'उत्सव में शामिल होना शुरुआत है'

मीना कांदासामी
Image caption जयपुर साहित्य उत्सव में दलित साहित्य को भी स्थान मिला है.

भारत के जयपुर में साहित्य उत्सव में अब दलित साहित्य को भी मंच मिलने लगा है. दलित साहित्यकार इसे अच्छी शुरुआत मानते है लेकिन उन्हें लगता है अभी राह बहुत लंबी है.

इन दलित साहित्यकारों ने जो कुछ उत्सव में बयान किया, उसे मीडिया में ज्यादा स्थान नहीं मिला. उत्सव के आयोजको के मुताबिक, न केवल दलित साहित्यकार बल्कि समाज में उपेक्षा का दंश झेल रहे समूहों को उत्सव में स्थान दिया गया है.

उत्सव के भव्य मंचो पर ओजस्वी माने गए साहित्यकारों की बैठक और उन्हें देखने सुनने भीड़ जमा होती रही. मगर एक मंडप ऐसा भी सजा जहां दलित साहित्यकार अपने लेखन और साहित्य की धारा के बारे में बयान दे रहे थे.

इस उत्सव में जहाँ और लोग 'जग बीती ' सुना रहे थे, वही दलित लेखक 'आप बीती' बयान कर रहे थे.

इनमें चंद्रभान प्रसाद भी थे. उन्होंने भारत में दलित साहित्य पर बहुत काम किया है. वे कहने लगे, ''दरअसल भारत में दलितों को अब मुख्यधारा के क्षेत्रीय साहित्य में स्थान मिलने लगा है. मगर केन्द्रीय अंग्रेजी साहित्य मे दलित को अभी जगह मिलना शुरू हुआ है.’’

चेन्नई की मीना कांदासामी ने भी इस उत्सव में शिरकत की और दलित जीवन का दर्द बयान किया.

वो कहती हैं, ''हमें ये याद दिलाना है कि दलित हाशिए पर है. वो पीड़ित है. दरअसल लोग ये बोलते रहते है कि भारत तो कामसूत्र, ताजमहल और वेदों का देश है. पर ये भूल जाते है कि यहाँ जाति के आधार पर भेदभाव है, औरत के साथ पक्षपात बरता जाता है.’’

वो कहती है ऐसे उत्सव में दलित साहित्य को मंच मिलना एक संतोष की बात है.

कांदासामी के अनुसार 'इसके ज़रिए वो अपनी बात कह सकते है,जब बहस और विवाद हो तो किसी समाधान की तरफ बढ़ सकते है,प्रजातंत्र के लिए भी ये जरूरी है.’’

दलित साहित्यकार चंद्रभान प्रसाद कहते है मौजूदा तौर पर दलित लेखन अतीत के किस्सों का वर्णन है और वर्तमान का जिक्र है.

वो कहते हैं, "हमें अब भविष्य को ध्यान में रख कर साहित्य का निर्माण करना चाहिए.’’

कांदासामी ने एक उपन्यास लिखा है जिसको नाम दिया है -टच -यानि स्पर्श.

वो कहने लगी एक दलित के लिए छूना बड़ी बात है. कांदासामी कहती है कि मुख्य धारा के साहित्य में या तो दलितों का शुमार नहीं है और या फिर वो एक सफाई कर्मचारी के रूप में या किसी दास भाव के पात्र में चित्रित किया जाता है.

वो कहती हैं, ''भारत के साहित्य में दलित कहीं भी मुख्य किरदार में नहीं है, वो कहीं साफ़ सफ़ाई वाला है. बिना किसी नाम के बिना किसी रूप के उसे जगह दी जाती रही है. कोई ये नहीं सोचता कि उसकी भी कोई प्रेम कथा हो सकती है. कोई ये नहीं लिखता कि उसके दैनिक जीवन में भी संघर्ष की दास्ताँ हो सकती है. इसलिए मुझे साहित्य लेखन में आना पड़ा, आप देखिए दुनिया का हर छठा व्यक्ति भारतीय है, और भारत में हर छठा व्यक्ति दलित है. इतने बड़े वर्ग की कब तक साहित्य में उपेक्षा की जाएगी.’’

उत्सव के आयोजन से जुडी नमिता गोखले कहती है पिछले बार उत्सव में दलित साहित्यकार ओमप्रकाश वाल्मीकि की भागीदारी को दुनिया भर में मीडिया कवरेज मिला. इस बार भी एक पूरी बैठक इसी पर रखी गई थी. इसके साथ ही और भी अल्पसंख्यक आवाज़ों को उत्सव में स्थान दिया गया है.

दलित सदियों तक हाशिए पर रहे. अब मंच मिला तो अभिभूत थे. कोई साहित्यकार पाठशाला में ज्ञान की तपिश से शब्दों को सोना बनाता है. मगर दलित साहित्य का एक एक शब्द गोया जिन्दगी के यथार्थ की आंच से खुद कुंदन बन गया हो .

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