अपहृत जवानों का कोई सुराग नहीं

  • 29 जनवरी 2011
अपहृत जवानों के परिजन इमेज कॉपीरइट BBC World Service

छत्तीसगढ़ सरकार ने 25 जनवरी को राज्य के नारायणपुर के अबूझमाड़ के इलाक़े से अगवा किए गए पांच पुलिसकर्मियों को माओवादी छापामारों के चंगुल से निकालने के लिए सघन अभियान शुरू कर दिया है.

इस बीच रिपोर्ट है कि माओवादियों ने अपहृत ग्रामीण मूलचंद पटेल को रिहा कर दिया है. कहा जा रहा है कि रिहाई के बाद पटेल अपने गाँव धनुरा लौट आए हैं. पटेल ने पुलिस को बताया है कि अपहृत किए गए जवान सुरक्षित हैं. वैसे पुलिस यह नहीं बता रही है कि माओवादियों ने इनका अपहरण करने के बाद इन्हें कहाँ रखा था.

इस मामले में सरकार ने छत्तीसगढ़ सशस्त्र पुलिस बल के एक कंपनी कमांडर को निलंबित भी कर दिया है. कंपनी कमांडर पर आरोप है कि उन्होंने पांच जवानों को बिना सुरक्षा के ही जाने दिया. इस मामले को लेकर राज्य के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक रामनिवास नारायणपुर में वरिष्ट पुलिस अधिकारियों के साथ रणनीति तय कर रहे हैं. वे छत्तीसगढ़ में चल रहे नक्सल विरोधी अभियान का नेतृत्व भी कर रहे हैं.

ऐसी ख़बरें मिल रहीं हैं कि अपहृत जवानों की रिहाई के लिए चलाये जा रहे अभियान की कमान दंतेवाड़ा के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक एसआरपी कल्लूरी ने संभाल ली है. ये पाँचों जवान धनुरा कैंप में पदस्थापित थे. यह कैंप नारायणपुर और अबूझ माड़ के ओरछा के बीच जंगलों में स्थित है.

25 जनवरी की सुबह जब वे दो अलग-अलग यात्री बसों में सवार होकर नारायणपुर जा रहे थे, तो बीच रास्ते में माराबेडा के पास सशस्त्र माओवादी छापामारों नें उनकी बसों को रुकवाया और उन्हें अपने साथ ले गए.

अधिकारियों का कहना है कि सभी जवान सादे लिबास में थे और उनके पास हथियार भी नहीं थे. बस से माओवादियों नें एक ग्रामीण का भी अपहरण कर लिया है, जिसके अब रिहा होने की ख़बर आ रही है. बीबीसी से बात करते हुए अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक राम निवास ने कहा कि राज्य सरकार ने निकटवर्ती राज्य महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश की पुलिस से भी जवानों को ढूंढ निकालने में मदद मांगी है.

हालाँकि अभी तक माओवादियों ने इस बारे में कोई बयान जारी नहीं किया है. यही वजह है कि इन जवानों के परिजनों का रो-रो कर बुरा हाल है.

रणनीति

इन सभी जवानों के परिजन नारायणपुर ज़िला मुख्यालय में डेरा डाले हुए हैं, इस आस में कि उनके लोगों का कोई सुराग मिल पाए.

वैसे ग्रामीणों से छन कर ज़िला मुख्यालय आ रही ख़बरों के हिसाब से ऐसी संभावना व्यक्त की जा रही है कि माओवादी अपहृत जवानों को छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र की सीमा के पास रखे हुए हैं. लेकिन पुलिस अधिकारियों ने इस ख़बर की पुष्टि नहीं की है. अपहृत जवानों में रामाधार पटेल, रघुनंदन ध्रुव, डी एक्का, रंजन दुबे और मणिशंकर शामिल हैं. छत्तीसगढ़ का बस्तर संभाग, माओवादी छापामारों और सुरक्षा बलों के बीच चल रहे संघर्ष का मुख्य केंद्र है. इस जंगली इलाक़े में कई जगहों पर सुरक्षा बलों के कैंप है.

लेकिन कैंपों में रह रहे जवानों को जेल जैसी परिस्थिति में रहना पड़ता है क्योंकि उन्हें कैंप से बाहर निकलने की अनुमति नहीं है.

इस इलाक़े में हालात इतने ख़राब हैं कि छुट्टी मिलने के बावजूद जवान कैंपों से बाहर नहीं जा सकते हैं. अगर जाते भी हैं तो उनके लिए मुख्यालयों तक जाने के साधन भी उपलब्ध नहीं हैं और उन्हें यात्री वाहनों पर निर्भर रहना पड़ता है. इन मुद्दों को लेकर अर्धसैनिक बलों ने पहले ही चिंता व्यक्त की है.

संबंधित समाचार