इंतज़ार है इंसाफ़ का

Image caption ओसामा अपनी मां बदरून्निसा के साथ.

मालेगाँव धमाके में गिरफ़्तार रईस अहमद की पत्नी बदरून्निसा को अपने शौहर की रिहाई में एक घंटे की देर भी बर्दाश्त नहीं है.

गुस्से में तमतमाती हुई वो कहती हैं, “हुक़ूमत अंधी हो चुकी है. सब मालूम होकर भी वो लोग आवाज़ नहीं उठाते. अगर हुक़ूमत ऐसा ही करेगी तो लोगों को लगेगा कि ये लोग इंसाफ़ नहीं करते. इंसाफ़ होना चाहिए.”

उनका कहना है कि मुसलमानों का पिछड़ापन ही उनकी परेशानियों के लिए ज़िम्मेदार है, “आजकल मुसलमान लोग बहुत पीछे है. हिंदू लोगों की बहुत जल्दी नौकरियाँ लग जाती हैं. मुसलमान पैसे और पढ़ाई दोनो में पीछे हैं. कितनी भी पढ़ाई कर लें, लेकिन इन्हें कुछ हासिल नहीं होता.”

रईस की गिरफ़्तारी का असर उनके बच्चों पर भी हुआ है. उनका बेटा ओसामा वकील बनना चाहता है ताकि “अब्बू की तरह जो मुसलमान सलाख़ों के पीछे हैं, उन्हें छुड़ा सकूं.”

पास ही के जाफ़रनगर इलाके में एक छोटे से मकान में नूरुलहुदा का परिवार पिछले 25 सालों से रह रहा है. रईस की तरह नूरूलहुदा भी 2006 मालेगाँव धमाके मामले में जेल में हैं.

इस इलाके में काफ़ी लोग पावरलूम के काम में लगे हुए हैं. दसवीं पास नूरुलहुदा अपने पिता शमसुद्दोहा की तरह पावरलूम में काम करते थे और पैसे की कमी की वजह से वो आगे नहीं पढ़ सके इसलिए इस्लाम पर किताबें पढ़कर अपना शौक़ पूरा करते थे.

24-साल के नूरूलहुदा की शादी को पाँच महीने ही हुए थे जब मालेगाँव धमाके के सिलसिले में पुलिस उन्हें पकड़कर ले गई.

नूरूलहुदा के भाई नूरूद्दीन कहते हैं, ‘यहाँ के स्थानीय क्राईम ब्रांच का अफ़सर ये कहकर मेरे भाई को बुलाकर ले गया कि साहब बुलाए हैं और थोड़ी देर में मैं खुद छोड़ जाउंगा. तब से वो आजतक घर पर नहीं आए. उसे वहीं गिरफ़्तार किया गया और एटीएस के हाथ में दे दिया गया. सिलसिला यूं ही चलता रहा, आखिर में उसे बम धमाके के मामले में शामिल कर लिया गया.’

नूरूलहुदा को गिरफ़्तार करके एटीएस के सुपुर्द कर दिया गया और कहा गया कि उनके संबंध प्रतिबंधित इस्लामी संस्था सिमी से हैं.

नूरूद्दीन बताते हैं, ‘हमारे चाचा सलमान फ़ारसी का पहले सिमी से ताल्लुक था. सिमी पर प्रतिबंध के वक्त नूरूलहुदा को गिरफ़्तार किया गया था. उससे पहले वर्ष 2001 में एक केस में गलत नाम की भूलचूक में उसे गिरफ़्तार किया गया था. पुलिस ने उस पर जैसे एक लेबल लगा दिया कि ये सिमी का सदस्य है जबकि ऐसा नहीं था. वो पुलिस स्टेशन में हाज़िरी के लिए बुलाते थे तो हाज़िरी देकर आते थे.’

नूरूद्दीन बताते हैं कि गिरफ़्तारी की वजह से उनकी और भाईयों की पढ़ाई पर असर हुआ.

Image caption नूरूद्दीन और उनके पिता शमसुद्दोहा पावरलूम का काम करते हैं.

वो कहते हैं, ‘हमारी आर्थिक स्थिति दिन प्रति दिन बिगड़ती चली गई. हालात ऐसे हो गए कि हमें दूसरों के आगे हाथ फ़ैलाना पड़ा. इस हादसे की वजह से मुझे अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी. मैं बीएससी कर रहा था. अभी बीए ज्वाइन किया है. दिन भर हमें काम करना पड़ता है. शाम को क्लास अटेंड करता हूँ.’

गिरफ़्तारी के बाद उनकी और बहनों की शादी में बहुत समस्या आ रही है क्योंकि परिवार से कोई रिश्ता नहीं जोड़ना चाहता है. माता-पिता को ब्लड प्रेशर की बीमारी हो गई है.

नूरूलहुदा की पत्नी समरीन गुमसुम रहती है. उनकी तबियत अच्छी नहीं रहती. वो किसी से बातचीत नहीं करतीं और उनका लगातार इलाज चल रहा है.

असीमानंद के कथित इकबालिया बयान के बाद मालेगाँव में लोगों से बात कर ऐसा लगा कि वो बहुत कुछ कहना चाहते हैं लेकिन खुद को एक स्तर के बाद जैसे रोक लेते हैं.

यहाँ के ज़्यादातर मुसलमान दशकों पहले लखनऊ और इलाहाबाद जैसी जगहों से आए थे.

वो कहते हैं कि वो ग़ौर से देख रहे हैं कि सिमी जैसे चरमपंथी संगठनों पर प्रतिबंध लगाने में देर नहीं करने वाली सरकार हिंदू चरमपंथियों के खिलाफ़ क्या कदम उठाती है और उनके शब्दों में बेक़सूरों को जेल से बाहर लाने के लिए कितने तेज़ी से काम करती है.

(ये इस श्रृंखला की समापन किश्त है.)

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