पश्मीना की नई पहचान

कश्मीर का पश्मीना शाल अब एक पहचान-पत्र के साथ बाज़ार में आ रहा है.

जम्मू कश्मीर सरकार ने इस शाल पर रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडेंटीफिकेशन टैग लगाने का निर्णय लिया है.

इस मकसद से श्रीनगर में एक प्रयोगशाला का निर्माण शुरू किया गया है जो आगामी दस महीनों में संपन्न हो जाएगा.

कश्मीर में पश्मीना उद्योग हज़ारों वर्ष पुराना है. ये शाल कई शताब्दियों से यूरोप और अन्य देशों को निर्यात किया जाता रहा है.

कहते हैं कि उन्नीसवी शताब्दी में नेपोलियन ने अपनी रानी को पश्मीना शाल तोहफ़े में दिया था जिसके बाद यह शाल फ्रांस में लोकप्रिय हो गया था.

लेकिन आजकल कश्मीर पश्मीना ख़तरे में पड़ गया है. कारण यह कि बाज़ार में नकली पश्मीने की भरमार हो गई है.

नकली पश्मीना कश्मीर के बाहर तैयार किया जा रहा है. लेकिन इस से पश्मीना उद्योग को इतना झटका लगा है कि कश्मीर के कुछ व्यापारी भी अब नकली पश्मीना बेचने पर विवश हो गए है.

श्रीनगर में स्थित क्राफ्ट डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट के निदेशक मोहम्मद शारिक फ़ारुक़ी कहते हैं कि ग्राहक को असल और नक़ल की पहचान ही नहीं है.

वे कहते हैं कि बाज़ार में भ्रम पैदा हो गया है जो कश्मीर के रिवायती पश्मीना उद्योग के लिए घातक सिद्ध हो रहा है.

राज्य सरकार ने दो एक वर्ष पूर्व कश्मीर पश्मीना के लिए पेटेंट और अब क्राफ्ट डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट इस शाल पर रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडेंटीफिकेशन टैग की तैयारियों में जुट गया है.

संस्थान के इल्यास वाली कहते हैं कि हमने इसके लिए नीयर फील्ड टेक्नोलॉजी (एनएफसी) को चुना है.

शाल पर चिप

वे कहते हैं कि शाल पर एक एनएफसी चिप लगेगा और ग्राहक 10 सेन्टीमीटर की दूरी पर अपना मोबाइल फ़ोन रखते ही शाल के बारे में सारी आवश्यक जानकारी प्राप्त कर लेगा.

Image caption पश्मीना उद्योग से सैकड़ों लोग जुड़े हुए हैं

इल्यासी वाली कहते हैं, "इस चिप में मौजूद संदेश को नकल नहीं किया जा सकता है".

वे कहते हैं कि टैग की भी नकल नहीं की जा सकती है, चूंकि हर चिप के साथ एक अलग नंबर होगा.

उल्लेखनीय है कि पश्मीना शाल में जो कच्चा माल इस्तेमाल किया जाता है वो कश्मीर से बाहर दुनिया के कई क्षेत्रों में पैदा होता है.

लेकिन श्रीनगर में पश्मीना उद्योग से जुड़े एक बड़े व्यापारी डॉक्टर अब्दुल मजीद मीर कहते हैं कि कश्मीर पश्मीना कच्चे माल का नहीं बल्कि उस सारी प्रक्रिया का नाम है जिससे यह शाल बनता है.

इस प्रक्रिया में पश्मीना कि सफ़ाई, कताई, बुनाई और फिर कढ़ाई भी शामिल है.

डॉ मीर कहते हैं, "कश्मीर के कुछ क्षेत्रों विशेषकर श्रीनगर के कुछ इलाकों में, हवा में नमी की मात्रा के कारण सबसे उम्दा स्पिन्निंग या कताई संभव होती है."

वे कहते हैं पश्मीना के लूम आम लूम की तरह नहीं होते बल्कि रिवायती लूम होते हैं जिन पर ऐसा मुलायम कपड़ा तैयार होता है जिसकी एक अलग पहचान होती है.

वे कहते हैं कि अंत में इस शाल पर ऐसे कारीगरों के हाथों से कढ़ाई की जाती है जिनका दुनिया में कोई जवाब नही. "इसी सारी प्रक्रिया का नाम कश्मीर पश्मीना है".

मीर कहते हैं कि जब कश्मीर पश्मीना पर एनएफसी चिप लग जाएगी तो इसकी मांग पहले ही वर्ष में 400 प्रतिशत बढ़ जाएगी.

उनका कहना है कि भारत के अन्दर और विदेशी मंडियों में पश्मीना के लिए काफ़ी बड़ा बाज़ार मौजूद है.

वो कहते हैं, "एक बार इस शाल पर एनएफसी चिप लग जाएगा तो ग्राहको में विश्वास पैदा होगा कि वे असली पश्मीना ही ख़रीद रहे हैं."

उल्लेखनीय है कि कश्मीर में पश्मीना उद्योग के साथ बहुत बड़ी संख्या में लोग जुड़े हैं जिनमें चरखा कातने वाली महिलाएँ, हैंडलूम पर काम करने वाले कारीगर और सूई से काम करने वाले दस्तकार भी शामिल हैं.

क्राफ्ट डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट कश्मीर पश्मीना को प्रोत्साहन देने के लिए अन्य कई उपाय कर रहा है.

इनमें ये विशेष उपाय भी शामिल है कि पश्मीना उद्योग में विशेषज्ञों को शामिल किया जाए जो बाज़ार की मांग के लिए रणनीति तैयार करे.

इंस्टीट्यूट के निदेशक शारिक़ फ़ारूक़ी कहते हैं कि इस समय कश्मीर पश्मीना उद्योग में एक तरफ़ कारीगर हैं और दूसरी तरफ उद्योगपति जबकि पेशवेर लोग नदारद हैं.

वे कहते हैं कि इंस्टीट्यूट ने पेशवर लोगों को तैयार करने के लिए दो वर्ष का मैनेजमेंट कोर्स शुरू किया है जो शाल उद्योग को एक नई दिशा देगा.

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