सवा लाख भूमिहीनों को ज़मीन मिली

Image caption संस्था के अनुसार ज़मीन के ये छोटे टुकड़े कई गरीबों के लिए एक नई ज़िंदगी की बुनियाद बनेंगे.

सरकारी एजेंसियों के साथ मिलकर काम करनेवाली एक अमरीकी संस्था ने कहा है कि पिछले साल सवा लाख भूमिहीन भारतीय परिवार क़ानूनी रूप से ज़मीन के मालिक बन गए.

सियाटल में स्थित ग़ैर-सरकारी संस्था लैंडेसा ग्राम विकास के क्षेत्र में काम करती है.

बुधवार को साल 2010 की अपनी रिपोर्ट जारी करते हुए संस्था ने कहा है कि खेतीबाड़ी से जुड़े चीन के 23 लाख परिवार और भारत के 125,000 ग़रीब और भूमिहीन परिवार अब क़ानूनी रूप से ज़मीन के मालिक बन गए हैं.

संस्था का कहना है कि वो भारत में राज्य और केंद्र सरकार के साथ साझेदारी में भूमिहीन और बेहद ग़रीब किसानों को ज़मीन मुहैया कराने के लिए कार्यक्रम चलाते हैं.

संस्था के अध्यक्ष टिम हैंस्टेड का कहना था, “ज़मीन का ये मालिकान हक़ एक कागज़ के टुकड़े से कहीं ज़्यादा है. ये एक नई ज़िंदगी की बुनियाद है, ये लोग अब अपने बच्चों को स्कूल भेज सकते हैं, अपने बच्चों को संतुलित आहार देने के लिए अपनी ज़मीन पर फसल उगा सकते हैं और सरकारी कार्यक्रमों का फ़ायदा उठा सकते हैं.”

संस्था के अनुसार भारत में डेढ़ करोड़ ऐसे परिवार हैं जो बेहद ग़रीब हैं और जिनके पास ज़मीन का एक टुकड़ा भी नहीं है.

संस्था का कहना है इनमें से ज़्यादातर लोग दूसरों के खेतों में मजदूरी करते हैं और अपनी ज़िंदगी संवारने की उनके पास कोई उम्मीद नहीं होती.

अपनी रिपोर्ट में उन्होंने कहा है, “टेनिस कोर्ट जितनी बड़ी ये ज़मीन इन परिवारों को रहने की जगह के अलावा सब्ज़ियां उगाने की जगह देती है जिससे वो अपनी आमदनी बढ़ा पाते हैं.”

मीडिया के लिए जारी बयान में संस्था ने कहा है कि कर्नाटक के 65,000 परिवार, आंध्रप्रदेश के 52,000, उड़ीसा के 4,000 और पश्चिम बंगाल के 3,000 परिवारों को इससे फ़ायदा हुआ है.

बयान के अनुसार कुछ राज्यों में तो लोगों को ज़मीन का क़ानूनी हक़ देने का खर्च सिर्फ़ तीन डॉलर यानि लगभग 150 रूपए है.

भारत और चीन के अलावा लैंडेसा संस्था अब युगांडा, लाइबेरिया और रवांडा में भी कार्यक्रम चला रही है.

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