'जयपुर की तर्ज पर सार्क उत्सव हो'

  • 26 जनवरी 2011
जयपुर साहित्यिक उत्सव
Image caption कई साहित्यकार सार्क देशों का साहित्यिक उत्सव चाहते हैं

भारत के जयपुर में साहित्य उत्सव में एकत्र दक्षिण एशियाई देशों के अनेक लेखकों और साहित्यकारों का मानना है कि जयपुर साहित्य उत्सव सार्क देशो को निकट लाने में सहायक है और सार्क देशों का ऐसा ही साहित्य समागम आयोजित होना चाहिए.

भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आईसीसीआर) जयपुर उत्सव की तर्ज पर सार्क देशो का ऐसा ही एक समागम आयोजित करने पर विचार भी कर रही है.

जब राजीनीति और राजनयिक दोनों कहीं और ही व्यस्त थे, तब साहित्य ने सरहदों के फ़ासले कम किए, कवियों-शायरों और लेखकों को एक मंच पर जमा कर दिया. भारत के सांस्कृतिक साहित्य परिषद के अध्यक्ष डॉक्टर कर्ण सिंह को ये विचार बहुत पसंद आया.

'अब सार्क देशों का समारोह'

डॉक्टर कर्ण सिंह ने इस समारोह में शिरकत की और इस अयोजन की तारीफ़ भी की. उनका कहना था, "अब सोच रहे हैं कि परिषद की ओर से सार्क देशों का साहित्यक समारोह कराया जाए. ये ठीक होगा. अब फैज़ साहिब पाकिस्तान के कवि हैं पर उनकी ज़्यादा कद्र भारत में है. पाकिस्तान के साथ उर्दू और पंजाबी, नेपाल के साथ नेपाली, बांग्लादेश के साथ बांग्ला और श्रीलंका के साथ सिन्हला-तमिल भाषाएँ हमें आपस में जोड़ती हैं. इसलिए हमारा आपस में आदान-प्रदान होना ही चाहिए."

नेपाल के साहित्यकार नारायण वाघले इस आयोजन में हिमालय से चलकर आए और बोले, "ये एक बड़ा उत्सव है. ये सार्क देशों के लोगों को परस्पर जोड़ता है. एक लेखक के तौर पर मुझे लगता है ये दिलों को जोड़ने वाला काम है. यहाँ का सांस्कृतिक माहौल, चर्चा और एक दूसरे से मिलना मैं कभी नहीं भूल सकता."

भारतीय विदेश सेवा के नवतेज सरना मानते हैं कि उनका लेखन उन्हें एक साहित्यकार की भी पहचान देता है.

उन्होंने कहा, "दक्षिण एशिया में आज कल दुनिया का बहुत महत्वपूरण साहित्य लिखा जा रहा है, न केवल अंग्रेज़ी में बल्कि दक्षिण एशिया की भाषाओं में भी. अंग्रेजी में जो लिखा जा रहा है उससे बाक़ी दुनिया से रिश्ता बनाना आसांन हो गया है. भारत एक आर्थिक शक्ति के तौर पर तो दुनिया में पहचाना जा रहा है लेकिन अगर उसके साथ उसका सांस्कृतिक रूप भी इस साहित्य के ज़रिए बाहर पहुंचे तो अच्छा ही होगा."

दक्षिण एशियाई देशों की झलक

उत्सव के आयोजन से जुड़ी नमिता गोखले कहती हैं, "जो दक्षिण एशिया की छवि है वो हम इस उत्सव में देख सकते हैं. क्योंकि जो भाषा हिंदुस्तान की है वो पूरे दक्षिण एशिया की भी है. जैसे उर्दू-हिंदी, बांग्ला बांग्लादेश की जुबान है तो भारत की भी है. नेपाली तो हमारी 22 भाषाओ में से एक है. तमिल श्रीलंका की भाषा है तो वहाँ संस्कृत भी कई लोग जानते हैं. ये सार्क देशों को निकट ला रहा है और लेखक लोगों को जोड़ने का काम बाख़ूबी कर सकते हैं."

पाकिस्तान की ज़ाहिदा हिना साझा संस्कृति की बड़ी जानकार हैं और अदब की दुनिया का जाना-माना नाम भी हैं. वो कहती हैं, "जब हम आपस में मिलते हैं तो बहुत सारी ग़लतफ़हमियाँ दूर होती हैं और पता चलता है लोग एक जैसे ही हैं. विचारों का आदान-प्रदान होता है. एक दूसरे के निकट आने का मौक़ा मिलता है. पर विशेष तौर पर जो हमारी नई पीढ़ी है उसके लिए ज़रूरी है कि वो ऐसे मेलों में आए, किताबों को खरीदे, लोगों से मिले, बाते करे, एक दूसरे के अदब को समझे और एक दुसरे की ज़ुबान का अहतराम करे. नहीं तो हम ख़त्म हो जाएँगे."

सियासत ने धरती पर एक लकीर खींची और उसे सरहदों में बाँट दिया. मगर ये बंटवारा ज़मीन का तो हुआ, दिलों का नहीं. इसीलिए रिश्तों को जब भी मौका मिलता है, वो मुहब्बत की गठरी लिए कभी इधर चले आते हैं, कभी उधर !

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