करछना किसान आंदोलन; डीएम का तबादला

करछना में आंदोलन
Image caption करछना में भूमि अधिग्रहण के ख़िलाफ़ किसान आंदोलन कर रहे हैं.

उत्तर प्रदेश सरकार ने करछना किसान आंदोलन के चलते इलाहाबाद के जिला मजिस्ट्रेट संजय प्रसाद को हटाकर राजस्व परिषद में न्यायिक सदस्य के महत्वहीन पद पर भेजा है. समझा जाता है कि संजय प्रसाद को करछना में जेपी ग्रुप के निर्माणाधीन ताप बिजलीघर के ख़िलाफ़ किसानों के आंदोलन को ठीक से न संभाल पाने के कारण हटाया गया.

इस बीच ऊर्जा सचिव नवनीत सहगल ने कहा है कि आंदोलन के कारण यह परियोजना रद्द नही होगी, पर अगर वहां के किसान ज़मींन देने पर सहमत नही होंगे तो उसे अगल बगल दूसरे गाँव में लगाया जा सकता है.

राज्य सरकार ने आलोक कुमार ( द्वितीय ) को इलाहाबाद का नया ज़िलाधिकारी बनाया गया है, जो मंगलवार को कार्यभार ग्रहण करेंगे.

पिछले हफ़्ते ज़मीनों का मुआवज़ा बढाने की मांग को लेकर किसानों ने दिल्ली - हावड़ा मुख्य रेल मार्ग ठप कर दिया था.

करछना

रेल पटरी पर से धरना खत्म कराने के लिए जिला मजिस्ट्रेट संजय प्रसाद ने आंदोलनकारी किसानों को स्टाम्प पेपर पर लिखकर दे दिया था कि करछना के किसानों को भी अलीगढ की तरह 570 रूपये वर्ग मीटर की दर से मुआवजा, हर प्रभावित परिवार को नौकरी और शासन द्वारा घोषित नयी पुनर्वास नीति 2010 के अनुसार अन्य लाभ देने पर विचार किया जाएगा.

इसके लिए चार महीने की मोहलत मांगी गई थी. इस आश्वासन पर किसानों ने रेलवे लाइन से धरना खत्म कर दिया. किसानों ने आमरण अनशन भी खत्म कर क्रमिक अनशन शुरू कर दिया.

किसानों ने इसे अपनी जीत मानते हुए प्रचार किया कि जिला मजिस्ट्रेट ने उनकी सारी मांगे मान ली हैं.

जबकि जिला मजिस्ट्रेट संजय प्रसाद का कहना है कि उन्होंने आंदोलनकारियों के दबाव में सिर्फ यह लिखकर दिया था कि इन मांगों पर शासन चार महीने में विचार करेगा.

लेकिन करछना में ज़िला मजिस्ट्रेट के इस आश्वासन से बगल की दो अन्य बिजली परियोजनाओं बारा और मेजा के प्रभावित किसानों में भी आन्दोलन की सुगबुगाहट हो गई है.

विपक्ष

Image caption उत्तर प्रदेश मुआवज़ा बढ़ाने या किसानों से नए समझौते के मूड में नहीं है.

प्रदेश भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही, पूर्व विधान सभाध्यक्ष केशरी नाथ त्रिपाठी, उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रीता जोशी, कांग्रेस विधान मंडल दल के नेता प्रमोद तिवारी, समाजवादी पार्टी सांसद रेवती रमण सिंह और लोक मंच नेता अमर सिंह ने कचरी गाँव जाकर मुआवजा बढ़ाने की किसानों की मांग को समर्थन दिया.

इन नेताओं ने आंदोलन के दौरान मरने वाले एक किसान गुलाब चंद्र के परिवार को आर्थिक सहायता दी और सरकार से भी पांच से पन्द्रह लाख तक मुआवजा देने की मांग की.

विपक्षी दल इस अलीगढ़ की तरह किसान आंदोलन का बड़ा मुद्दा बना रहे हैं. विशेषकर इसलिए क्योंकि ये परियोजना मुख्यमंत्री मायावती के करीबी जेपी उद्योग समूह को दी गई है.

सरकार का नज़रिया

Image caption इससे पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी किसान भूमि अधिग्रहण के ख़िलाफ़ आंदोलन कर चुके हैं

लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार मुआवजा बढ़ाने या किसानों से नए समझौते के मूड में नही है.

ऊर्जा सचिव नवनीत सहगल ने कहा, "परियोजना के लिए जमीन का अधिग्रहण दो साल पहले हो चुका है, 95 फीसदी से अधिक किसानों ने मुआवजा ले लिया है. इस तरह 521 हेक्टर में से 500 हेक्टर ज़मीन का मुआवजा बाँटा जा चुका है. केवल कुछ किसानों ने मुआवजा नही लिया है."

सहगल का कहना है कि आंदोलन के कारण परियोजना रद्द नही होगी.

ऊर्जा सचिव ने कहा कि अगर किसानों की कोई वाजिब मांग है तो बातचीत हो सकती है. जो किसान ज़मीन देने को सहमत नही होंगे, उनकी ज़मीन जबरन नही ली जाएगी. और अगर ज़रुरत हुई तो परियोजना आसपास के किसी और गाँव में शिफ्ट कर दी जायेगी.

मगर प्रेक्षकों का कहना है कि सरकार केवल किसानों पर दबाव बनाने के लिए ऐसा कह रही है. एक तो दूसरी उपयुक्त जमीन आसानी से नही मिलेगी, दूसरे अगर करछना बिजलीघर परियोजना रद्द हुई, तो बाकी दोनों परियोजनाएं भी खटाई में पड जाएंगी.

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