भारत-बर्मा-चीन सड़क खोलने की माँग

  • 21 जनवरी 2011
Image caption असम में सड़क को खुलवाने की माँग तेज़ हो रही है

सीमा विवाद की आशंकाओं को दरकिनार करके भारत, चीन और बर्मा के बीच ऐतिहासिक स्टिलवेल रोड को दोबारा खोलने के प्रयासों का व्यापाक स्वागत होता दिख रहा है.

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान 1726 किलोमीटर लंबी सड़क च्यांग काई शेक की कुओमिंताग पार्टी को मदद पहुँचाने के लिए तैयार की गई थी.

समय के साथ जंगलों ने इस सड़क को निगल लिया है, भारतीय और बर्मी विद्रोहियों की मौजूदगी की वजह से भी इसे असुरक्षित माना जाता है.

इस सड़क का सिर्फ़ 61 किलोमीटर हिस्सा भारत में है जबकि बाक़ी हिस्सा 1033 किलोमीटर बर्मा में और 632 किलोमीटर चीन में है.

अगर यह सड़क खुल जाती है तो यह भारत के असम राज्य को बर्मा के काचिन प्रांत से होते हुए चीन के पश्चिमी युन्नान प्रांत से जोड़ देगी.

बर्मा की नई सरकार ने चीनी कंपनी युन्नान कन्स्ट्रक्शन इंजीनियरिंग ग्रुप को 312 किलोमीटर सड़क को दुरुस्त करने का ठेका दिया है.

पूरी सड़क का यही हिस्सा सबसे बुरी हालत में है जबकि बर्मा के मिटिकिना से लेकर चीनी सीमा तक सड़क इस्तेमाल के लायक़ हालत में है.

भारत से बर्मा को जोड़ने वाला हिस्सा भी इस्तेमाल लायक स्थिति में है.

1944 में बनी सड़क का नाम अमरीकी सैनिक जनरल जोसेफ़ स्टिलवेल के नाम पर रखा गया था, जापान के ख़िलाफ़ मित्र राष्ट्रों की लड़ाई में इस सड़क की भूमिका काफ़ी अहम रही थी.

जानकारों का कहना है कि इस सड़क के दोबारा इस्तेमाल में आने से भारत और चीन के बीच माल ढुलाई के ख़र्चे में तीस प्रतिशत की कमी आ सकती है.

इंडियन चैंबर ऑफ़ कॉमर्स के पूर्व महासचिव और पूर्वोत्तर भारत में व्यापार के जानकार नज़ीब आरिफ़ कहते हैं, "स्टिलवेल रोड खुलने से पूर्वोत्तर भारत और उत्तरी बर्मा की क़िस्मत सँवर सकती है. अलगाववाद और हिंसा की चपेट में घिरे इस इलाक़े को एक व्यापारिक केंद्र के रूप में विकसित किया जा सकता है."

असम के उद्योग मंत्री प्रद्युत बोर्दोलोई भी आरिफ़ की बात से सहमत हैं, "अगर स्टिलवेल रोड ठीक से खुल जाता है तो इससे न सिर्फ़ व्यापारिक अवसर पैदा होंगे बल्कि हमारे क्षेत्र में निर्माण उद्योग को भी बढ़ावा मिलेगा, इस सड़क के खुलने पर ही भारत की 'लुक इस्ट' नीति सही मायनों में कारगर होगी."

चीन को लेकर चिंताएँ

दूसरी ओर भारत में ऐसे लोग भी हैं जो इस सड़क के खुलने पर चीनी माल की भारत में डंपिंग को लेकर चिंतित हैं.

Image caption सड़क को लेकर स्थानीय लोग काफ़ी आशान्वित हैं

दिल्ली में बैठे नीति नियंता भी इस बात से ख़ुश नहीं हैं कि सड़क निर्माण का ठेका एक चीनी कंपनी को मिला है लेकिन ज्यादातर लोग ये भी मानते हैं कि भारत-चीन संबंधों में सकारात्मक पक्ष व्यापार ही है और उसे बढ़ाया जाना चाहिए.

भारतीय विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव गौतम बंबावाले (पूर्वी एशिया) ने पिछले दिनों कोलकाता में कहा, "हमारा द्विपक्षीय व्यापार चीन के साथ बढ़ रहा है और तमाम तरह के तनावों के बावजूद बढ़ता ही रहेगा."

कोलकाता में चीनी वाणिज्य दूत ज़ांग लिज़होंग ने कहा कि सभी तनावों को दूर करने के लिए बेहतर संपर्क और अधिक व्यापार ही कारगर तरीक़ा है.

इसी सप्ताह कोलकाता में पदभार ग्रहण करने के बाद लिज़होंग ने कहा, "हमारा द्विपक्षीय व्यापार तेज़ी से बढ़ रहा है, अधिक से अधिक भारतीय और चीनी एक दूसरे से मिलेंगे जिससे तनाव कम होगा."

उन गाँवों में काफ़ी उत्साह है जो स्टिलवेल रोड के भारतीय हिस्से के किनारे बसे हैं, असम छात्र संगठन के नेतृत्व में इस सड़क को कंटनेर परिवहन के लिए खोलने की माँग शुरू हो गई है.

वहीं रहने वाले बिचित्रा बरगुहाँई कहते हैं, "अगर भारत चीन के साथ व्यापार के लिए बर्फ़ से ढँके नाथू ला दर्रे को खोल सकता है तो स्टिलवेल रोड को क्यों नहीं."

इस सवाल का जवाब दिल्ली में भारत के नेताओं को जल्दी ही देना होगा.

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