गठबंधन की मुश्किलें:कहाँ हुई गड़बड़?

  • 22 जनवरी 2011
मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी

ज़्यादा वक़्त नहीं हुआ जब लगता था कि भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन कुछ भी ग़लत नहीं कर सकते.

अरसे से एक अंसदिग्ध ईमानदारी के व्यक्ति समझे जाने वाले मनमोहन सिंह वर्ष 2009 में दुनिया के दूसरी सबसे अधिक आबादी वाले देश के दूसरी बार प्रधानमंत्री बने.

वर्ष 2004 में लोकसभा चुनावों 145 सीटें जीतने वाली उनकी कांग्रेस पार्टी ने मई 2009 में हुए आम चुनावों में अपनी संख्या 206 तक बढ़ा ली.

मौजूदा भारतीय चुनावी राजनीति के स्तर के हिसाब से ये एक प्रभावशाली प्रदर्शन था.

विभाजित विपक्ष के सामने कांग्रेस के नेतृत्व वाला 'संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन' मज़बूत दिख रहा था.

मनमोहन सिंह और कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गांधी के बीच एक अडिग समझ ने देश में राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित की हुई थी. दोनों के बीच नियमित बैठकों से लगता था कि पार्टी और सरकार की ज़िम्मेदारी साफ़ सुथरा विभाजन है.

और अब

Image caption अदालती मुक़दमें सरकार के लिए सरदर्द बने हुए हैं.

पिछले कुछ महीनों में दोनों के बीच व्यक्तिगत समीकरण तो शायद नहीं बदले हैं लेकिन कांग्रेस की अगुवाई वाले गठबंधन के लिए स्थितियां भयावह होती जा रही हैं.

महंगाई, भ्रष्टाचार, तेलंगाना के लिए चल रहे विरोध प्रदर्शन, भूमि आबंटन को लेकर पक्षपात, राज्य के नेताओं द्वारा विवेकाधीन अधिकारों का अनुचित इस्तेमाल, एक ही समय पर मनमोहन सिंह और उनकी सरकार के लिए सबकुछ गड़बड़ दिख रहा है.

इसके अलावा कई अदालती मुक़दमें सरकार के लिए सरदर्द बने हुए हैं.

2जी स्कैंडल के मुक़दमें की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारिक फ़ैसलों पर कुछ तल्ख़ टिप्पणियां की हैं. माना जाता है कि दूसरी पीढ़ी के मोबाइल फ़ोन स्पैक्ट्रम की बिक्री सरकार ने अरबों डॉलर का नुकसान उठाया है.

और बुधवार को विदेशों में जमा भारतीयों के कालेधन से संबंधित एक केस की सुनवाई के दौरान अदालत ने गठबंधन की इस विषय में और जानकारियाँ मुहैया करवाने में की जा रही आनाकानी की आलोचना की है.

न्यायामूर्ति बी सुदर्शन रेड्डी और एसएस निज्जर की अदालत ने कहा, "ये राष्ट्रीय संपत्ति का सीधे-सीधे चोरी है. हम यहां एक सर चकराने वाले अपराध की बात कर रहे हैं."

सरकार के लिए ऐसी टिप्पणियां किसी न किसी मुक़दमें में लगभग हर दिन आ रही हैं.

और अब तक सरकार कोई संतुष्ट करने वाले जवाब नहीं दे पाई है.

भटकी हुई सरकार

Image caption मनमोहन सिंह ने मंत्रिमंडल में एक व्यापक फेरबदल का वादा किया है.

मनमोहन सिंह ने बुधवार को 36 मंत्रियों के विभागों में फेरबदल किया तो उसे भारतीय मीडिया ने कमज़ोर कोशिश क़रार दिया. मनमोहन सिंह ने इसे 'छोटा फेरबदल' कहते हुए आने वाले महीनों एक 'बड़े फेरबदल' का वादा किया.

विश्लेषकों को कहना है कि इस फेरबदल सरकार की छवि में कोई सुधार नहीं होगा.

'द हिंदू' अख़बार की एसोसिएट संपादक नीना व्यास ने बीबीसी से कहा, "सबसे अहम सवाल ये है कि क्या सरकार विपक्ष के साथ चल रहे गतिरोध को तोड़ पाएगी जिसके कारण संसद के पिछले सत्र में कोई कार्यवाही नहीं चल पाई थी?"

नीना व्यास संसद के उस गतिरोध की बात कर रही थीं जिसमें आमतौर पर विभाजित रहने वाले विपक्ष ने एकजुट होकर 2जी मामले संयुक्त संसदीय समिति की मांग की है.

अपना नाम ना बताने की शर्त पर इस लेखक को कई अधिकारियों ने बताया कि सरकार को एक गतिहीनता के अहसास ने जकड़ रखा है.

एक अधिकारी ने बताया, "इस माहौल में जहां हर चीज़ पर सवाल उठाए जा रहे हैं, कोई भी निर्णय नहीं लेना चाहता. सरकार दिशाहीन सी लगती है."

मनमोहन सिंह की सरकार के एक जूनियर मंत्री मानते हैं कि ये दुखद सत्य है. इस मंत्री ने मुझे बताया कि प्रधानमंत्री विपक्ष के कुछ नेताओं द्वारा उन पर लगाए व्यक्तिगत आरोपों से बेहद आहत हैं.

आगे की चुनौतियां

Image caption बुधवार को हुए फेरबदल की मीडिया में आलोचना हुई है.

ये प्रश्न बना हुआ है कि बुधवार को कैबिनेट में हुए फेरबदल का सही में कुछ अर्थ है या नहीं.

सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद और सरकार के बीच नए खाद्य सुरक्षा बिल जैसे अहम मुद्दों पर मतभेद दिखते हैं.

सोनिया गांधी सार्वजनिक रूप से कह चुकी हैं कि भ्रष्टाचार को सहन नहीं किया जाएगा.

दिसंबर में कांग्रेस पार्टी के एक सम्मेलन में उन्होंने जनसेवकों के ख़िलाफ़ चल रहे भ्रष्टाचार के मुक़दमों को 'फ़ास्ट ट्रैक' अदालतों के हवाले करने का सुझाव दिया था.

साथ ही सोनिया गांधी ने सार्वजनिक ठेकों और सरकारी ख़रीद में पूर्ण पारदर्शिता लाने और राज्य के मुख्यमंत्रियों को मिलने वाले विवेकाधीन अधिकारों का पुनरीक्षण करने का भी सुझाव दिया था.

सोनिया के सुझाव

Image caption सोनिया गांधी ने कहा है कि भ्रष्टाचार सहन नहीं किया जाएगा.

उन्होंने प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के लिए एक खुले और प्रतिस्पर्धात्मक व्यवस्था की भी वकालत की थी.

विश्लेषक मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल के राजनीतिक संकट की तुलना 80 के दशक में एक बड़े बहुमत के साथ सरकार चला रहे पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के संकट से कर रहे हैं.

आख़िरकार राजीव गांधी 1989 में हुए चुनावों में हार गए और सत्ता एक बहुंरगी गठबंधन के हाथ में आ गई थी.

हांलाकि दोनों परिस्थितियों में समानताएं हैं लेकिन मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी के पास अब भी इस जंग को जीतने के अवसर मौजूद हैं.

बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार खाद्य पदार्थों की बढ़ती महंगाई और मुद्रास्फीती की दर को रोक पाती है या नहीं.

मनमोहन सिंह और उनकी सरकार के पास अब भी वर्ष 2014 में होने वाले चुनावों से पहले तीन साल से अधिक का वक़्त है.

लेकिन प्रधानमंत्री, सोनिया गांधी और सरकार के सामने दोबारा सत्ता में लौटने की एक मुश्किल चुनौती है.

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