे आने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि जब कोई समाधान निकल कर आएगा, तो वे ख़ुद संगठन के साथ खड़े दिखाई देंगे. भारतीय अधिकारियों का दावा है कि भारत सरकार के साथ शांति प्रक्रिया में शामिल होने को लेकर संगठन बँटा हुआ है.

जहाँ एक तरफ उल्फ़ा के चेयरमैन अरविंद राजखोवा ने भारत सरकार से बातचीत के लिए आगे क़दम बढ़ाया है, वहीं परेश बरुआ भारत के साथ बातचीत का विरोध करते रहे हैं. उनका कहना है कि जब तक एजेंडे में असम की संप्रभुता का मुद्दा नहीं होता, भारत के साथ बातचीत नहीं हो सकती.

'हथियार नहीं डालेंगे'

उल्फ़ा नेता मृणाल हज़ारिका का कहना था कि चेयरमैन राजखोवा ने बिना शर्त सरकार के साथ बातचीत की बात कही है और वे शांतिवार्ता शुरू करने के ऐवज़ में अपने हथियार नहीं डालेंगे.

ग़ौरतलब है कि जेल से रिहा किए जाने के बाद उल्फा के अध्यक्ष अरविंद राजखोवा ने कहा था कि असम की समस्या के समाधान के लिए वे हिंसा का रास्ता छोड़ने को तैयार हैं. उल्फ़ा 30 साल से भारत से अलग होने की मांग को लेकर भारत सरकार से लड़ रहा है.

उसका आरोप है कि भारत सरकार असम की प्राकृतिक संपदा का दोहन कर रही है और वहाँ की जनता के उत्थान के लिए कुछ नहीं कर रही है.

शर्त

उल्फ़ा की शर्त रही है कि वे बातचीत में तभी शामिल होंगे जब भारत सरकार असम की संप्रभुता पर बातचीत के लिए तैयार होगी. लेकिन भारत सरकार इस मांग को ठुकरा चुकी है.

Image caption कई उल्फ़ा नेता बांग्लादेश और भूटान में पकड़े गए हैं

मृणाल हज़ारिका का कहना था कि उनकी ये मांग अब भी बरक़रार है, लेकिन बातचीत के दौरान उल्फ़ा और भारत सरकार के बीच मोलभाव की संभावना है.

साथ ही उनकी मांग है कि बांग्लादेश से हो रहे घुसपैठ का मुद्दा भी बातचीत में संबोधित किया जाए और 1985 में लाए गए असम समझौते के तहत भारत और बांग्लादेश की सीमा को सील किया जाए. जब मृणाल हज़ारिका से पूछा गया कि शांतिवार्ता का मुद्दा असम विधानसभा चुनाव के दौरान ही क्यों उठता है, तो उनका कहना था कि राज्य सरकार को इस मुद्दे का इस्तेमाल अपने राजनीतिक लाभ के लिए नहीं करना चाहिए. गोगोई सरकार की मंशा पर शंका जताते हुए उन्होंने कहा कि बेहतर होगा अगर वे एक नेक इरादे से इस मुद्दे को संबोधित करें.

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