बिहार में फिर बढ़े अपहरण

  • 27 जनवरी 2011
नीतीश कुमार (फ़ाइल फ़ोटो)
Image caption नीतीश के दूसरे कार्यकाल में बिहार में अपराध बढ़ रहे हैं

बिहार में नीतीश सरकार के दोबारा सत्ता में आते ही राज्य की क़ानून-व्यवस्था को लगे एक गहरे झटके ने लोगों को चौंका दिया है.

यह झटका यहाँ अपहरण की घटनाओं में अचानक भारी वृद्धि से लगा है.

राज्य में पिछले तीन महीनों में अपहरण के लगभग 30 मामले दर्ज हो चुके हैं और इनमें से चार अपहृत लोगों की हत्या कर दी गयी है.

पिछले नवम्बर के अंतिम सप्ताह में नीतीश कुमार का नया मंत्रिमंडल बना और दिसम्बर बीतते- बीतते अपराधियों ने 11 लोगों को फिरौती के लिए अगवा कर लिया.

बीते पांच वर्षों के नीतीश शासनकाल का सबसे ज़्यादा गुणगान इस पर हो रहा था कि उस दौरान राज्य की क़ानून-व्यवस्था में ख़ासा सुधार देखा गया.

पिछले विधानसभा चुनाव के समय मुख्यमंत्री अपने भाषणों में अक्सर दुहराते रहते थे ,''पंद्रह वर्षों (लालू-राबड़ी राज) से फल-फूल रहे अपहरण उद्योग को पांच वर्षों में ध्वस्त कर दिया गया और अब अमन-चैन क़ायम हुआ है.''

अपराध नियंत्रण का दावा

लेकिन हाल ही जो आकड़े राज्य पुलिस मुख्यालय ने जारी किये हैं, उनमें सामान्य अपहरण के मामले लालू-राबड़ी राज के पांच साल में 10,385 और नीतीश राज के पांच साल में 13,570 दर्ज बताये गये हैं.

ओर जो फिरौती के लिए अपहरण की घटनाओं के आंकड़े दिए गए हैं, उनके अनुसार लालू-राबड़ी राज के पांच वर्ष में 1778 और नीतीश शासनकाल में सिर्फ 499 मामले सामने आए.

मतलब तुलनात्मक नज़रिए से मौजूदा राज्य सरकार ने अपहरण- वारदातों को तीन गुणे से भी ज़्यादा कम कर देने में सफलता पाई.

पर ये जो पिछले तीन महीनों में यहाँ अपहरण की घटनाओं में उछाल आ जाने से क़ानून-व्यवस्था पर सवाल उठने लगे हैं, उस बाबत राज्य का पुलिस मह्क़मा सकते में है.

बिहार के पुलिस महानिदेशक नीलमणि ने इस बारे में बीबीसी से बात करते हुए ये स्वीकार किया कि ऐसी घटनाओं में अचानक तेज़ी आई है और ये चिंता का विषय है.

नीलमणि ने कहा, ''पिछले चुनाव को शांतिपूर्वक संपन्न करा लेने के बाद लगता है पुलिस - बल में जो थोड़ी सुस्ती या कुछ लापरवही दिखी होगी इसलिए अपहरण करने वाले गिरोह सक्रिय हो गये. और कुछ ऐसे नए गिरोह या जेल से छूटे अपराधियों पर पुलिस की नज़र थोड़ी ढीली हो गयी थी, इसलिए किडनैपर्स को मौक़ा मिल गया. लेकिन अब उन पर काबू पा लिया गया है.''

ज़ाहिर है कि न सिर्फ विरोधी दल, बल्कि आम लोग इस बारे में राज्य सरकार को सवालों के घेरे में लेने लगे हैं. ये पूछा जा रहा है कि पांच सालों में हत्या के 15,460 मामले जिस नीतीश राज में दर्ज हो चुके हों उसे अमन-चैन वाला शासनकाल कहना कितना सही है ?

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