किसानों की आत्महत्या पर विवाद

  • 22 जनवरी 2011
Image caption आंध्र प्रदेश में किसानों के ऊपर भारी कर्ज़ है

राष्ट्रीय अपराध रिपोर्ट ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2009 में देश भर में सवा लाख से अधिक लोगों ने आत्माहत्या की जिनमें 17 हज़ार से अधिक किसान थे.

ब्यूरो ने कहा है कि सबसे ज्यादा किसानों ने महाराष्ट्र में आत्माहत्या की और आंध्र प्रदेश दूसरे नंबर पर रहा.

2009 में महाराष्ट्र में 2872 जबकि आंध्र प्रदेश में 2474 किसानों ने खुदकुशी की. लेकिन आंध्र प्रदेश में आंकड़ों को लेकर विवाद उठा खड़ा हुआ है क्योंकि राज्य पुलिस के महानिदेशक के अरविंद राव ने कहा है कि उनके विभाग के पास किसानों की आत्माहत्या के कोई अलग आंकड़े नहीं हैं. उन्होंने कहा कि किसानों की आत्माहत्या के कोई अलग आंकड़े या कारणों का रिकॉर्ड नहीं रखा जाता. उन्होंने कहा कि आंध्र प्रदेश में हर वर्ष लगभग 13 हज़ार लोग आत्माहत्या करते हैं लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि इनमें कितने किसान हैं.

उन्होंने कहा कि "पुलिस किसानों की आत्माहत्याओं पर कोई सर्वेक्षण नहीं करती बल्कि यह सामाजिक विशेषज्ञों और दूसरे लोगों का काम है कि वे उसके कारणों का पता लगाएँ कि लोग इतनी बड़ी संख्या में आत्माहत्या क्यों कर रहे हैं". अरविंद राव ने कहा कि राज्य की पुलिस ने राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो को किसानों की आत्महत्याओं के आंकड़े नहीं दिए थे इस लिए वो इस रिपोर्ट पर कोई टिपण्णी नहीं कर सकते. उन्होंने कहा कि हो सकता है कि ब्यूरो को यह आंकड़े किसी और स्रोत से मिले हों.

वर्षों पुरानी समस्या

राज्य में इस समस्या ने पहली बार 1996 में सर उठाया था जबकि मूंगफली जैसी वाणिज्यिक फसलों के नष्ट हो जाने के बाद सैकड़ों किसानों ने आत्मा हत्या कर ली थी, जानकारों का कहना है कि तब से किसी न किसी रूप में यह सिलसिला चल रहा है.

किसानों की एक बड़े संगठन आंध्र प्रदेश रैयत संगम के अध्यक्ष रामकृष्णा के अनुसार पिछले चार महीनों में ही चार सौ किसानों ने आत्माहत्या की है. यह उन 30 लाख किसानों में शामिल हैं जिनकी फसल समुद्री तूफ़ान में नष्ट हो गई थी. रामकृष्ण ने कहा कि मरने वालों में अधिकतर वे किसान हैं जो दूसरों की ज़मीन किराए पर लेकर खेती करते हैं जिन्हें बँटाईदार किसान कहते हैं. "बँटाईदार किसान ज्यादा आत्माहत्याएं करते हैं क्योंकि अगर फसल नष्ट हो जाती है तो उनके पास कुछ भी नहीं रह जाता और सरकार भी उन्हें मुआवज़ा नहीं देती". बँटाईदार किसानों की ख़राब हालत को देखते हुए अब तमाम किसान संगठनों ने सरकार से मुआवज़े की नीति बदलने की मांग की है और कहा है कि बँटाईदार किसानों को भी मुआवज़ा दिया जाए. राज्य के राजस्व मंत्री रघुवीरा रेड्डी ने कहा है की सरकार इसके लिए कानून में संशोधन करेगी और विधानसभा के आगामी सत्र में एक विधायक लाया जाएगा. जहाँ तक किसानों की आत्महत्याओं के कारणों का सवाल है, उसमें सब से ऊपर ऋण का बोझ है. ऐसे किसान ज्यादा आत्माहत्या करते हैं जो बैंकों से ऋण न मिलने पर महाजनों से बहुत ऊंची ब्याज दरों पर ऋण लेते हैं और उसे चुका नहीं पाते.

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