भारत रत्न पंडित भीमसेन जोशी का निधन

पंडित भीमसेन जोशी
Image caption 2008 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से उन्हें सम्मानित किया.

अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शास्त्रीय गायक पंडित भीमसेन जोशी का सोमवार सुबह पुणे में निधन हो गया.

हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायन के क्षेत्र में एक किंवदंति बन चुके पंडित जोशी 89 वर्ष के थे.

वो पिछले कुछ दिनों से हैजे़ से पीड़ित थे और जीवन-रक्षक प्रणाली पर थे.

पंडित भीमसेन जोशी से बीबीसी की बातचीत

बढ़ती उम्र के चलते हैज़े से लड़ते-लड़ते उनके गुर्दे और फेफड़ों ने काम करना बंद कर दिया था. इसके बाद तुरंत ही डॉक्टरों ने उन्हें वेंटीलेटर पर रख दिया था.

हालांकि काफ़ी कोशिशों के बाद भी उनकी स्थिति में सुधार नहीं हो रहा था और सोमवार सुबह उनका निधन हो गया.

किराना घराने से संबंध रखने वाले पंडित जोशी ख़्याल और भजन गायन के लिए जाने जाते थे.

संगीत में उनके योगदान के लिए 2008 में उन्हें भारत रत्न से नवाज़ा गया था.

बंगाल में हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायन से जुड़े गायक उस्ताद दिलशाद ख़ान ने उनकी मृत्यु पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए कहा कि उनके जाने से एक ऐसी जगह ख़ाली हो गई है जो कभी भर नहीं सकती.

उन्होंने कहा, "जैसे एक कहावत है कि एक चांद होता है और एक सूरज, तो पंडित जोशी के साथ भी कुछ ऐसा ही है. उनकी गायकी ने किराना घराने को नई बुलंदियों तक पहुंचाया. पंडित जी हमारे बीच अमर रहेंगे".

बचपन

उनका जन्म चार फ़रवरी 1922 को कर्नाटक के गडक शहर के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था. उनके पिता गुरुराज जोशी एक स्कूल शिक्षक थे. उनके गुरु सवाई गंधर्व अब्दुल करीम ख़ान के मुख्य शिष्य थे. अब्दुल करीम ख़ान ने ही भारतीय शास्त्रीय संगीत के किराना घराने की स्थापना की थी.

1936 में वो धारवाड़ पहुंचे जहां सवाई गंधर्व ने उन्हें अपना शिष्य बनाया. किराना घराने की एक और जानी मानी हस्ती गंगुबाई हंगल ने इनके साथ ही संगीत की शिक्षा ली.

1943 में वो मुंबई पहुंच गए और एक रेडियो आर्टिस्ट की हैसियत से काम किया. सिर्फ़ 22 साल की उम्र में उनका पहला अलबम लोगों के सामने आया.

संगीत की दुनिया में तो उन्होंने एक से एक कीर्तिमान स्थापित किए लेकिन 1985 में बने वीडियो मिले सुर मेरा तु्म्हारा की वजह से तो वो भारत के हर घर में पहचाने जाने लगे. ये वीडियो उनकी ही दिलकश आवाज़ से शुरु होता है.

उन्होंने कई फ़िल्मों में भी गाना गाया जिसमें बसंत बहार (1956), तानसेन (1958), बीरबल माई ब्रदर (1973), अनकही (1985) प्रमुख हैं.

पुरस्कार

वर्ष 1972 में उन्हें पद्मश्री से नवाज़ा गया और उसके बाद से पुरस्कार मिलने का सिलसिला जारी रहा. संगीत की दुनिया का शायद ही ऐसा कोई पुरस्कार है जिससे उन्हें सम्मानित नहीं किया गया हो.

भारत सरकार ने 2008 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से उन्हें सम्मानित किया.

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